करदाता का अंतहीन चक्रव्यूह: ‘दबाए’ गए मध्यमवर्ग और व्यवस्था के दोहरे चरित्र का प्रामाणिक दस्तावेज़
”मैंने तीस दिन रात-दिन एक करके काम किया। जब तनख्वाह मिली, तो सबसे पहले टैक्स कटा। फिर उस तनख्वाह से मोबाइल खरीदा, रिचार्ज कराया, बिजली का बिल भरा, पेट्रोल डलवाया, राशन-कपड़े-दवाई खरीदी, सड़क पर चलने का टोल दिया, और यहाँ तक कि सार्वजनिक शौचालय का उपयोग करने पर भी टैक्स दिया! सारी उम्र इस बहुस्तरीय टैक्स (Multi-layered Taxation) के ड्रामे से गुज़रकर अगर गलती से कुछ बचत (Savings) रह गई, तो बैंक के ब्याज पर फिर टैक्स दिया। लेकिन बदले में मिला क्या? न कोई सोशल सिक्योरिटी, न पेंशन, न मुफ़्त इलाज, न बच्चों के लिए अच्छे स्कूल और न साफ हवा-पानी। आखिर एक वेतनभोगी नागरिक कितनी बार टैक्स दे और क्यों? हमारा पैसा जा कहाँ रहा है?”
यह सवाल केवल एक करदाता का नहीं है, बल्कि देश की उस विशाल मूक आबादी का है जिसे व्यवस्था केवल एक ‘राजस्व जुटाने वाली मशीन’ (Revenue Machine) समझती है। आइए, भारत की इस ‘टैक्स क्रूरता’ और उसके बदले मिलने वाले शून्य के सच को आर्थिक आंकड़ों और सामाजिक हकीकतों के आईने में विस्तार से देखते हैं।
१. प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष टैक्स: ‘दोहरी मार’ का अर्थशास्त्र
भारत में एक नौकरीपेशा इंसान दुनिया के उन चुनिंदा नागरिकों में से है जो अपनी आय पर दोहरी चक्की में पिसता है:
डायरेक्ट टैक्स (Income Tax): एक वेतनभोगी व्यक्ति जैसे ही कमाता है, उसकी आय का एक बड़ा हिस्सा (५% से लेकर ३०% तक, सरचार्ज अलग से) ‘टीडीएस’ (TDS) के रूप में पहले ही काट लिया जाता है।
इनडायरेक्ट टैक्स (GST और एक्साइज): इनकम टैक्स देने के बाद बची हुई तनख्वाह को जब वह बाज़ार में खर्च करने निकलता है, तो सुई से लेकर कार तक, और नमक से लेकर जीवन रक्षक दवाओं तक पर वह ५%, १२%, १८% या २८% तक का जीएसटी (GST) देता है। पेट्रोल-डीजल पर लगने वाला वैट (VAT) और केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Excise Duty) तो इसे और भी डरावना बना देता है।
विडंबना की पराकाष्ठा: यदि आप ईमानदारी से टैक्स देकर बची हुई रकम को अपने भविष्य या बुढ़ापे के लिए बैंक में ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ (FD) करते हैं, तो उस पर मिलने वाले मामूली ब्याज पर भी सरकार ‘टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स’ (TDS) काट लेती है। यानी कमाने पर टैक्स, खर्च करने पर टैक्स और बचाने पर भी टैक्स!
२. तुलनात्मक अध्ययन: वैश्विक सुविधाएं बनाम भारतीय शून्यता
अकसर विकसित देशों (जैसे अमेरिका, यूके या स्कैंडिनेवियन देशों) का उदाहरण देकर भारत में टैक्स को सही ठहराया जाता है। लेकिन उन देशों और हमारे देश के बीच का अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि ‘जवाबदेही’ का है:
यूरोप / स्कैंडिनेवियन देशउच्च: (टैक्स ३०% – ५०%)– शत-प्रतिशत विश्वस्तरीय मुफ़्त शिक्षा, मुफ़्त स्वास्थ्य सुविधाएं, बेरोज़गारी भत्ता और बुढ़ापे में सम्मानजनक सामाजिक पेंशन।
भारत (मध्यमवर्ग): टैक्स दर उच्च (डायरेक्ट + इनडायरेक्ट)– न मुफ़्त इलाज (महँगे प्राइवेट अस्पताल मजबूरन), न मुफ़्त अच्छी शिक्षा (महँगे प्राइवेट स्कूल), सड़कों पर गड्ढे, दूषित हवा-पानी और शून्य सोशल सिक्योरिटी।
भारत का करदाता टैक्स तो यूरोप के स्तर का दे रहा है, लेकिन सुविधाएं आज भी उसे तीसरी दुनिया (Third World) के स्तर की मिल रही हैं। टैक्स देने के बाद भी उसे बच्चों की पढ़ाई के लिए मोटी फीस, बीमारी के लिए महँगा प्रीमियम या कर्ज़ और सुरक्षा के लिए निजी गार्ड्स या सोसायटियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
३. सारा पैसा गया कहाँ? व्यवस्था के छिद्र
करदाता के मन को जो बात सबसे ज़्यादा व्यथित करती है, वह यह है कि उसके पसीने की कमाई का उपयोग देश के बुनियादी ढांचे को सुधारने में कम, और कुछ विशिष्ट वर्गों के ऐशो-आराम और राजनीतिक स्वार्थों को साधने में ज़्यादा होता है:
नेताओं और जनप्रतिधियों के विशेषाधिकार: एक आम कर्मचारी ३०-४० साल सेवा करने के बाद भी बिना पेंशन (NPS के चक्रव्यूह में) घर लौटता है। दूसरी तरफ, यदि कोई व्यक्ति मात्र ५ साल के लिए भी सांसद (MP) या विधायक (MLA) बन जाए, तो उसकी जीवनभर की पेंशन, मुफ़्त हवाई-रेल यात्रा और इलाज की सुविधाएं पक्की हो जाती हैं।
फर्जी दिवालियापन और एनपीए (NPA): बैंकिंग सेक्टर के आंकड़े गवाह हैं कि बड़े-बड़े उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपयों के कर्ज़ को ‘राइट ऑफ’ (Write-off) या एनपीए (Non-Performing Assets) के नाम पर बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। विजय माल्या, नीरव मोदी जैसे लोग देश का पैसा लेकर विदेशों में ऐश करते हैं, और उस घाटे की भरपाई बैंकों के चार्जेस बढ़ाकर आम करदाता की जेब से की जाती है।
विज्ञापनों और चुनावों का फिजूलखर्च: हर साल हज़ारों करोड़ रुपए केवल राजनीतिक विज्ञापनों, भव्य रैलियों, मुफ्त की रेवड़ियों (Freebies) वाले लोक-लुभावन वादों और चुनावों के तामझाम में पानी की तरह बहा दिए जाते हैं।
४. वैचारिक जागृति: अंधभक्ति से ऊपर ‘देशभक्ति’
“समय आ गया है कि किसी की भक्ति से बढ़कर देश व देशवासियों के बारे में सोचें।”
लोकतंत्र में जनता मालिक होती है और सरकार उसकी ‘ट्रस्टी’ या सेवक। जब जनता राजनीतिक दलों या चेहरों के मोह में अंधी हो जाती है, तो वह अपने मूल अधिकारों पर सवाल उठाना बंद कर देती है। जब तक हम जाति, धर्म और खोखले राष्ट्रवाद के नाम पर आपस में लड़ते रहेंगे, तब तक परदे के पीछे बैठे ये व्यवस्था के परजीवी हमारा आर्थिक शोषण करते रहेंगे। वास्तविक देशभक्ति यह है कि हम सरकार से कौड़ी-कौड़ी का हिसाब मांगें।
निष्कर्ष: घिसटती जिंदगी या बदलाव की शुरुआत?
एक ईमानदार करदाता को ‘झंडू बाम’ समझकर हर मोड़ पर निचोड़ने की यह व्यवस्था तब तक नहीं बदलेगी, जब तक करदाता एक ‘वोट बैंक’ के रूप में एकजुट होकर सवाल नहीं पूछेगा। हमें एक ऐसा सिस्टम चाहिए जहाँ हमारे टैक्स की कीमत हमें सड़कों पर सुरक्षित सफ़र, अस्पतालों में सम्मानजनक इलाज और स्कूलों में बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के रूप में वापस मिले।
यह आलेख केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि देश के नीति-निर्माताओं के सोए हुए ज़मीर को जगाने और आम जनता की आँखों से भ्रम का पर्दा हटाने का एक शंखनाद है।
विवशताओं का महातंत्र: एक मजबूर व्यवस्था और बेबस नागरिकता का प्रामाणिक सच