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मंदिर और आरोग्यशाला: प्राचीन भारत के सेवा सदन और औषधीय केंद्र

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण

 

प्रस्तावना: अध्यात्म और आयुर्वेद का समन्वय

प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन में ‘धर्म’ और ‘आरोग्य’ को अलग-अलग करके नहीं देखा गया। ‘पहला सुख निरोगी काया’ के सिद्धांत को मूर्त रूप देने का कार्य हमारे मंदिरों ने किया। आज जिसे हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) कहते हैं, उसकी जड़ें मंदिरों के प्रांगण में स्थित आरोग्यशालाओं में गहरी जमी हुई थीं। जहाँ ‘मन्त्र’ मानसिक शांति प्रदान करते थे, वहीं ‘तंत्र’ (तकनीक) और ‘औषधि’ शारीरिक व्याधियों का उपचार करती थीं।

 

मंदिर के भीतर चिकित्सालय: शिलालेखों के प्रमाण

इतिहास की निष्पक्ष दृष्टि से देखें तो दक्षिण भारत के मंदिरों में चिकित्सा व्यवस्था के स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं।

वेंकटेश्वर मंदिर (आंध्र प्रदेश): यहाँ के शिलालेखों में ‘तिरुमलै’ क्षेत्र में स्थित औषधालयों का वर्णन मिलता है, जहाँ तीर्थयात्रियों और स्थानीय लोगों का निःशुल्क उपचार होता था।

तिरुमुकुडल शिलालेख (तमिलनाडु): वीर राजेंद्र चोल (१०६७ ईस्वी) के समय का एक प्रसिद्ध शिलालेख ‘वेंकटेश परुमल मंदिर’ में एक १५ बिस्तरों वाले अस्पताल (आतुर-शाला) का उल्लेख करता है। इस शिलालेख में बाकायदा डॉक्टरों (चिकित्सक), नर्सों और यहाँ तक कि दवाओं के स्टॉक की सूची भी दी गई है।

 

औषधीय उद्यान (नंदनवन): मंदिरों की प्राकृतिक फार्मेसी

प्रत्येक बड़े मंदिर के साथ एक ‘नंदनवन’ या पवित्र उपवन जुड़ा होता था। आज हम इसे केवल सजावटी बगीचा मानते हैं, किंतु प्राचीन काल में ये विशिष्ट ‘औषधीय उद्यान’ थे।

१. जड़ी-बूटियों का संरक्षण: यहाँ तुलसी, नीम, आंवला, बिल्व और कल्पवृक्ष जैसी औषधियाँ उगाई जाती थीं।

२. आयुर्वेदिक शोध: मंदिरों के आचार्य इन पौधों के गुणों पर शोध करते थे। मंदिर के भीतर ही ‘चरक संहिता’ और ‘सुश्रुत संहिता’ के सिद्धांतों के आधार पर अर्क, भस्म और तेल तैयार किए जाते थे।

३. प्रसाद का वैज्ञानिक आधार: कई मंदिरों में मिलने वाला ‘प्रसाद’ वास्तव में एक स्वास्थ्य वर्धक औषधि होता था, जिसमें काली मिर्च, सोंठ, कपूर और केसर जैसी वस्तुओं का संतुलित मिश्रण होता था।

 

जल चिकित्सा और शुद्धिकरण: मंदिरों के पुष्करणी (कुंड)

मंदिरों के पास स्थित तालाब या बावड़ियाँ (Pushkarani) केवल स्नान के लिए नहीं थीं।

खनिज गुण: कई मंदिर कुंडों का निर्माण ऐसे पत्थरों और जड़ी-बूटियों के साथ किया जाता था कि उनका जल त्वचा रोगों और वात-दोष को दूर करने में सहायक होता था।

हाइड्रोथेरेपी: सूर्योदय के समय मंदिर के जल में स्नान करना और उसके बाद परिक्रमा करना एक वैज्ञानिक ‘प्राणिक हीलिंग’ की प्रक्रिया थी, जो शरीर के चक्रों को सक्रिय करती थी।

 

सेवा ही साधना: समाज के लिए समर्पित ‘आतुर-शाला’

मंदिरों ने यह सिद्ध किया कि ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा ‘नर सेवा’ है।

निःशुल्क उपचार: मंदिरों को मिलने वाले दान का एक बड़ा हिस्सा ‘आरोग्य निधि’ में जाता था। निर्धन रोगियों के लिए भोजन और दवा की व्यवस्था मंदिर प्रशासन द्वारा की जाती थी।

मानसिक चिकित्सा: मंदिर के मंडपों में होने वाले भजन, कीर्तन और मंत्रोच्चार ‘ध्वनि चिकित्सा’ (Sound Therapy) का कार्य करते थे, जो आज के डिप्रेशन और तनाव जैसे रोगों का उस काल में प्रभावी समाधान थे।

 

विनाश का प्रभाव: जब ‘आरोग्य’ के केंद्र उजड़ गए

आक्रांताओं द्वारा मंदिरों के विध्वंस ने केवल मूर्तियों को नहीं तोड़ा, बल्कि भारत की ‘पब्लिक हेल्थ सिस्टम’ की रीढ़ को तोड़ दिया। मंदिरों के साथ जुड़े औषधीय बगीचे नष्ट हो गए, वैद्यों का राजकीय आश्रय छिन गया और ज्ञान की वह मौखिक परंपरा खंडित हो गई जो पीढ़ियों से चली आ रही थी।

 

निष्कर्ष: आधुनिक आरोग्य केंद्रों के लिए प्रेरणा

आज के दौर में जब चिकित्सा एक महंगा व्यापार बन चुकी है, हमें अपने प्राचीन मंदिर-चिकित्सालय मॉडल से सीख लेने की आवश्यकता है। मंदिर केवल पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि करुणा और विज्ञान का संगम थे। यदि हम अपनी विरासत को पुनः जीवित करना चाहते हैं, तो हमें मंदिरों को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखकर, उन्हें पुनः ‘आरोग्य और ज्ञान’ के जीवंत केंद्रों में तब्दील करना होगा।

 

 

 

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