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पैरासिटिक पैरवी: निजी झगड़ों से सामाजिक राजनीति और विनाश का चक्रव्यूह

 

​”मौके की नजाकत को देखकर हर कोई चाहता है कि इस लड़ाई में अपना फायदा ज़रूर लिया जाए। एक बेचारा अपनी मजबूरी में किसी के पास मदद के लिए जाता है, और दूसरा व्यक्ति उसकी मजबूरी का सौदा कर लेता है। वह उस झगड़े की आड़ में विरोधी से अपनी पुरानी रंजिश निकालने की ताक में लग जाता है। देखते ही देखते, जो लड़ाई दो व्यक्तियों के बीच शुरू हुई थी, वह पाँच-छह लोगों से होते हुए पूरे समाज में फैल जाती है। यहीं से शुरू होता है फायदे का वो घिनौना खेल, जिसमें पुलिस, राजनेता, सहयोगी और विरोधी… सब अपनी-अपनी रोटियाँ सेकने लगते हैं।”

​यह किसी एक मोहल्ले की कहानी नहीं, बल्कि मानव समाज की उस शाश्वत त्रासदी का खाका है जहाँ व्यक्तिगत विवादों को व्यवस्था और स्वार्थी तत्वों द्वारा ‘दुधारू गाय’ बना दिया जाता है। जब दो लोगों की आपसी तकरार में ‘तीसरे’ का प्रवेश होता है, तो वह न्याय करने नहीं, बल्कि अपने हिस्से का मुनाफा वसूलने आता है।

 

​दो से समाज तक: विवाद के विस्तार का मनोविज्ञान

​किसी भी छोटे विवाद के बड़े सामाजिक या राजनीतिक संकट में बदलने की प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म और खतरनाक होती है। इसे हम कुछ चरणों में समझ सकते हैं:

​१. मजबूरी का सौदा और तीसरे पक्ष का प्रवेश

​विवाद में फंसा पहला पक्ष जब खुद को कमज़ोर पाता है, तो वह अपनी मजबूरी में किसी रसूखदार या चालाक व्यक्ति के पास ‘पैरवी’ (मदद) के लिए जाता है। यहाँ खेल बदल जाता है। वह मददगार निस्वार्थ नहीं होता; उसके दिमाग में सामने वाले पक्ष से जुड़ी कोई ‘पुरानी रंजिश’ या अपना कोई पुराना हिसाब होता है। वह पीड़ित की मदद के बहाने अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी भुनाने के लिए मैदान में कूद पड़ता है। यहीं से दो लोगों का यह झगड़ा ‘तीसरे’ के प्रवेश के साथ एक नया और हिंसक मोड़ ले लेता है।

​२. गुटबाज़ी और सामाजिक ध्रुवीकरण

​जब एक तरफ से ताकत बढ़ती है, तो दूसरा पक्ष भी अपनी सुरक्षा या अहंकार में कुछ अन्य लोगों को इकट्ठा कर लेता है। अब यह लड़ाई दो लोगों की नहीं रह जाती। यह ‘पाँच बनाम छह’ का मुकाबला बन जाती है। धीरे-धीरे इसमें जातियाँ, धर्म, मोहल्ले या दल शामिल होने लगते हैं, और एक व्यक्तिगत मनमुटाव पूरे समाज को दो धड़ों में बाँट देता है।

 

​फायदे का बाज़ार: पुलिस, राजनेता और तंत्र की भूमिका

​जैसे ही कोई विवाद सामाजिक रूप लेता है, समाज के ‘परजीवी’ (Parasites) सक्रिय हो जाते हैं। हर कोई इस बहती गंगा में हाथ धोने के लिए दौड़ पड़ता है:

​पुलिस और प्रशासन का फायदा: खाकी और कानून के रखवालों के लिए यह विवाद एक आर्थिक अवसर बन जाता है। मामले को दबाने, बढ़ाने, धाराएं हल्की करने या संगीन बनाने के नाम पर दोनों पक्षों से उगाही का खेल शुरू होता है। न्याय की जगह ‘वसूली’ प्राथमिक हो जाती है।

​राजनेताओं की रोटियाँ: स्थानीय नेताओं और राजनीतिज्ञों को इसमें अपना वोट बैंक दिखाई देता है। वे एक पक्ष के साथ खड़े होकर खुद को उनका मसीहा घोषित कर देते हैं। उन्हें समाज की शांति से कोई सरोकार नहीं होता; उनका एकमात्र लक्ष्य इस विवाद की आग को तब तक जलाए रखना होता है, जब तक कि चुनाव न आ जाएं।

​सहयोगी और विरोधियों का गणित: जो कल तक तमाशबीन थे, वे आज रणनीतिकार बन जाते हैं। सहयोगी अपनी वफादारी की कीमत वसूलते हैं और विरोधी इस ताक में रहते हैं कि कैसे इस विवाद के बहाने मुख्य किरदारों को सामाजिक या आर्थिक रूप से बर्बाद किया जा सके।

 

​इतिहास और वर्तमान के उदाहरण: जब अपनों की लड़ाई में ‘तीसरा’ जीता

​यह थ्योरी कि “दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा” सभ्यताओं को तबाह कर चुकी है। इतिहास इसके उदाहरणों से भरा पड़ा है:

​ब्रिटिश हुकूमत और ‘फूट डालो और राज करो’: भारत के राजा-महाराजा और नवाब आपस में छोटी-छोटी सीमाओं और अहंकारों के लिए लड़ते थे। वे अपनी मजबूरी में अंग्रेजों के पास ‘पैरवी’ और सैन्य मदद के लिए गए। अंग्रेजों ने उनकी आपसी रंजिश का फायदा उठाया, दोनों पक्षों को कमज़ोर किया, और अंत में दोनों को हटाकर खुद पूरे देश के शासक बन बैठे।

​गाँव-देहात की अदालती रंजिशें: आज भी भारत के ग्रामीण अंचलों में दो भाइयों या पड़ोसियों के बीच ‘मेढ़’ (ज़मीन की सीमा) का छोटा सा विवाद होता है। पैरवीकारों, वकीलों, दलालों और पुलिस के चक्कर में दोनों पक्ष अपनी पूरी संपत्ति और ज़मीन बेच देते हैं। अंत में दोनों कंगाल होकर अदालत के बाहर खड़े रहते हैं।

 

​त्रासद अंत: तमाशा देखते मुख्य किरदार और बेकसूरों की मौत

​इस पूरे चक्रव्यूह का सबसे भयावह और विडंबनापूर्ण पहलू वह होता है जब खेल अपने अंतिम चरण में पहुँचता है।

​जिस बात पर मूल रूप से झगड़ा शुरू हुआ था (चाहे वह कोई छोटी सी गाली हो, मामूली सा पैसों का लेन-देन हो, या कोई ज़मीन का टुकड़ा हो), वह इतनी पीछे छूट जाती है कि मुख्य किरदारों को खुद याद नहीं रहता कि वे लड़ क्यों रहे थे। वे दोनों किनारे पर मूकदर्शक बनकर खड़े हो जाते हैं और देखते हैं कि उनके नाम पर पूरा समाज आपस में लड़ रहा है।

​अंत में, जब दोनों पक्षों को अपनी बर्बादी का अहसास होता है, तो वे बंद कमरों में बैठकर चुपचाप आपस में समझौता (सुलह) कर लेते हैं। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उस तथाकथित ‘सामाजिक गौरव’ की लड़ाई में न जाने कितने ऐसे बेकसूर युवा और समर्थक मार दिए जाते हैं या जेलों में सड़ जाते हैं, जिन्हें उस मूल विवाद की पृष्ठभूमि का ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ भी मालूम नहीं था।

 

​निष्कर्ष: पैरवी की संस्कृति का बहिष्कार ज़रूरी

​यह आलेख इस बात की चेतावनी है कि जब तक हम अपने व्यक्तिगत विवादों को खुद बैठकर सुलझाने का धैर्य नहीं दिखाएंगे, तब तक यह समाज और व्यवस्था हमारा शिकार करती रहेगी। ‘पैरवी’ की यह संस्कृति वास्तव में एक दलदल है। समझदारी इसी में है कि विवाद के पहले ही मोड़ पर बातचीत का रास्ता चुना जाए, इससे पहले कि आपकी मजबूरी किसी और के मुनाफे का विज्ञापन बन जाए।

 

 

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