अब स्याही की ज़रूरत क्या,
जब चिप में सारा ज्ञान है?
लेखक की उस मौलिकता का,
होता यहाँ अपमान है।
सोच की वो तड़प गई,
और कल्पना भी सो गई,
मशीनी शब्दों की भीड़ में,
कहीं संवेदना खो गई।
जो रचते थे रक्त जलाकर,
रातों की खामोशी में,
वो हार रहे अब खुद को,
“प्रॉम्प्ट” की मदहोशी में।
बिना जिए ही दर्द यहाँ,
कागज़ पर छप जाता है,
बिना मरे ही स्वर्ग यहाँ,
स्क्रीन पर दिख जाता है।
एक क्लिक पर सौ कविताएँ,
बेजान सी सज जाती हैं,
लेखक की अपनी क्षमताएँ,
अब कोने में दब जाती हैं।
ये सुविधा नहीं विनाश है,
उस मानवीय मेधा का,
जहाँ अंत हो रहा धीरे-धीरे,
सृजन की हर मर्यादा का।
मशीनें अब तय करती हैं,
कि दिल को क्या भाएगा,
लगता है अब लेखक बस,
“कॉपी-पेस्ट” कर पाएगा।
रचनाकार अब मौन है,
उसका अस्तित्व धुंधलाया है,
इंसानी कलम पर आज,
एक ‘बॉट’ की काली छाया है।