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काशी विश्वनाथ मंदिर बनाम ज्ञानवापी परिसर: भाग-५ (अंतिम भाग) – आधुनिक वैज्ञानिक सर्वे, एएसआई रिपोर्ट और व्यास जी के तहखाने का सच

(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का पाँचवाँ और अंतिम भाग है। पिछले चार भागों में हमने आदि विश्वेश्वर मंदिर के प्राचीन वैभव, औरंगज़ेब के विध्वंस, महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा कराए गए नव-निर्माण और वर्ष १९९१ के ऐतिहासिक मुकदमे का विश्लेषण किया था। इस अंतिम भाग में हम समकालीन कानूनी मोड़ों, एएसआई (ASI) की वैज्ञानिक खोजों और वर्तमान अदालती स्थिति का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत करेंगे।)
वर्ष २०२१ में काशी की पांच हिम्मती महिलाओं (राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक) द्वारा वाराणसी की अदालत में एक नया मुकदमा दायर किए जाने के बाद यह विवाद अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया। इन्होंने मांग की कि इन्हें ज्ञानवापी परिसर की बाहरी दीवार पर स्थित मां श्रृंगार गौरी की नियमित और दैनिक पूजा करने का अधिकार दिया जाए। इसी मुकदमे ने आगे चलकर पूरे परिसर के वैज्ञानिक और पुरातात्विक सर्वेक्षण का मार्ग प्रशस्त किया।
आइए इस अंतिम भाग में वज़ूखाने की खोज, एएसआई की रिपोर्ट और वर्तमान कानूनी घटनाक्रमों को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

१. मई २०२२: वज़ूखाने में ‘शिवलिंग’ मिलने का दावा

वाराणसी कोर्ट के आदेश पर मई २०२२ में ज्ञानवापी परिसर का एक प्रारंभिक वीडियोग्राफी सर्वे (Advocate Commissioner Survey) कराया गया। इस सर्वे के आखिरी दिन, १६ मई २०२२ को मस्जिद के वज़ूखाने (Ablution Tank – जहाँ नमाजी हाथ-पैर धोते हैं) के बीचों-बीच एक अत्यंत प्राचीन और विशाल काली संरचना प्राप्त हुई
  • पक्षों के दावे: हिंदू पक्ष ने हर्षोल्लास के साथ दावा किया कि यह साक्षात ‘बाबा आदि विश्वेश्वर का शिवलिंग’ है, जो १२ फीट ८ इंच व्यास का है। इसके विपरीत, मुस्लिम पक्ष (अंजुमन इंतजामिया) ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह कोई शिवलिंग नहीं, बल्कि एक पुराना और निष्क्रिय हो चुका ‘फव्वारा’ (Fountain) है।
  • सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: मामला देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट ने कानून-व्यवस्था और धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए वज़ूखाने के उस विशिष्ट क्षेत्र को सील (Sealed & Protected) करने का आदेश दिया, हालांकि मुसलमानों को मस्जिद के बाकी हिस्से में नमाज पढ़ने की अनुमति जारी रखी।


२. एएसआई (ASI) का ९२ दिनों का वैज्ञानिक सर्वे और उसके चौंकाने वाले निष्कर्ष

वज़ूखाने के विवाद के बाद, वाराणसी जिला अदालत और आगे चलकर इलाहाबाद हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानवापी परिसर (सील किए गए वज़ूखाने को छोड़कर) के व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षण की अनुमति प्रदान की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग राडार (GPR) और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके लगातार ९२ दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे किया और जनवरी २०२४ में अपनी अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक की।

एएसआई की आधिकारिक रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:

  1. पहले से मौजूद विशाल हिंदू मंदिर: एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला कि “वर्तमान संरचना (मस्जिद) के निर्माण से पहले वहाँ एक बहुत बड़ा और भव्य हिंदू मंदिर अस्तित्व में था”
  2. पश्चिमी दीवार का प्रामाणिक सच: रिपोर्ट में वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया गया कि मस्जिद की पश्चिमी दीवार पूरी तरह से एक प्राचीन हिंदू मंदिर का बचा हुआ हिस्सा (Remnant) है। इस दीवार पर राजपूत और नागर स्थापत्य शैली साफ नजर आती है।
  3. ३२ शिलालेख (Inscriptions): परिसर की दीवारों और मलबे से ३२ प्राचीन शिलालेख मिले, जो देवनागरी, तेलुगु और कन्नड़ जैसी लिपियों में लिखे गए थे। इन शिलालेखों में महाप्रतापी राजाओं और हिंदू देवी-देवताओं (जैसे ‘रुद्र’ और ‘विश्वेश्वर’) के नामों का स्पष्ट उल्लेख था।
  4. ३५० से अधिक हिंदू अवशेष: मलबे की निचली परतों से देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, नक्काशीदार खंभे, जानवरों की आकृतियां (जैसे व्याल आकृतियां जिन्हें बाद में फूलों में बदला गया) और मिट्टी के प्राचीन पात्र मिले।

                     [ एएसआई (ASI) वैज्ञानिक रिपोर्ट - जनवरी २०२४ ]
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[ संरचनात्मक साक्ष्य ]                                                 [ पुरातात्विक साक्ष्य ]
• पश्चिमी दीवार शुद्ध रूप से मंदिर का हिस्सा।                          • देवनागरी और दक्षिण भारतीय लिपियों में ३२ शिलालेख।
• मंदिर के चबूतरे और खंभों पर टिकी मस्जिद।                             • खंडित मूर्तियां, कलश और ३५० से अधिक हिंदू अवशेष।


३. जनवरी २०२४: व्यास जी के तहखाने में ३१ साल बाद पूजा की बहाली

ASI की इस ऐतिहासिक रिपोर्ट के तुरंत बाद, ३१ जनवरी २०२४ को वाराणसी जिला अदालत के जज ए. के. विश्वेश ने अपने सेवाकाल के आखिरी दिन एक अभूतपूर्व आदेश सुनाया।
  • व्यास जी का तहखाना (Vyas Ka Tehkhana): यह मस्जिद के दक्षिणी हिस्से के नीचे स्थित एक प्राचीन भूमिगत कमरा है, जहाँ वर्ष १९९३ तक व्यास परिवार नियमित रूप से मूर्तियों की पूजा करता आ रहा था। मुलायम सिंह यादव सरकार के मौखिक आदेश पर इसे बंद कर दिया गया था। 
  • आरती और पूजा शुरू: कोर्ट ने जिला प्रशासन को आदेश दिया कि ७ दिनों के भीतर इस तहखाने के लोहे के बैरिकेड्स हटाए जाएं और हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया जाए। प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उसी रात (३१ जनवरी की रात) बैरिकेड्स हटाए और ३१ वर्षों के लंबे इंतजार के बाद व्यास जी के तहखाने में शंखनाद और बाबा विश्वनाथ की मंगला आरती पुनः शुरू हुई, जो आज भी अनवरत जारी है।


४. वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर विशेष लोक अदालत

इस कानूनी मोड़ के बाद, देश की शीर्ष न्यायपालिका ने इस मामले को सुलझाने के लिए एक अनोखी पहल की है:
  • मध्यस्थता से इनकार: सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में दोनों पक्षों से कोर्ट के बाहर सौहार्दपूर्ण समाधान (Mediation) की अपील की थी। हालांकि, जुलाई २०२६ में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों के वकीलों ने साफ कर दिया कि यह मामला अत्यधिक जटिल और आस्था से जुड़ा है, इसलिए वे मध्यस्थता के बजाय अदालत के अंतिम गुण-दोष (Merits) पर आधारित फैसले को ही स्वीकार करेंगे।
  • विशेष लोक अदालत (अगस्त २०२६): इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट के ७५वें स्थापना वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘समाधान समारोह-२०२६’ के तहत इस मामले को २१, २२ और २३ अगस्त २०२६ को होने वाली विशेष लोक अदालत (Special Lok Adalat) के समक्ष विचार के लिए भेजा गया है।
  • हाईकोर्ट की कार्रवाई: इसी कारण से, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वज़ूखाने के बाकी बचे हिस्से के वैज्ञानिक सर्वे की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई को २४ अगस्त २०२६ तक के लिए टाल दिया है, ताकि सुप्रीम कोर्ट की लोक अदालत की कार्यवाही का रुख साफ हो सके।


श्रृंखला का तार्किक निष्कर्ष (Closing Statement)

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी परिसर का यह सफर केवल एक कानूनी भूमि विवाद नहीं है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास, विज्ञान और करोड़ों लोगों की अगाध आस्था का जीवंत दस्तावेज है। सन ११९४ में ऐबक के प्रहार से लेकर, १६६९ में औरंगज़ेब की कट्टरता, महारानी अहिल्याबाई के संकल्प और आज एएसआई की अत्याधुनिक रडार तकनीक (GPR) तक, समय ने हर कालखंड में इस स्थान की गवाही दी है।
यह विवाद अब अपने सबसे परिपक्व और वैधानिक दौर में है। व्यास जी के तहखाने में गूँजती घंटियाँ और पश्चिमी दीवार के प्राचीन पत्थर इस बात के साक्षात प्रमाण हैं कि इतिहास के घावों को केवल सच और न्याय के जरिए ही भरा जा सकता है। अब देश की सर्वोच्च अदालत और आने वाले समय के न्यायिक निर्णय ही यह तय करेंगे कि महादेव का यह मूल अविनाशी दरबार अपने पूर्ण वैभव को कब और किस रूप में प्राप्त करेगा।

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