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बंगाल डायरी – भाग ५: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और जनसंघ की स्थापना

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण

 

एक युगदृष्टा का प्रादुर्भाव

जब भारत विभाजन की दहलीज पर खड़ा था और नेहरू-गांधी की नीतियां तुष्टिकरण की ओर झुक रही थीं, तब बंगाल की मेधा ने एक ऐसे नेता को जन्म दिया जिसने ‘देशहित’ को सर्वोपरि रखा। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक प्रखर शिक्षाविद और चिंतक थे। उन्होंने बहुत पहले भांप लिया था कि यदि बंगाल का विभाजन हिंदू हितों की रक्षा करते हुए नहीं हुआ, तो पूरा बंगाल इस्लामी कट्टरता की भेंट चढ़ जाएगा।

 

“एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे”

कश्मीर से लेकर बंगाल तक, डॉ. मुखर्जी ने जिस अखंड भारत का स्वप्न देखा था, वह आज की ‘हिन्दवी’ राजनीति का मूल आधार है। नेहरू सरकार से मतभेदों के बाद उन्होंने सत्ता का त्याग किया और १९५१ में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की। यह वही जनसंघ है जो आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में वटवृक्ष बना है। उनका बलिदान (कश्मीर की जेल में रहस्यमयी मृत्यु) बंगाल के गौरव की वह गाथा है जिसे वामपंथियों ने जानबूझकर हाशिये पर रखा।

 

पश्चिम बंगाल के रक्षक

अक्सर लोग भूल जाते हैं कि आज ‘पश्चिम बंगाल’ भारत का हिस्सा है, तो इसका श्रेय डॉ. मुखर्जी को ही जाता है। जब जिन्ना पूरे बंगाल को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था, तब डॉ. मुखर्जी ने ही आंदोलन चलाया और यह सुनिश्चित किया कि बंगाल के हिंदुओं के लिए एक सुरक्षित भूमि (पश्चिम बंगाल) भारत के भीतर बनी रहे। उन्होंने कहा था— “कांग्रेस ने भारत का विभाजन किया, मैंने बंगाल का विभाजन (हिंदुओं के लिए) किया।”

 

जनसंघ से भाजपा तक: एक निरंतर यात्रा

डॉ. मुखर्जी ने जिस विचारधारा का पौधा लगाया था, उसने बंगाल के हिंदुओं को एक राजनीतिक विकल्प दिया। वामपंथ और कांग्रेस के दौर में भी जनसंघ के विचारों ने बंगाल के भीतर दबी हुई हिंदू चेतना को जीवित रखा। ४ मई २०२६ की जीत वास्तव में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उन्हीं संघर्षों का तार्किक समापन है।

 

निष्कर्ष

डॉ. मुखर्जी का शौर्य और बलिदान आज के बंगाल की नई सरकार की प्रेरणा है। उन्होंने सिखाया कि जब राष्ट्र की अखंडता और धर्म की रक्षा का प्रश्न हो, तो सत्ता का सुख तिनके के समान त्याग देना चाहिए। श्रृंखला के अगले भाग में हम उस दौर की चर्चा करेंगे जहाँ बंगाल फिर से अंधकार में गिरा— ममता बनर्जी का शासन और हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार।

 

 

ममता राज का काला अध्याय: तुष्टिकरण, हिंसा और हिंदू गौरव का दमन।

 

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