Janaki-Devi-Bajaj

स्वावलंबन और त्याग की प्रतिमूर्ति जानकी देवी बजाज: पर्दा प्रथा की विरोधी और भूदान की संवाहक

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: गांधीवादी जीवन शैली की कट्टर समर्थक

​भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधारों के इतिहास में जानकी देवी बजाज का नाम एक ऐसी स्वावलंबी महिला के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से समाज को नई दिशा दी। वे गांधीवादी जीवन शैली की कट्टर समर्थक थीं और उन्होंने कुटीर उद्योग के माध्यम से ग्रामीण विकास में अविस्मरणीय सहयोग किया। उनके व्यक्तित्व में एक अद्भुत विरोधाभास था—वे जहाँ एक ओर बेहद दानी, कर्तव्यपरायण, मितव्ययी और अनुशासन के मामले में कठोर थीं, वहीं दूसरी ओर उनका हृदय करुणा और दया से आकंठ भरा हुआ था। उनके इन्हीं आजीवन किए गए राष्ट्रव्यापी कार्यों को सम्मानित करने के लिए भारत सरकार ने उन्हें सन् १९५६ में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से अलंकृत किया था।

 

​जन्म, विवाह और विरक्ति का मार्ग

​जानकी देवी का जन्म ७ जनवरी, १८९३ को मध्य प्रदेश के जरौरा में एक संपन्न वैष्णव-मारवाड़ी परिवार में हुआ था।

​पारिवारिक जिम्मेदारी: प्रारंभिक शिक्षा के कुछ ही वर्षों के भीतर उनके छोटे कंधों पर घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी आ गई।

​बजाज घराने में प्रवेश: मात्र आठ वर्ष की कच्ची उम्र में उनका विवाह संपन्न बजाज घराने के जमनालाल बजाज जी के साथ संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात सन १९०२ में वे जरौरा छोड़कर अपने पति के साथ महाराष्ट्र के वर्धा आ गईं।

​जमनालाल जी महात्मा गांधी के विचारों से गहरे प्रभावित थे और उन्होंने सादगी को पूरी तरह अपने जीवन में उतार लिया था। जानकी देवी ने भी स्वेच्छा से अपने पति के पद-चिह्नों पर चलने का निर्णय लिया और वैभव को त्यागकर विरक्ति का मार्ग अपना लिया। इस मार्ग की शुरुआत उनके अपने बहुमूल्य स्वर्णाभूषणों के सहर्ष दान के साथ हुई। जब वे २४ वर्ष की थीं, तब जमनालाल जी ने एक पत्र के माध्यम से गांधीजी के जनसंदेश का जिक्र उनसे किया था, जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा बदल दी। संत विनोबा भावे इस बजाज परिवार के आत्मिक गुरु थे और जानकी देवी की बालसुलभ निश्चलता से वे इतने प्रभावित हुए कि वे उनके छोटे भाई ही बन गए।

 

​सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार और महत्वपूर्ण कार्य

​जानकी देवी बजाज ने केवल समाज सुधार की बातें नहीं कीं, बल्कि उसे सबसे पहले अपने जीवन में लागू किया:

​पर्दा प्रथा का उन्मूलन: जमनालाल जी की प्रेरणा से जानकी देवी ने सामाजिक वैभव और कुलीनता का प्रतीक बन चुकी ‘पर्दा प्रथा’ का पूरी तरह से त्याग कर दिया। उन्होंने देश की अन्य महिलाओं को भी इस रूढ़िवादी बेड़ी को तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके इस साहसिक कदम का असर यह हुआ कि साल १९१९ तक हजारों महिलाएं, जो कभी घर की चहारदीवारी से बाहर नहीं निकली थीं, आज़ाद महसूस कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने लगीं।

​खादी और स्वदेशी आंदोलन: २८ वर्ष की आयु में जानकी देवी ने अपने तमाम कीमती सिल्क के वस्त्रों को त्याग दिया और आजीवन खादी को अपना लिया। वे न केवल अपने हाथों से सूत कातती थीं, बल्कि उन्होंने सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों को भी सूत कातना सिखाया। स्वदेशी आंदोलन में उनकी भूमिका अग्रणी थी; जब वर्धा में विदेशी सामानों की होली जलाई जा रही थी, तब उन्होंने अपने कीमती विदेशी कपड़ों के थानों को अग्नि के हवाले करने से पहले एक क्षण भी नहीं सोचा।

​ऐतिहासिक मंदिर प्रवेश (१७ जुलाई, १९२८): भारत के सामाजिक समरसता के इतिहास में १७ जुलाई, १९२८ का दिन स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। इस ऐतिहासिक दिन जानकी देवी अपने पति जमनालाल जी और हरिजनों (दलित भाइयों) के साथ वर्धा के प्रसिद्ध लक्ष्मीनारायण मंदिर पहुँचीं और समाज के हर वर्ग के लिए मंदिर के कपाट हमेशा-हमेशा के लिए खुलवा दिए।

 

​कूपदान, भूदान और गौसेवा के प्रति समर्पण

​जानकी देवी की ख्याति और सक्रियता केवल वर्धा तक सीमित नहीं थी। उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया।

​आचार्य विनोबा के साथ सारथ्य: वे अपने आत्मिक गुरु आचार्य विनोबा भावे के साथ कूपदान (कुआँ दान), ग्रामसेवा, जनसेवा और भूदान आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं और पदयात्राएँ कीं।

​अखिल भारतीय गौसेवा संघ की अध्यक्षता: मूक पशुओं और गौवंश के प्रति उनके मन में अगाध करुणा थी। गौसेवा के प्रति इसी अटूट जुनून और समर्पण के चलते वे सन १९४२ से लेकर कई वर्षों तक ‘अखिल भारतीय गौसेवा संघ’ की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहीं और इस क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य किए।

 

जानकी देवी

 

 

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