नायक अथवा खलनायक…
गांधी जयंती पर विशेष: गद्दी का नया वारिस और ‘बाज़ार’ में महात्मा
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
बापू बनने का सफर और निर्विवाद निष्ठा
लगभग डेढ़ सौ सालों के इस आधुनिक इतिहास में दिल्ली की सल्तनत पर न जाने कितनी सरकारें बनीं, बिगड़ीं और धूल में मिल गईं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो शुरू के कुछ साल तो यूं ही निकल गए एक हाड़-मांस के पुतले को ‘बापू’ का दर्जा दिलाने में। और अचरज देखिए, जब वे बापू बने तो देश के किसी भी छोटे-बड़े संगठन ने उन पर उंगली उठाने का दुस्साहस नहीं किया। बड़े-बड़े विद्वानों और मनीषियों ने अपनी तार्किक कसौटियों पर उन्हें सही और जायज ठहराया। केवल भारत ही क्यों, पूरे विश्व ने जिन्हें एक स्वर में ‘महात्मा’ कहकर पुकारा, उस उपाधि पर भी बुद्धिजीवियों के खेमे में कहीं कोई विवाद नहीं था। अस्सी के दशक तक, वह कातता हुआ सूत और वह लंगोटी वाला फकीर, जन-सामान्य के अगाध जनसमर्थन और अडिग आस्था के बल पर इस देश का ‘राष्ट्रपिता’ बना रहा।
वैसे, कागजों और सरकारी दफ्तरों में तो वे आज भी राष्ट्रपिता ही हैं, मगर परदे के पीछे उस गद्दी का अब एक ‘नया वारिस’ प्रकट हो चुका है। मजे की बात यह है कि उस नए वारिस की भी अपनी एक अलग, अंधभक्तों वाली ‘फैन फॉलोइंग’ तैयार होने लगी है।
खैर, छोड़िए उस बात को… मुख्य मुद्दे पर आते हैं।
नैरेटिव का बदलना: कीचड़ और कहानियों का दौर
अस्सी से नब्बे का वह दौर संक्रमण का काल था। उस दौर में बहुत ही दबी और छुपी-छुपाई जबान में, अँधेरे कमरों में बैठकर, उस महात्मा की धवल चादर पर कीचड़ उछालने के लिए ‘कादा’ (कीचड़) इकट्ठा किया जाने लगा। फिर आया नब्बे का दशक, जब वह छुपा हुआ कीचड़ सरेआम उछाला जाने लगा। इतिहास की कतरनों को तोड़-मरोड़कर उनकी तथाकथित बुराइयों, काल्पनिक भूलों और छद्म कहानियों का एक पूरा का पूरा ताना-बाना बुना जाने लगा।
इसके बाद दस्तक दी साल दो हजार ने। यह वह दौर था जहाँ जन-समर्थन और जन-मानस की सोच स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंट गई। कल तक जो गांधी पूरे देश का सर्वसम्मत नायक था, वह अब शतरंज की बिसात पर एक पक्ष के लिए ‘नायक’ तो दूसरे पक्ष के लिए अचानक ‘खलनायक’ बना दिया गया।
सत्ता का नया व्याकरण और ‘देशद्रोह’ का तमगा
उसका अगला दशक तो पूरी तरह से ‘सत्ता के व्याकरण’ के बदलने का था। साल २०१० के बाद का जो समय आया, उसने तो वैचारिक विद्रूपता की सारी हदें ही पार कर दीं। अब स्थिति यह हो गई कि उस गांधी के विचारों को मानने वाले, अहिंसा और सत्य की बात करने वाले लोगों को सीधे-सीधे ‘देशद्रोही’ की संज्ञा दी जाने लगी। गांधीवादी विचार से ओत-प्रोत पूरी की पूरी पीढ़ी (चाहे वह पुरानी हो या नई) को राष्ट्र-विरोध के कुंभीपाक नरक के पाप से लिप्त मान लिया गया। सोशल मीडिया की ट्रोल सेनाओं ने गांधी को खलनायक सिद्ध करने के लिए दिन-रात एक कर दिए।
अंततः… बाज़ार में गांधी!
और अंत में, इस पूरी क्रोनोलॉजी का सबसे दिलचस्प और हास्यास्पद मोड़ तब आया, जब तख्तो-ताज पूरी तरह बदल गया। सत्ता परिवर्तन के पश्चात, नए हुक्मरानों ने जब देखा कि इस देश के जनमानस के रग-रग में गांधी का नाम इस कदर बसा है कि उसे पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता, तो उन्होंने एक नई चाल चली। पूरे जनमानस का विश्वास जीतने के लिए, इस बार स्वयं सत्ताधीशों ने ही गांधी को एक अन्य लौह-पुरुष की भांति ‘बेचने का बाज़ार’ लगा दिया!
अब कल तक जो लोग जनता के सम्मुख उस गांधी को देश के विभाजन का जिम्मेदार और ‘कालकूट जहर’ बताते आ रहे थे, आज वही लोग उनके सबसे बड़े ‘सेल्समैन’ बनकर कोट-पतलून पहने बाज़ार में खड़े हो गए हैं। चश्मा उनका ब्रांड बन गया और स्वच्छता उनका नारा।
अब गलियों में, विज्ञापनों में, और सरकारी होर्डिंग्स पर आवाज़ गूँज रही है—
“गांधी ले लो गांधी! खादी वाला गांधी! चश्मे वाला गांधी!”
यह राजनीति का कैसा अजब रंग है कि जिस गांधी के विचारों की हत्या हर रोज की जाती है, उसी गांधी की तस्वीर को अपनी सियासी दुकान चमकाने के लिए सबसे आगे टांगा जाता है। समझने वाले समझ ही रहे हैं कि यह गांधी से प्रेम नहीं, बल्कि गांधी के नाम की मलाई खाने का नया सियासी हुनर है।
धन्यवाद!