दो आँखों से देखा हमने,
बस दुनिया का मेला है,
छल, कपट और भीड़ यहाँ,
पर मन फिर भी अकेला है।
पर भीतर एक और चक्षु है,
जो शांत खड़ा पहरेदार है,
वही असल में सत्य लोक का,
खुलता हुआ द्वार है।
जब मौन उतरता है भीतर,
और शोर थमा सा होता है,
तब जागती है वह दिव्य दृष्टि,
जब सारा जग सोता है।
वो नहीं देखती रंग-रूप,
न ही बाहरी माया को,
वो पढ़ लेती है पल भर में,
मन की गहरी छाया को।
अंतर्ज्ञान की उस लौ से,
संशय के कुहासे छँटते हैं,
स्वयं से जब होता परिचय,
तब सारे बंधन कटते हैं।
वही ‘आत्मा का स्थान’ है,
वही शांति का धाम है,
तीसरी आँख का खुलना ही,
असल बोध का नाम है।