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मर्यादा और महापाप: देवी पूजा के देश में कन्या भ्रूण हत्या का कलंक

 

​”जहां एक तरफ नवरात्र के पावन महीने में साक्षात् देवी के रूप में कन्याओं की पूजा की जाती है, वहीं दूसरी तरफ एक कड़वी और डरावनी सच्चाई यह भी है कि पिछले २० वर्षों में लगभग १० मिलियन (१ करोड़) कन्याओं को जन्म लेने से पहले ही गर्भ में मार दिया गया। क्या हर दूसरे-तीसरे घर में होने वाली यह भ्रूण हत्या उस देश में जायज है जो खुद को औरतों को देवी मानने वाला समाज कहता है? क्या ऐसे अंतर्विरोधों के साथ हमारा देश वाकई महान कहलाने का अधिकारी है?”

​यह किसी एक व्यक्ति का आक्रोश नहीं, बल्कि हमारे समाज के उस खोखलेपन और दोहरे चरित्र पर लगा एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है, जो एक तरफ तो आस्था के ऊंचे-ऊंचे पंडाल सजाता है और दूसरी तरफ अपने ही घर के आँगन को बेटियों की किलकारियों से महरूम कर देता है।

 

​धार्मिक पाखंड बनाम सामाजिक हकीकत

​भारतीय संस्कृति में स्त्री को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है। वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्रों में हम नौ दिनों तक उपवास रखते हैं, कन्याओं के पैर छूते हैं, उन्हें हलवा-पूरी खिलाते हैं और उनसे समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं। हिंदू धर्मग्रंथों में गर्व से उद्धृत किया जाता है— “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” (जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं)।

​लेकिन जैसे ही नवरात्र के नौ दिन बीतते हैं, समाज वापस अपने उसी आदिम और दकियानूसी ढर्रे पर लौट आता है जहाँ बेटी को ‘पराया धन’, ‘बोझ’ या ‘वंश को आगे न बढ़ाने वाली’ मान लिया जाता है। चिकित्सा विज्ञान द्वारा दी गई ‘अल्ट्रासाउंड’ जैसी जीवन रक्षक तकनीक का इस्तेमाल भारत के अनगिनत परिवारों ने कोख में पल रहे बच्चे का लिंग जांचने और यदि वह लड़की है, तो उसे चुपचाप मिटा देने के लिए किया। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जिस देश की संस्कृति में कन्या का पूजन अनिवार्य है, उसी देश को वैज्ञानिक रिपोर्टों में “लड़कियों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों” में शुमार कर दिया जाता है।

 

​१० मिलियन का आंकड़ा: एक अदृश्य नरसंहार

​जब वैश्विक और राष्ट्रीय रिपोर्टें यह खुलासा करती हैं कि भारत में पिछले दो दशकों में लगभग १ करोड़ (१० मिलियन) बच्चियों को दुनिया देखने से पहले ही मार दिया गया, तो यह केवल एक सांख्यिकीय आँकड़ा (Statistical Data) नहीं होता। यह एक ऐसा अदृश्य और खामोश नरसंहार है जिसे किसी विदेशी सेना ने नहीं, बल्कि हमारे अपने पढ़े-लिखे समाज ने अंजाम दिया है।

​यह धारणा पूरी तरह गलत है कि कन्या भ्रूण हत्या केवल अशिक्षित या ग्रामीण क्षेत्रों की समस्या है। विभिन्न अध्ययनों और जनगणना के आंकड़ों से यह साफ़ हुआ है कि देश के सबसे समृद्ध, शहरी और उच्च साक्षरता दर वाले इलाकों में ‘बाल लिंगानुपात’ (Child Sex Ratio) सबसे ज़्यादा असंतुलित है। जहाँ तकनीक तक पहुँच आसान थी और जहाँ लोग कानून की कमियों को पैसों के दम पर छिपा सकते थे, वहाँ बेटियों को सबसे ज़्यादा निशाना बनाया गया। यह दिखाता है कि हमारी शिक्षा और आर्थिक प्रगति ने हमारी सोच को आधुनिक नहीं, बल्कि और अधिक क्रूर और स्वार्थी बना दिया है।

 

क्या हमारा देश महान है?

​कोई भी राष्ट्र केवल अपनी भौगोलिक सीमाओं, परमाणु मिसाइलों, आसमान छूती जीडीपी (GDP) या प्राचीन गौरवगाथाओं से महान नहीं बनता। किसी भी देश की महानता की वास्तविक कसौटी यह होती है कि वह अपने सबसे कमज़ोर और असुरक्षित वर्ग—यानी अपनी अजन्मी बेटियों को कितना सुरक्षित माहौल दे पाता है।

​यदि देश का एक बड़ा हिस्सा अपनी संकीर्ण मानसिकता, दहेज़ रूपी दानव के डर, और ‘बुढ़ापे का सहारा केवल बेटा ही होता है’ जैसी रूढ़िवादी सोच के कारण बेटियों को कोख में ही मार रहा है, तो हमें खुद को ‘महान’ कहने से पहले सौ बार सोचना होगा। हम अपनी कमियों पर ‘महानता’ का पर्दा डालकर आगे नहीं बढ़ सकते।

 

​निष्कर्ष: पूजा से परे, वजूद की लड़ाई

​बेटियों को किसी काल्पनिक देवी के ऊंचे आसन पर बिठाकर उनकी पूजा करने की ज़रूरत नहीं है; ज़रूरत इस बात की है कि उन्हें इस धरती पर इंसानों की तरह जीने, सांस लेने और बढ़ने का समान अधिकार मिले। जब तक हम अपनी कोख को कत्लगाह बनने से नहीं रोकेंगे, तब तक हमारे द्वारा की जाने वाली हर पूजा, हर उपवास और हर धार्मिक अनुष्ठान केवल और केवल एक पाखंड मात्र रहेगा।

​महानता का मार्ग बंदूकों या नारों से नहीं, बल्कि घर-घर की सोच बदलने से होकर गुज़रता है। जब तक हर घर में बेटी का जन्म एक उत्सव नहीं बनेगा, तब तक हमारा यह गौरव अधूरा रहेगा।

 

 

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