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वो भी क्या मुसाफ़िरी, जो बस मंज़िल तक पहुँचा दे,

मज़ा तो उस रास्ते में है, जो ख़ुद से हमें मिला दे।

 

ये ऊँचे उड़ते विमान, ये बादलों की सरसराहट,

मगर कहाँ इनमें वो मिट्टी की भीनी सी आहट?

अभी उड़े नहीं कि उतरने की पुकार आई,

न सफर का होश रहा, न रास्तों में बहार आई।

मशीनों की इस दौड़ में, जैसे वक़्त कहीं खो गया,

मुसाफ़िर मंज़िल पर तो पहुँचा, पर रास्तों का क्या हुआ?

 

याद करो वो रेल, वो खिड़की और वो शोर,

जो जोड़ती थी हमें, अनजान लोगों की ओर।

किसी की चाय की चुस्की, किसी के क़िस्सों का पिटारा,

ट्रेन की वो लय, जैसे बहती नदी की धारा।

स्टेशनों का वो ठहराव, वो अपनों का इंतज़ार,

ट्रेन ही तो सिखाती थी, किसे कहते हैं संसार।

 

पर सफर का असली रंग तो सड़कें दिखाती हैं,

जहाँ अपनी मर्ज़ी की हवाएँ, खिड़की से आती हैं।

जहाँ मन किया रुक गए, जहाँ चाहा मुड़ गए,

कुल्हड़ की चाय पी और दुनिया से जुड़ गए।

वो ढाबों की मस्ती, वो अनकही सी राहें,

सड़कें तो जैसे खोल देती हैं अपनी बाहें।

 

मगर याद आती है वो बैलगाड़ी और वो ताँगा,

जिसमें रफ़्तार कम थी, पर जज़्बात ज़्यादा माँगा।

वो गाड़ीवान का गीत और बैलों के गले की घंटी,

थकते थे दोनों, पर दोनों में थी एक अटूट सी संधि।

इंसान और परिंदे का वो जान छिड़कने वाला प्यार,

वो पगडंडियों का सफर, जैसे कुदरत का हो उपहार।

 

पर सुनो मुसाफ़िर, असली मुसाफ़िरी तो पैदल चलने में है,

धूल फांकने में, धूप सहने और शाम ढलने में है।

जब धरती के सीने की धड़कन, पैरों के नीचे होती है,

तब हर एक मंज़िल, आँखों में ख़्वाब पिरोती है।

और अगर साथ में हों यार, तो ये पैदल चलना भी कम है,

कंधे पर हाथ हो दोस्तों का, तो हर कांटा भी शबनम है।

 

न थकने का डर हो, न पहुँचने की कोई जल्दी,

बस क़दमों की ताल हो, और बातें हों अनकही।

मुसाफ़िरी तो वही है, जो तुम्हें मुसाफ़िर बना दे,

और सफर के अंत में, तुम्हें एक नया ‘तुम’ थमा दे।

 

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