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युद्ध या हथियारों का बाज़ार: वैश्विक संघर्षों के पीछे का कड़वा सच

 

​”कौन कहता है कि इराक और सीरिया में जंग हो रही है? अरे जनाब, वहाँ तो आधुनिक हथियारों का विज्ञापन हो रहा है। अगर ऐसा नहीं होता, तो आईएसआईएस (ISIS) के मात्र चालीस हज़ार रेगिस्तानी मच्छरों को खत्म करने में दुनिया की पाँच-छह महाशक्तियों को सालों का समय नहीं लगता।”

​यह पंक्तियाँ किसी आम इंसान की नाराज़गी नहीं, बल्कि समकालीन वैश्विक राजनीति का वह कड़वा यथार्थ हैं जिसे अकसर ‘शांति स्थापना’ और ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के भारी-भरकम शब्दों के पीछे छिपा दिया जाता है। यदि हम इतिहास से लेकर वर्तमान तक के छोटे और बड़े संघर्षों का बारीक विश्लेषण करें, तो एक बात साफ़ हो जाती है: कई बार महाशक्तियों का लक्ष्य किसी आतंकी संगठन या युद्ध को ‘ख़त्म करना’ नहीं, बल्कि उसके ‘फैलाव को नियंत्रित रखना’ होता है, ताकि हथियारों की दुकानों पर कभी ताला न लगे।

 

​हथियारों का लाइव विज्ञापन: सीरिया और इराक का मॉडल

​सीरिया और इराक के गृहयुद्ध को दुनिया ने एक मानवीय त्रासदी के रूप में देखा, लेकिन वैश्विक हथियार निर्माताओं के लिए यह एक ‘लाइव टेस्टिंग ग्राउंड’ (परीक्षण क्षेत्र) था। जब महाशक्तियों ने वहाँ हस्तक्षेप किया, तो उन्होंने न केवल अपने पुराने हथियारों के स्टॉक को ठिकाने लगाया, बल्कि अपने नए स्टील्थ फाइटर जेट्स, क्रूज़ मिसाइलों और ड्रोन तकनीकों का दुनिया के सामने प्रदर्शन भी किया।

​यह एक खुला रहस्य बन चुका है कि आतंकवाद का ‘हौआ’ खड़ा करके विकासशील देशों—विशेषकर भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के बीच असुरक्षा की भावना को बनाए रखा जाता है। जब तक पड़ोसियों के रिश्ते खराब रहेंगे, तब तक हथियारों का यह अरबों-खरबों का बाज़ार फलता-फूलता रहेगा। इन देशों के बीच के तनाव को हवा देने में परदे के पीछे से इन्हीं हथियार व्यापारियों के लॉबिस्ट काम करते हैं।

 

​इतिहास की गवाही: पहले भी यही खेल खेला गया

​वैश्विक संघर्षों को खींचने और उन्हें हथियारों के विज्ञापन में बदलने का यह खेल नया नहीं है। इतिहास के पन्ने ऐसी ही रणनीतियों से भरे पड़े हैं:

​वियतनाम युद्ध (1955–1975): अमेरिका ने बी-52 बमवर्षक विमानों से लेकर ‘एजेंट ऑरेंज’ जैसे रसायनों का परीक्षण इसी युद्ध में किया। यह युद्ध सालों-साल खिंचता रहा क्योंकि सैन्य-औद्योगिक परिसर (Military-Industrial Complex) के मुनाफ़े दांव पर लगे थे।

अफगान-सोवियत युद्ध (1979–1989): शीतयुद्ध के दौरान अफ़गानिस्तान को महाशक्तियों ने अपनी बंदूकों और मिसाइलों को आजमाने का अखाड़ा बना दिया। मुजाहिदीन को दिए गए ‘स्टिंगर मिसाइल’ जैसे हथियार वास्तव में सोवियत तकनीक के खिलाफ अमेरिकी हथियारों का सीधा विज्ञापन थे।

​इराक युद्ध (2003): ‘सामूहिक विनाश के हथियारों’ (WMDs) का झूठा डर दिखाकर इराक पर हमला किया गया। सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद भी सालों तक इराक सुलगता रहा, क्योंकि वहाँ अमेरिकी निजी सुरक्षा एजेंसियों (Private Military Contractors) और हथियार कंपनियों के आर्थिक हित जुड़े हुए थे।

 

​समसामयिक परिदृश्य: नया भूगोल, पुराना खेल

​आज के दौर में भी यदि हम वैश्विक स्तर पर हो रहे छोटे या सीमित युद्धों को देखें, तो नीति वही पुरानी नज़र आती है:

यूक्रेन संघर्ष: आज यूक्रेन का मैदान दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों की प्रदर्शनी बन चुका है। नाटो देशों द्वारा भेजी जा रही मिसाइलें, वायु रक्षा प्रणालियाँ (Air Defense Systems) और ड्रोन तकनीक रूस के खिलाफ सीधे युद्ध के मैदान में टेस्ट की जा रही हैं। मीडिया में इन हथियारों की सफलता की कहानियाँ छपती हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से अन्य देशों के लिए ‘कैटलॉग’ का काम करती हैं।

​मध्य-पूर्व (मिडल-ईस्ट) का नया उथल-पुथल: गाजा और लेबनान के हालिया संघर्षों में जिस तरह ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) आधारित ड्रोनों और पेजर-सटीक हमलों का इस्तेमाल हुआ, उसने युद्ध के मैदान को एक टेक-शो में बदल दिया है। दुनिया भर की रक्षा एजेंसियां इस तकनीक को देख रही हैं और आने वाले समय में इसकी मांग वैश्विक बाज़ार में बढ़ेगी।

 

​निष्कर्ष: कौड़ी-कौड़ी का हिसाब और अरबों का खेल

​दुनिया भर के आम नागरिक और गरीब देश जहाँ अपनी मूलभूत ज़रूरतों, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए एक-एक कौड़ी का हिसाब लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर युद्ध के इन कृत्रिम और अनवरत चलते चक्रव्यूह में करोड़ों-अरबों डॉलर पानी की तरह बहा दिए जाते हैं।

​जब तक महाशक्तियों का उद्देश्य शांति की स्थापना के बजाय अपने हथियारों के बाज़ार पर कब्ज़ा बनाए रखना होगा, तब तक दुनिया के किसी न किसी कोने में ‘आतंकवाद’ या ‘पड़ोसी का डर’ ज़िंदा रखा जाएगा। यह समकालीन विश्व राजनीति का वह भयावह दार्शनिक सच है, जिसे समझे बिना हम कभी भी पूर्ण वैश्विक शांति की कल्पना नहीं कर सकते।

 

 

 

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