हारमोनियम के जादूगर पंडित आर. के. बीजापुरे: चार पीढ़ियों के सुर-सारथी और महामहोपाध्याय
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: हारमोनियम वादन के शिखर पुरुष
भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ ऐसे कलाकार हुए हैं जिन्होंने किसी वाद्य विशेष को एक नई पहचान और प्रतिष्ठा दी। ऐसे ही महान कलाकारों में शीर्षस्थ नाम है—पंडित आर. के. बीजापुरे। वे भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत के एक अत्यंत प्रतिष्ठित हारमोनियम वादक और संगीत गुरु थे। संगीत की दुनिया में उन्हें पंडित राम कल्लो बीजापुर, पंडित आर. के. बीजपुरे अथवा ‘विजापुर मास्टर’ के नाम से भी अत्यंत आदर के साथ पुकारा जाता था। उन्होंने हारमोनियम को केवल एक सहयोगी वाद्य नहीं रहने दिया, बल्कि अपनी अनूठी शैली से इसे एकल वादन (Solo Performance) के शीर्ष मुकाम पर पहुँचाया।
जन्म, संगीत-शिक्षा और गुरु-परंपरा
पंडित आर. के. बीजापुरे का जन्म सन १९१७ में कर्नाटक के बेलगाम जिले के कागवाड़ नामक स्थान पर हुआ था।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: संगीत उन्हें विरासत में मिला था; उनके पिता कल्लोपंत बीजापुर स्वयं एक जाने-माने नाटककार और संगीतकार थे।
कठिन साधना और गुरु-शिष्य परंपरा: आर. के. बीजापुरे जी के पहले गुरु अन्नगरी मलैया थे। इसके बाद उन्होंने हारमोनियम वादन की बारीकियों को सीखने के लिए राजवाडे, गोविंदराव गायकवाड़ और हनमंतराव वालवेकर जैसे उस्तादों से कड़ा और गहन प्रशिक्षण लिया।
बीजापुरे जी ने भी केवल वादन ही नहीं सीखा, बल्कि संगीत के कई महान दिग्गजों से मुखर संगीत (Vocal Music) की शिक्षा भी ग्रहण की। इनमें रामकृष्णबुआ वाज़े, पं. शिवरामबुआ वज़े, पं. कगलकरबुआ और पं. उत्तराकर्बुआ के नाम प्रमुख हैं। उन्होंने अपनी अकादमिक योग्यताओं को बढ़ाते हुए अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय से ‘संगीत विशारद’ (स्वर) और ‘संगीत अलंकार’ की प्रतिष्ठित उपाधियाँ प्राप्त की थीं।
जीवनी और अनूठी वादन शैली: जब रूसी प्रतिनिधिमंडल रह गया दंग
पंडित बीजापुरे जी का कर्मक्षेत्र अत्यंत व्यापक था। उन्होंने वेंकरावराव शिरहट्टी की प्रसिद्ध ड्रामा कंपनी के लिए एक संगीत निर्देशक और हारमोनियम वादक के रूप में काम किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने प्रतिष्ठित एचएमवी (HMV) कंपनी के लिए आधिकारिक हारमोनियम वादक, अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय के लिए एक मुख्य संगीत परीक्षक और कर्नाटक सरकार के कला विभागों में अपनी अमूल्य सेवाएँ दीं।
एकल वादन की विलक्षण शैली: उन्होंने पुणे, हैदराबाद, बैंगलोर, कोल्हापुर, हुबली, धारवाड़ सहित देश के सभी प्रमुख संगीत केंद्रों में अपनी जादुई एकल प्रस्तुतियाँ दीं।
अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा: भारत में आयोजित ‘रूस के त्योहार’ (Festival of Russia in India) के दौरान जब एक रूसी प्रतिनिधिमंडल ने उनके एकल वादन को सुना, तो वे पूरी तरह मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने विशेष रूप से हारमोनियम के कीबोर्ड पर बिजली की गति से चलने वाली बीजापुरे जी की उंगलियों के चमत्कारी प्रवाह को वीडियो पर रिकॉर्ड किया था।
चार पीढ़ियों के महान गायकों के अनन्य सारथी
एक संगतकार (Accompanist) के रूप में पंडित बीजापुरे जी का कोई सानी नहीं था। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में गायकों की चार पीढ़ियों के साथ हारमोनियम पर संगत की। उनके सुरों के साए में संगीत के इन दैदीप्यमान नक्षत्रों ने अपनी प्रस्तुतियाँ दीं:
पंडित रामकृष्णबुआ वाज़े, पंडित शिवरामबुआ वज़े, पंडित कगलकरबुआ, पंडित सवाई गंधर्व, पंडित डी. वी. पलुस्कर, पंडित विनायकबुवा उत्तराकर, उस्ताद अमीर ख़ाँ, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ, डॉ. गंगूबाई हंगल, पंडित भीमसेन जोशी, पंडित बसवराज राजगुरु, पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर, पंडित कुमार गंधर्व, पीटीए माणिक वर्मा, डॉ. प्रभा अत्रे और विदुषी किशोरी अमोनकर।
उनकी संगत की विशेषता: वे मुख्य गायक के पूरक के रूप में चलते थे। कॉन्सर्ट में आकर्षण जोड़ने के लिए वे गायक के गाते समय बीच में मिलने वाले सूक्ष्म ठहराव (Pauses) का ऐसा रचनात्मक उपयोग करते थे कि पूरी महफ़िल झूम उठती थी। श्रोताओं और दर्शकों के साथ निरंतर एक अभेद्य भावनात्मक तालमेल बनाए रखना उनके वादन की सबसे बड़ी विशेषता थी।
श्री राम संगीत महाविद्यालय: १०,००० शिष्यों के निर्माता
एक महान कलाकार होने के साथ-साथ वे एक युगद्रष्टा संगीत शिक्षक भी थे। सन १९३८ में उन्होंने “श्री राम संगीत महाविद्यालय” की स्थापना की। उनके कुशल निर्देशन और स्नेहिल छत्रछाया में १०,००० से अधिक छात्रों ने संगीत की दीक्षा ली। उनके तैयार किए गए प्रसिद्ध शिष्यों में सुधांशु कुलकर्णी, रवींद्र माने, रवींद्र काटोती, कुंडा वेलिंग, श्रीधर कुलकर्णी, माला अधिपक, अपर्णा चिटनिस, माधुरी भावे, दीपाली मराठे और महेश तेलंग के नाम भारतीय संगीत जगत में आज बड़े आदर से लिए जाते हैं।
पुरस्कार, सम्मान और महाप्रयाण
पंडित आर. के. बीजापुरे जी को उनकी आजीवन संगीत साधना के लिए अनेक उच्च सम्मानों से विभूषित किया गया:
१९८५: संगीत नृत्य अकादमी द्वारा ‘कर्नाटक कला तिलक’ सम्मान
१९९२: हिंदुस्तानी संगीत कलाकार मंडली, बैंगलोर द्वारा ‘नादश्री पुरस्कार’
१९९९: गंधर्व महाविद्यालय, पुणे द्वारा ‘संघकार पुरस्कार’
२००१: मैसूर के ऐतिहासिक दशहरा समारोह में ‘राज्य संगीत विद्यालय सम्मान’
२००३: प्रतिष्ठित ‘टी. चोकदयाह प्रशस्ति’
२००६: अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल द्वारा सर्वोच्च उपाधि ‘महामहोपाध्याय’
मृत्यु:
उम्र से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के कारण १९ नवंबर, २०१० को इस महान संगीत साधक का अवसान हुआ। परंतु संगीत के प्रति उनका समर्पण ऐसा था कि वे अपने जीवन के अंतिम दिनों तक, अस्वस्थता के बावजूद, अपने शिष्यों को सक्रिय रूप से संगीत सिखाते रहे। उनके जाने से हारमोनियम वादन का एक स्वर्णिम युग समाप्त हो गया।