राम! राम! राम!
पिछले भागों में हमने पेरियार के जीवन और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समझा। अब हम सीधे उस पुस्तक के मूल विचारों पर आते हैं, जिसने करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर प्रहार किया। पेरियार ने ‘सच्ची रामायण’ की प्रस्तावना में जो तर्क दिए हैं, वे न केवल भ्रामक हैं बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता को खंडित करने का प्रयास भी हैं।
सच्ची रामायण का सच भाग –२ से आगे
पेरियार ने सच्ची रामायण लिखने से पूर्व अपनी पुस्तक के प्रस्तावना में जो लिखा है, वो सीधे सीधे आपके सम्मुख हम प्रस्तुत कर रहे हैं…
रामायण किसी ऐतिहासिक तथ्य पर आधारित नहीं है। यह एक कल्पना है। रामायण के अनुसार, राम न तो तमिल था और न ही तमिलनाडु का रहने वाला था। वह उत्तर भारतीय था। रावण लंका यानी दक्षिण यानी तमिलनाडु के राजा थे; जिनकी हत्या राम ने की। राम में तमिल-सभ्यता (कुरल संस्कृति) का लेश मात्र भी नहीं है। उसकी पत्नी सीता भी उत्तर भारतीय चरित्र की है। तमिल विशेषताओं से रहित है। वह उत्तरी भारत की रहने वाली थी। रामायण में तमिलनाडु के पुरुषों और महिलाओं को बंदर और राक्षस कहकर उनका उपहास किया गया है।
रामायण में जिस लड़ाई का वर्णन है, उसमें उत्तर का रहने वाला कोई भी (ब्राह्मण) या आर्य (देव) नहीं मारा गया। एक आर्य-पुत्र के बीमारी के कारण मर जाने की कीमत रामायण में एक शूद्र को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। वे सारे लोग, जो इस युद्ध में मारे गए; वे तमिल थे। जिन्हें राक्षस कहा गया।
रावण राम की पत्नी सीता को हर ले गया। क्योंकि, राम ने उसकी बहन ‘सूर्पनखा’ का अंग-भंग किया व उसका रूप बिगाड़ दिया था। रावण के इस काम के कारण लंका क्यों जलाई गई? लंका निवासी क्यों मारे गए? रामायण की कथा का उद्देश्य तमिलों को नीचा दिखाना है। तमिलनाडु में इस कथा के प्रति सम्मान जताना तमिल समुदाय और देश के आत्मसम्मान के लिए खतरनाक और अपमानजनक है। राम या सीता के चरित्र में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे दैवीय कहा जाए।
जिस तरह तथाकथित आजादी (१९४७) मिलने के बाद गोरे लोगों की मूर्तियों को हटा दिया गया और उनके नामों पर रखे गए स्थानों के नामों को मिटा दिया गया तथा उनकी जगह भारतीय नाम रख दिए गए। उसी तरह आर्य देवताओं और उनकी महत्ता बताने वाली हर बात को मिटा देना चाहिए; जो तमिलों के प्रति आदर और सम्मान की भावनाओं को आघात पहुंचाते हैं। हर तमिल, जिसकी नसों में शुद्ध द्रविड़ खून बहता है; उसको इसे अपना कर्तव्य समझकर ऐसा करने का शपथ लेनी है।
– पेरियार ई.वी. रामासामी
पेरियार की प्रस्तावना: तर्क या कुतर्क?
पेरियार ने अपनी पुस्तक की भूमिका में कुछ ऐसे बिंदु रखे हैं जो सीधे तौर पर समाज को बांटने का कार्य करते हैं। उनके मुख्य विचार निम्नलिखित थे:
१. रामायण बनाम तमिल अस्मिता:
पेरियार का दावा था कि रामायण ऐतिहासिक नहीं बल्कि कल्पना मात्र है। उनके अनुसार, राम एक “उत्तर भारतीय” थे जिनका तमिल संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने रावण को “तमिलनाडु का राजा” घोषित किया और राम द्वारा वध को दक्षिण पर उत्तर की विजय के रूप में चित्रित किया।
२. पात्रों का अपमानजनक चित्रण:
पेरियार का आरोप था कि रामायण में दक्षिण के पुरुषों और महिलाओं को ‘बंदर’ और ‘राक्षस’ कहकर उनका उपहास किया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि युद्ध में केवल तमिल (जिन्हें वे राक्षस कहते हैं) मारे गए, जबकि कोई भी आर्य (ब्राह्मण/देव) नहीं मारा गया।
३. प्रतिशोध और युद्ध का औचित्य:
रावण द्वारा सीता के अपहरण को पेरियार ने शूर्पणखा के अंग-भंग का “उचित प्रतिशोध” बताया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि रावण के इस कृत्य के लिए पूरी लंका को क्यों जलाया गया और निर्दोष लंकावासी क्यों मारे गए? उनके अनुसार, इस पूरी कथा का उद्देश्य तमिलों को नीचा दिखाना है।
४. सांस्कृतिक बहिष्कार का आह्वान:
पेरियार ने तुलना की कि जिस तरह १९४७ के बाद अंग्रेजों (गोरों) की मूर्तियाँ हटाई गईं, उसी तरह “आर्य देवताओं” और उनकी महत्ता बताने वाली हर चीज़ को मिटा देना चाहिए। उन्होंने ‘शुद्ध द्रविड़ खून’ वाले हर व्यक्ति से इसे अपना कर्तव्य मानकर शपथ लेने का आह्वान किया।
क्रमशः… सच्ची रामायण का सच (भाग-४)
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