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मृत्युभोज: सामाजिक विकृति, शास्त्रीय सत्य और चेतना का ह्रास

 

​”जिस घर से उठा हो अर्थी का धुआं, वहाँ पकवानों का सजना निंदनीय है,

शोक में डूबे आंसुओं से भीगा अन्न, मानव चेतना के लिए विष के सदृश है।”

​२०१६ में जब मैंने इस विषय पर कलम चलाई थी, तब मन में समाज को सुधारने की एक तड़प थी। आज उसी वैचारिक अधिष्ठान को शास्त्रों और विवेक की कसौटी पर कसते हुए, मैं समाज के सम्मुख एक कड़वा सच रखना चाहता हूँ। मृत्युभोज—यानी किसी के जाने के दुख पर समाज का मिलकर स्वाद लेना—अति निंदनीय और क्रूर प्रथा बन चुका है।

 

महाभारत का संदेश और श्रीकृष्ण की नीति

​जब महाभारत का युद्ध टालने के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए, तब दुर्योधन ने उन्हें छप्पन भोग का आमंत्रण दिया। श्रीकृष्ण ने उस वैभवशाली भोजन को ठुकराते हुए महाभारत के उद्योग पर्व में स्पष्ट कहा था:

​सम्प्रीतिभोज्यानीमानि आपदाभोज्यानि वा पुनः।

न च सम्प्रीयसे राजन् न चैवापद्गता वयम्॥

​अर्थात्: “हे राजन्! व्यक्ति या तो प्रेमवश किसी के यहाँ भोजन ग्रहण करता है या फिर संकट काल (आपदा) में। आज न तो तुम्हारे मन में मेरे प्रति कोई प्रीति (प्रेम) है और न ही मैं किसी संकट में हूँ। फिर मैं तुम्हारा यह अहंकार से सना भोजन कैसे स्वीकार करूँ?”

​यही नियम मृत्युभोज पर लागू होता है। जिस परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा हो, जहाँ खिलाने वाले का मन चीत्कार कर रहा हो और खाने वाले के दिल में संवेदना न हो, वहाँ भोजन करना साक्षात् पाप और अपनी आत्मिक ऊर्जा को नष्ट करना है।

 

१६ संस्कार और ‘तेरहवीं’ का सच

​सनातन धर्म में मानव जीवन को पवित्र बनाने के लिए १६ संस्कारों का विधान है। प्रथम संस्कार ‘गर्भाधान’ है और अंतिम तथा १६वाँ संस्कार ‘अन्त्येष्टि’ है। जब विधाता और ऋषियों ने १७वाँ संस्कार बनाया ही नहीं, तो यह ‘तेरहवीं का महाभोज’ कहाँ से आ टपका?

​शास्त्रों (जैसे गरुड़ पुराण और स्मृतियों) में मृत्यु के पश्चात ‘सूतक निवृत्ति’ (शुद्धिकरण) और ‘श्राद्ध-तर्पण’ के निमित्त सात्विक रूप से ब्रह्म-भोज या संन्यासी-भोज का विधान है, ताकि दिवंगत आत्मा की शांति के लिए पुण्य संचय हो सके। परंतु आज के समाज ने उस सात्विक और सीमित विधान को विकृत करके ‘हलवा-पूड़ी और बारात जैसे पकवानों’ का उत्सव बना दिया है। यह शास्त्रों की आज्ञा नहीं, बल्कि सामाजिक अकर्मण्यता है।

 

आंसुओं से भीगा निकृष्ट अन्न

​ज़रा विचार कीजिए, जिस भोजन को बनाने की प्रक्रिया ही रुदन और शोक से घिरी हो…

​जहाँ लकड़ी फाड़ी जा रही हो—तो आँखों में आँसू हों,

​जहाँ आटा गूँथा जा रहा हो—तो दिल में अपनों को खोने का दर्द हो,

​जहाँ पूड़ियाँ तली जा रही हों—वहाँ दिवंगत की यादों का मातम हो…

​हर कृत्य जहाँ आंसुओं से भीगा हो, वह अन्न सात्विक कैसे हो सकता है? वह तो पूरी तरह से नकारात्मक ऊर्जा से युक्त निकृष्ट भोजन है। ऐसे भोजन को चाव से खाना मनुष्यता के पतन की पराकाष्ठा है।

 

पशुओं से भी बदतर मानव चेतना?

​प्रकृति के अनकहे नियमों को देखें, तो यदि किसी जानवर का साथी बिछुड़ जाता है, तो वह उस दिन चारा तक नहीं खाता। वह मूक पशु भी अपने साथी के वियोग में शोक प्रकट करता है। परंतु ८४ लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ कहलाने वाला यह ‘बुद्धिमान’ मानव, किसी जवान आदमी की मृत्यु पर भी पत्तलों पर टूट पड़ता है और हलवा-पूड़ी खाकर शोक मनाने का ढोंग करता है। इससे बढ़कर घृणित और विरोधाभासी कृत्य दूसरा क्या होगा?

 

मनीषियों का आह्वान और हमारा संकल्प

​यही कारण था कि महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, और पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जैसे युग-प्रवर्तक मनीषियों ने इस कुप्रथा का पुरजोर विरोध किया। यह प्रथा गरीब परिवारों को कर्ज के दलदल में धकेल देती है।

​जिस परिवार में विपदा आई हो, उसके साथ तन, मन और धन से खड़े होइए। उसे संबल दीजिए। परंतु बारहवीं या तेरहवीं के नाम पर होने वाले इस ‘उत्सव रूपी भोज’ का पूर्ण रूप से बहिष्कार कीजिए।

​यदि आप अपनी अंतरात्मा से सहमत हैं, तो आज ही संकल्प लें: “मैं किसी के मृत्युभोज (दिखावे वाले उत्सव) में शामिल होकर अन्न ग्रहण नहीं करूँगा और इस कुप्रथा को रोकने का हर संभव प्रयास करूँगा।”

 

 

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