1776761571693

सत्ता का शिखर और समाज का आधार: क्या ‘पिछड़ापन’ एक राजनीतिक षड्यंत्र है?

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण

 

प्रस्तावना: प्रतिनिधित्व के दौर में ‘शोषित’ का विलाप

भारतीय लोकतंत्र आज अपने उस पड़ाव पर है जहाँ सामाजिक प्रतिनिधित्व के आंकड़े इतिहास के किसी भी कालखंड की तुलना में सबसे अधिक समावेशी नज़र आते हैं। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर अनुसूचित जनजाति (ST) समाज की गरिमापूर्ण उपस्थिति है और शासन की कमान एक ऐसे व्यक्तित्व के हाथ में है जो स्वयं पिछड़ा वर्ग (OBC) से आते हैं। इसके बावजूद, सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक रैलियों में ‘पिछड़ा’, ‘दलित’ और ‘शोषित’ जैसे शब्दों का प्रयोग कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। प्रश्न यह उठता है कि जब सत्ता के गलियारों में इन वर्गों की हिस्सेदारी इतनी व्यापक है, तो फिर उत्थान की प्रक्रिया कहाँ बाधित है? क्या वास्तव में समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी पिछड़ा है, या ‘पिछड़ापन’ अब एक ऐसी राजनीतिक पूँजी बन गया है जिसे कुछ स्वार्थी तत्व कभी खत्म नहीं होने देना चाहते?

 

सांख्यिकीय विरोधाभास: सत्ता में भागीदारी की वास्तविकता

सामाजिक न्याय के दावों को यदि हम आंकड़ों की कसौटी पर कसें, तो वर्तमान तस्वीर किसी भी संशय को दूर करने के लिए पर्याप्त है। आज देश में ४४ दलित सांसद, ४७ अनुसूचित जनजाति सांसद और २३० पिछड़ा वर्ग के सांसद विधायी प्रक्रियाओं का नेतृत्व कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में १२ दलित, ३० ओबीसी और १० एसटी मंत्री नीति निर्धारण का कार्य कर रहे हैं।

राज्यों की स्थिति और भी स्पष्ट है। पूरे देश में लगभग ६२० विधायक दलित समाज से और लगभग १५०० विधायक पिछड़ा वर्ग से चुनकर आते हैं। इतिहास गवाह है कि देश ने अब तक ६ बार दलित मुख्यमंत्री और ४५ बार ओबीसी मुख्यमंत्री देखे हैं। यदि इतने व्यापक प्रतिनिधित्व के बाद भी ये समाज ‘पिछड़े’ और ‘शोषित’ कहलाते हैं, तो यह उन जन-प्रतिनिधियों की कार्यक्षमता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है जिन्होंने दशकों तक सत्ता का सुख भोगा। सच तो यह है कि यह पिछड़ापन अब स्थिति नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘नैरेटिव’ बन चुका है।

 

दार्शनिक भटकाव: ‘खाओ, पियो और मस्त रहो’ बनाम संचय की संस्कृति

इस समस्या की जड़ें जितनी राजनीति में हैं, उतनी ही गहरे दर्शन में भी हैं। आलेख का एक महत्वपूर्ण पक्ष उस विचारधारा की समीक्षा करना है जो किसी समाज की प्रगति की दिशा तय करती है। ‘खाओ, पियो और मस्त रहो’ (Eat, drink, and be merry) का विचार यूनानी दार्शनिक एपिकुरस (Epicurus) से प्रेरित दिखता है, किंतु भारतीय परिवेश में इसे चार्वाक दर्शन के ‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कर्त्वा घृतं पिबेत्’ (जब तक जियो सुख से जियो, चाहे कर्ज लेकर घी पीना पड़े) से जोड़ा जा सकता है।

यह भौतिकवादी दर्शन व्यक्ति को केवल तात्कालिक सुखों तक सीमित कर देता है। जब राजनीति किसी वर्ग को यह सिखाती है कि उसे केवल ‘उपभोक्ता’ बने रहना है, तो वह समाज ‘निर्माण’ की शक्ति खो देता है। इसके विपरीत, सवर्ण समाज के पुरखों ने ‘एक-एक ईंट जोड़कर’ विशाल इमारतें खड़ी की थीं। वह इमारत केवल ईंट-पत्थरों की नहीं थी, बल्कि वह मितव्ययिता, अनुशासन और भविष्य की पीढ़ी के लिए संसाधन संचय की एक सुदृढ़ परंपरा थी। आज गलत राजनीति के कारण इस संचय की संस्कृति पर प्रहार हो रहा है और जो समाज निर्माण करने में विफल रहे, उनकी नज़र अब सवर्णों की उन संपत्तियों पर है जो पीढ़ियों के परिश्रम का फल हैं।

 

सवर्णों का अदृश्य शोषण और आर्थिक विषमता

पिछड़ों की राजनीति का सबसे काला पक्ष यह है कि इसके माध्यम से सवर्णों का व्यवस्थित शोषण किया जा रहा है। इसे एक ‘कॉन्सीप्रेसी’ या छद्म विचारधारा कहा जा सकता है जो ‘योग्यता’ (Merit) को जाति के नाम पर कुचलने का प्रयास करती है। आज एक मध्यमवर्गीय सवर्ण छात्र, जिसके पास न तो कोई आरक्षण है और न ही विरासत में मिली बड़ी संपत्ति, वह व्यवस्था के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है।

आर्थिक आंकड़ों के धरातल पर देखें तो कई राज्यों में सामान्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा उन आरक्षित वर्ग के परिवारों से भी अधिक विपन्न है जो ‘क्रीमी लेयर’ का लाभ उठाकर बार-बार सत्ता और संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं। यह ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (विपरीत भेदभाव) का युग है, जहाँ सवर्ण होना ही अपने आप में एक अघोषित अपराध बना दिया गया है। जब मेहनत और मेधा को दरकिनार कर केवल ‘पहचान’ को पुरस्कार दिया जाता है, तो देश से प्रतिभा का पलायन (Brain Drain) होता है, जिसका खामियाजा अंततः पूरे राष्ट्र को भुगतना पड़ता है।

 

‘अभिजात्य पिछड़ों’ का उदय और वास्तविक पिछड़ों का ह्रास

इस राजनीति का सबसे दुखद परिणाम स्वयं उन्हीं वर्गों को भुगतना पड़ रहा है जिनके नाम पर यह खेल खेला जा रहा है। पिछड़ों और दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं ने अपना तो उत्थान किया, लेकिन अपने ही समाज के अंतिम व्यक्ति को वहीं छोड़ दिया जहाँ वह दशकों पहले था। इससे आरक्षित श्रेणियों के भीतर ही एक ऐसा ‘अभिजात्य वर्ग’ पैदा हो गया है जो संसाधनों को निचले स्तर तक पहुँचने ही नहीं देता। यह वर्ग खुद को ‘पिछड़ा’ कहकर लाभ लेता है, जबकि उसकी जीवनशैली किसी भी समृद्ध सवर्ण से कहीं अधिक वैभवशाली है।

 

निष्कर्ष: वैचारिक क्रांति की अनिवार्यता

निष्कर्षतः, यह स्पष्ट है कि पिछड़ों की राजनीति अब उनके उत्थान का मार्ग नहीं, बल्कि समाज को बांटने का एक हथियार बन चुकी है। यदि आज राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सैकड़ों सांसद और हजारों विधायक इन वर्गों से हैं, तो ‘शोषित’ होने का रोना केवल एक राजनीतिक ढोंग है।

हमें ‘चार्वाक’ के ऋण लेकर घी पीने वाले दर्शन को त्यागकर परिश्रम और सृजन के पथ पर लौटना होगा। समाज को यह समझना होगा कि दूसरों की संपत्तियों पर नज़र रखने या सवर्णों को शोषक बताने से विकास नहीं होगा। विकास तब होगा जब योग्यता का सम्मान होगा और ‘पिछड़ापन’ गौरव के बजाय एक शर्म का विषय माना जाएगा जिसे मेहनत से मिटाना है। सवर्णों का शोषण बंद होना चाहिए और न्याय की एक ऐसी सर्वग्राही परिभाषा गढ़नी चाहिए जिसमें ‘जाति’ नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति की पात्रता’ और ‘आर्थिक स्थिति’ ही मापदंड हो।

यह आलेख समाज के उन सभी वर्गों के लिए एक चेतावनी है जो ‘मुफ्तखोरी’ और ‘जातिवाद’ की राजनीति के पीछे अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकारमय कर रहे हैं।

 

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण के निजी विचारों पर आधारित शोधपरक विश्लेषण।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *