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गुरदयाल सिंह: बढ़ई के औजारों से ज्ञानपीठ तक का सफर और पंजाबी साहित्य का यथार्थवादी स्वर

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​भूमिका: माटी के कथाकार

​भारतीय साहित्य के इतिहास में कुछ ऐसे विरले लेखक हुए हैं, जिन्होंने महलों की चकाचौंध को छोड़कर झोपड़ियों और खेतों में रहने वाले आम इंसान के जीवन को अपने लेखन का केंद्र बनाया। पंजाबी साहित्य के शिखर पुरुष गुरदयाल सिंह ऐसे ही विख्यात कथाकार थे। वे अमृता प्रीतम जी के पश्चात ज्ञानपीठ पुरस्कार (१९९९) से सम्मानित होने वाले दूसरे पंजाबी साहित्यकार बने। गुरदयाल सिंह जी के उपन्यासों और कहानियों में पंजाब के मालवा अंचल की सोंधी मिट्टी की महक, वहाँ के दलितों, वंचितों और खेतिहर मजदूरों का मर्मस्पर्शी यथार्थ उभरकर सामने आता है। उनका संपूर्ण साहित्य उनके स्वयं के कड़वे अनुभवों और जीवन के संघर्षों की भट्टी में तपकर कुंदन बना है।

 

​जीवन परिचय: संघर्षों से तपा जीवन

​गुरदयाल सिंह जी का जीवन इस बात का साक्षात प्रमाण है कि यदि भीतर कुछ कर गुजरने की ललक हो, तो विपरीत परिस्थितियां भी आपका मार्ग नहीं रोक सकतीं:

​जन्म एवं बाल्यकाल: उनका जन्म १० जनवरी, १९३३ को पंजाब के ऐतिहासिक नगर जैतो में हुआ था।

​पारिवारिक विवशता: जब वह मात्र १२-१३ वर्ष के थे, तब पारिवारिक आर्थिक तंगहाली के कारण उन्हें अपनी स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़नी पड़ी। अपने परिवार का पेट पालने के लिए वे अपने पिता के साथ बढ़ई (लकड़ी के कारीगर) के कठिन और शारीरिक श्रम वाले कार्य में जुट गए।

​अद्भुत गुरु-कृपा: भले ही उनका जीवन शारीरिक मेहनत की चक्की में पिस रहा था, परंतु उनके भीतर का जिज्ञासु छात्र जीवित था। उनके स्कूल के सहृदय प्रधानाध्यापक ने उनकी अंतर्निहित प्रतिभा को पहचाना। उनके प्रोत्साहन के कारण ही गुरदयाल सिंह जी ने स्कूल छोड़ने के लगभग १० वर्ष पश्चात एक स्वाध्यायी (प्राइवेट) छात्र के रूप में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।

​शिक्षा की राह: उसी हितैषी प्रधानाध्यापक के प्रयासों से उन्हें एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिली, जिसके बाद उन्होंने आगे चलकर उच्च शिक्षा प्राप्त की और कॉलेज में प्राध्यापक पद को सुशोभित किया।

 

​लेखन शैली एवं शिल्पगत विशिष्टता: ‘मित्रहीन के मित्र’

​गुरदयाल सिंह जी का कथाशिल्प इतना सशक्त और प्रामाणिक है कि पाठक उनकी कहानियों के साथ एक रागात्मक संबंध स्थापित कर लेता है:

​मढ़ी दा दीवा (१९६४): सन् १९६४ में प्रकाशित उनका यह पहला उपन्यास पंजाबी साहित्य की एक युगांतकारी घटना माना जाता है। इसमें उन्होंने एक आर्थिक रूप से विपन्न दलित युवक और एक विवाहित जाट महिला के बीच पनपे अत्यंत पवित्र, मूक और नाटकीय प्रेम को केंद्र में रखकर सामाजिक रूढ़ियों पर करारा प्रहार किया। इसमें समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े वर्ग की कड़वी गरीबी और उनके भावात्मक असंतोष का ऐसा मार्मिक ताना-बाना बुना गया कि साहित्यिक जगत ने उन्हें ‘मित्रहीन के मित्र’ (अनाथों के मसीहा) की उपाधि दे दी।

​परसा की अविस्मरणीय गाथा: उनकी एक अन्य अमर कृति ‘परसा’ आधुनिक भारतीय साहित्य का एक अनमोल रत्न है। इसके नायक ‘परसा’ के माध्यम से उन्होंने बदलते सामाजिक मूल्यों और आदर्शों के टकराव को दिखाया है। उपन्यास में परसा के तीन पुत्र हैं, जो तीन अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं—पहला पुत्र खेल प्रशिक्षक बनकर इंग्लैंड की भौतिकवादी चकाचौंध में बस जाता है; दूसरा एक रसूखदार पुलिस अधिकारी बनता है जिसकी जीवन शैली पिता के सिद्धांतों से सर्वथा भिन्न है; और तीसरा पुत्र देश की व्यवस्था से तंग आकर नक्सली आंदोलन में कूद पड़ता है और अंततः पुलिस मुठभेड़ में मारा जाता है। यह चरित्र पाठक के मानस पटल पर सदा के लिए अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है।

​यथार्थ की प्रामाणिकता: अपने आसपास के परिवेश, लोक संस्कृति और ग्रामीण यथार्थ को बिना किसी बनावट के, विलक्षण कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करना ही गुरदयाल सिंह जी की लेखनी की सबसे बड़ी पूंजी थी।

 

​प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ (Aesthetic Classification)

​गुरदयाल सिंह जी ने गद्य की लगभग हर विधा पर अपनी लेखनी चलाई। उनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण नीचे तालिका में दिया गया है:

उपन्यास…

१. मढ़ी दा दीवा (१९६४)

२. अणहोए (१९६६)

३. रेत दी इक्क मुट्ठी (१९६७)

४. कुवेला (१९६८)

५. अध चानणी रात (१९७२)

कहानी…

१. सग्गी फुल्ल (१९६२)

२. चान्न दा बूटा (१९६४)

३. रूखे मिस्से बंदे (१९८४)

४. बेगाना पिंड (१९८५)

५. करीर दी ढींगरी (१९९१)

नाटक…

१. फरीदा रातीं वड्डीयां (१९८२)

२. विदायगी दे पिच्छीं (१९८२)

३. निक्की मोटी गल (१९८२)

गद्य- लेखक दा अनुभव ते सिरजन परकिरिया।

 

राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार

​गुरदयाल सिंह जी के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करते हुए देश के सर्वोच्च संस्थानों ने उन्हें अनेक गरिमामय पुरस्कारों से अलंकृत किया:

​साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९७५): उनके उपन्यास ‘अध चानणी रात’ के लिए प्रदान किया गया।

​सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (१९८६): अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रगतिशील विचारों को सम्मान मिला।

​पंजाब साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९८९): प्रांतीय स्तर पर सर्वोच्च सम्मान।

​शिरोमणि साहित्यकार पुरस्कार (१९९२): पंजाबी भाषा की उत्कृष्ट सेवा हेतु।

​पद्मश्री (१९९८): भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान।

​ज्ञानपीठ पुरस्कार (१९९९): भारतीय साहित्य का सर्वोच्च शिखर सम्मान (संयुक्त रूप से हिंदी के निर्मल वर्मा जी के साथ)।

 

महाप्रयाण

​अपनी लेखनी से पंजाब के ग्रामीण जनजीवन को अमर करने वाले यह महान साहित्यकार १६ अगस्त, २०१६ को पंजाब के भटिण्डा में ८३ वर्ष की आयु में इस नश्वर संसार को छोड़कर गोलोकवासी हो गए। भले ही आज वे हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, परंतु अपनी अमर रचनाओं ‘परसा’ और ‘मढ़ी दा दीवा’ के रूप में वे वैश्विक साहित्य के आकाश में सदैव दैदीप्यमान रहेंगे।

 

 

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