सन्नाटा है रात का, पर रौशन घर का कोना है,
नींदों को कुछ दिन के खातिर, अब बस दूर ही होना है।
एक जंग छिड़ी है मेजों पर, भविष्य को गढ़ने की,
उम्मीदों की सीढ़ी चढ़कर, आगे रोज बढ़ने की।
बच्चे मग्न हैं कापियों में, कुछ लिख रहे, कुछ काट रहे,
स्याही की हर एक बूंद से, वो अपना भाग्य छाँट रहे।
खत्म हो रही कलम की स्याही, पन्ने भरते जाते हैं,
मेहनत के उन निशानों से, नए ख्वाब बुनते जाते हैं।
रसोई में हम बारी बारी से, कॉफी चढ़ाते हैं,
थकी हुई उन आँखों में, थोड़ा जोश जगाते हैं।
प्याली से उठती भाप में, फिक्र हमारी घुली हुई,
रात-जगा की हर करवट, बच्चों के नाम लिखी हुई।
वो स्याही से तो, हम कॉफी से रातें जीत रहे,
बच्चों के उन सपनों संग, हम भी पल-पल बीत रहे।
ना थकान का कोई शिकवा, ना नींद का अब ठिकाना है,
उनकी जीत में ही छिपा, हमारा सारा जमाना है।