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‘रिप’ (RIP) का रायता और आधुनिक शोक-मनाऊ पाखंड

 

​आजकल हमारे डिजिटल समाज में ‘शोक मनाने’ की एक नई और बेहद हाईटेक फैक्ट्री खुल गई है। किसी के निधन की खबर अभी ग्रुप में ठीक से पोस्ट भी नहीं हो पाती कि दो सेकंड के भीतर नीचे ‘RIP’, ‘RIP’, ‘RIP’ की ऐसी बाढ़ आ जाती है, मानो लोग कीबोर्ड पर अंगूठा दबाकर ही बैठे थे कि कोई मरे और हम अपनी उँगलियों का हुनर दिखाएं।

​कमाल की बात यह है कि इन तीन अक्षरों का बटन दबाने वाले ९० प्रतिशत ‘फेसबुकिया विद्वानों’ को अगर रोककर पूछ दिया जाए कि भाई, इस ‘रिप’ की फुल फॉर्म क्या है? तो वे तपाक से कहेंगे—”अरे वही… रिस्पेक्ट इन पर्सन… या शायद रेस्ट इन पीस!” उन्हें नहीं मालूम कि वे अनजाने में उस मृत आत्मा को कयामत के दिन तक कब्र में इंतज़ार करने का वीज़ा थमा रहे हैं!

​सनातन धर्मी हैं, जो जीवन भर पुनर्जन्म, कर्मफल और मोक्ष की बातें करते हैं। गंगा जी में अस्थियाँ विसर्जित करके आते हैं ताकि आत्मा अगले सफ़र पर निकले। लेकिन फेसबुक पर आते ही वे लैटिन और अंग्रेजी के ऐसे पैरोकार बनते हैं कि सीधे आत्मा को ‘रेस्ट’ (आराम) करने की परमानेंट सलाह दे डालते हैं। अरे भाई! जो आत्मा अमर है, जो निरंतर यात्रा पर है, जिसने गीता के अनुसार पुराना वस्त्र बदलकर नया वस्त्र धारण कर लिया है, उसे तुम जबरन बेड रेस्ट पर क्यों भेज रहे हो?

​दुख इस बात का नहीं है कि लोग शोक मना रहे हैं; दुख इस बात का है कि वे बिना सोचे-समझे बस बहते जा रहे हैं। कोई ‘ॐ शांति’ या ‘सद्गति’ लिखने का कष्ट नहीं करना चाहता, क्योंकि उसमें दो शब्द ज़्यादा टाइप करने पड़ेंगे। शॉर्टकट के इस ज़माने में हमारी संवेदनाएँ भी ‘शॉर्ट’ हो गई हैं। खैर, जब तक इंटरनेट मुफ़्त है और उँगलियाँ चालू हैं, तब तक पाखंड का यह ‘सस्ता विलाप’ ऐसे ही चलता रहेगा!

 

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