‘हैप्पी हिंदी दिवस’: सरकारी फाइलों और अंग्रेजी विज्ञापनों के बीच सुबकती राजभाषा
लीजिए साहब, साल का वह विशेष हफ्ता फिर लौट आया है, जब देश के तमाम सरकारी दफ्तरों की अलमारियों पर जमी धूल अचानक झाड़ी जाने लगती है। फाइलों पर लिपटे लाल फीते को कुछ दिनों के लिए ‘भगवा या तिरंगे’ रंग की कशिश देने की कोशिश की जाती है। जी हाँ, आपने बिल्कुल सही समझा—’हिंदी दिवस’ (या यूं कहें कि हिंदी सप्ताह) का पावन राष्ट्रीय पर्व आ चुका है!
हिंदी प्रेमियों और भाषाविदों का तो खैर शुरू से ही यही रोना रहा है कि हिंदी दिवस मनाना अब कोई भाषाई आंदोलन नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक ‘सरकारी कर्मकांड’ बन चुका है। एक ऐसा सालाना सरकारी कार्य, जिसे किसी भी तरह १४ सितंबर को निपटा कर, एक लंबी और गहरी सांस लेकर, अगले पूरे एक साल के लिए ठंडे बस्ते में टाल दिया जाता है। इस ‘सरकारी कसरत’ से हिंदी भाषा का कितना विकास होता है, यह तो केवल विधाता ही जाने; लेकिन हाँ, इससे हिंदी की बची-कुची गरिमा को जो ‘सांस्कृतिक चोट’ पहुँचती है, उसका हिसाब किसी बहीखाते में नहीं है।
‘वेलकम’ टू हिंदी दिवस: पाखंड की पराकाष्ठा
इस राष्ट्रीय उत्सव का सबसे विस्मयकारी और मनोरंजक दृश्य देखना हो, तो किसी भी बड़े सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थान के मुख्य द्वार पर चले जाइए। वहाँ आपको अत्यंत ज्ञानी और लब्धप्रतिष्ठित विद्वान ‘हिंदी दिवस समारोह’ के मंच पर खड़े दिखेंगे, जहाँ मुख्य द्वार पर बड़े-बड़े अक्षरों में अंग्रेजी में लिखा होगा—”WELCOME TO HINDI DIWAS CELEBRATION”!
भीतर मुख्य अतिथि महोदय पधारते हैं, जो मंच से हिंदी के गौरव पर ढाई घंटे का ओजस्वी भाषण झाड़ते हैं। लेकिन जैसे ही वे मंच से नीचे उतरते हैं, उनके होठों से रसगुल्ले की तरह अंग्रेजी टपकने लगती है। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को डांटते हुए कड़ककर कहते हैं—”सुनो, इस पूरे भाषण का ड्राफ्ट तुरंत ‘इंग्लिश’ में टाइप करके मेल करो, हिंदी में काम करने से फाइलों की ‘स्पीड’ स्लो हो जाती है!”
सरकार इस पूरे तामझाम को हर साल केवल इसलिए चलाती है ताकि जनता को (और शायद खुद को भी) यह मुगालता दे सके कि वह राष्ट्रभाषा के विकास हेतु ‘दिन-रात’ कार्य कर रही है। हकीकत यह है कि उसी कार्यालय के बाबू से लेकर साहब तक, सब के सब हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी में ही अपनी उंगलियां चटकाते नजर आते हैं।
अपनत्व की रही-सही भावना का ‘अंतिम संस्कार’
मगर ठहरिए! इस सिक्के का एक और दिलचस्प पहलू भी है। समाज का एक बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा भी है, जिनकी सोच यह है कि जो लोग विविध प्रशासनिक या तकनीकी कारण बताकर इस ‘हिंदी दिवस’ का विरोध करते हैं या इसका मजाक उड़ाते हैं, वे दरअसल हिंदी के सबसे बड़े दुश्मन हैं। उनका मानना है कि ये आलोचक चाहते हैं कि आम जनता के भीतर अपनी मातृभाषा के प्रति बची-कुची जो रही-सही अपनत्व की भावना है, वह भी पूरी तरह समाप्त हो जाए।
नतीजा यह हुआ है कि आम जनता के लिए अब ‘हिंदी दिवस’ भी २५ दिसंबर या १ जनवरी के किसी ‘हॉलमार्क हॉलिडे’ जैसा ही एक सामान्य कार्यक्रम बनकर रह गया है—सुबह उठो, व्हाट्सएप पर तिरंगे के साथ ‘हिंदी दिवस की शुभकामनाएं’ का स्टेटस लगाओ, और दोपहर को कलीग्स के साथ बैठकर अंग्रेजी में ‘लंच ऑर्डर’ कर दो!
अंग्रेजी का मोहजाल: शिक्षित और विकसित की परिभाषा?
और सच कहें तो, इस पूरे तमाशे के लिए हम केवल सरकार या तंत्र को ही क्यों दोष दें? हम और आप स्वयं भी तो इस अंग्रेजी के तिलस्मी मोहजाल से चौबीसों घंटे घिरे हुए हैं और इससे बाहर निकलने की हमारी कोई औकात भी नहीं दिखती। आखिर हमारे तथाकथित आधुनिक समाज में ‘शिक्षित’ और ‘विकसित’ होने का पैमाना क्या है…?
अगर आप धाराप्रवाह अंग्रेजी में दो-चार गालियां या निरर्थक बातें भी बड़बड़ा दें, तो समाज आपको ‘प्रोग्रेसिव और इलीट’ (विकसित और संभ्रांत) मान लेता है; और यदि आप शुद्ध, व्याकरण सम्मत हिंदी में कोई मर्मस्पर्शी या वैज्ञानिक बात भी कह दें, तो आपको ‘गंवार या दकियानूस’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
जब तक ‘एजुकेटेड’ होने का मतलब ‘इंग्लिश स्पीकिंग’ रहेगा, तब तक हिंदी सिर्फ विज्ञापनों, चुनावी भाषणों और सरकारी भत्तों को डकारने का माध्यम बनी रहेगी। बाकी तो आप स्वयं समझदार हैं कि माँ के आंचल को बाजार के हवाले करके हम किस तरह की ‘तरक्की’ की ओर बढ़ रहे हैं!
माफ़ कीजिएगा, अगर Ashwini Rai ‘Arun’ का यह तीखा व्यंग्य किसी ‘साहब’ की अंग्रेजी मानसिकता को नागवार गुजरा हो… लेकिन सच यही है।
धन्यवाद !
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