images (29)

प्रतिस्पर्धा बनाम गृहयुद्ध: बढ़ती आबादी और सामाजिक तनाव का नया चक्रव्यूह

“प्रतिस्पर्धा बहुत ही अच्छी चीज़ होती है, इससे गुणवत्ता बढ़ती है। लेकिन जीवन की छोटी-छोटी चीज़ों में भी अगर यह हद से ज़्यादा बढ़ने लगे, तो इसका रूप नकारात्मक हो जाता है और सामाजिक तनाव जन्म लेता है। भारत में आज एक छोटी सी नौकरी हो, किराने की दुकान हो या मंदिर के पुजारियों के बीच का आंतरिक तालमेल—हर जगह अंधी प्रतिस्पर्धा है। यह छोटी-छोटी रोज़मर्रा की प्रतिस्पर्धाएँ किसी भी समाज में गृहयुद्ध का पहला लक्षण होती हैं, और भारत में इसकी सबसे बड़ी वजह अनियंत्रित रूप से बढ़ती आबादी है।”

यह विचार किसी प्रतियोगिता की सामान्य समीक्षा नहीं है, बल्कि मानव इतिहास और समकालीन भारतीय समाज के उस कड़वे सच की ओर इशारा करता है जहाँ ‘सकारात्मक प्रतिस्पर्धा’ (Healthy Competition) अब ‘अस्तित्व के संघर्ष’ (Survival of the Fittest) में बदल चुकी है। जब संसाधन सीमित हों और उपभोक्ता असीमित, तो प्रतिस्पर्धा विकास का माध्यम नहीं, बल्कि विनाश का कारण बनने लगती है।

गुणवत्ता से गृहयुद्ध तक का सफर: अंधी प्रतिस्पर्धा का अर्थशास्त्र

पूंजीवाद और आधुनिक अर्थशास्त्र हमें सिखाता है कि प्रतिस्पर्धा से बाज़ार में सुधार आता है, ग्राहकों को बेहतर सेवा मिलती है और प्रतिभाएँ निखरती हैं। यह नियम तब तक काम करता है जब तक अवसर और बुनियादी संसाधन समाज के पास एक संतुलित मात्रा में उपलब्ध हों।

लेकिन जब आबादी का दबाव इतना बढ़ जाए कि एक अदने से चपरासी या क्लर्क के पद के लिए लाखों पीएचडी और इंजीनियर डिग्री धारक कतार में खड़े हो जाएं, तो वहाँ गुणवत्ता नहीं बढ़ती, बल्कि कुंठा (Frustration) और सामाजिक विद्वेष बढ़ता है। आज भारत में एक ही गली में खुली चार किराने की दुकानें ग्राहकों को बेहतर सामान देने के लिए नहीं लड़ रहीं, बल्कि एक-दूसरे के वजूद को मिटाकर खुद को ज़िंदा रखने की जद्दोजहद में लगी हैं। यहाँ तक कि आस्था के केंद्र माने जाने वाले मंदिरों में भी पुजारियों के बीच चढ़ावे, वर्चस्व और यजमानों को लेकर होने वाली खींचतान इसी मानसिक संकीर्णता का प्रमाण है।

इतिहासकार और समाजशास्त्री मानते हैं कि जब किसी समाज में जीवित रहने की यह रोज़मर्रा की लड़ाई (Daily Friction) इतनी सघन हो जाती है, तो वह समाज आंतरिक रूप से खोखला होने लगता है। छोटी-छोटी बातों पर सड़क पर होने वाली हिंसा (Road Rage), पड़ोसियों के छोटे विवादों पर कत्ल हो जाना, यह सब इसी दबी हुई कुंठा के विस्फोट हैं, जो आगे चलकर बड़े पैमाने पर गृहयुद्ध का कारण बनते हैं।

बढ़ती आबादी: इस महासंकट की असली जड़

इस समूची नकारात्मक प्रतिस्पर्धा के पीछे जो सबसे मुख्य और भयावह कारक काम कर रहा है, वह है—बढ़ती आबादी। भारत दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। ज़मीन उतनी ही है, पानी के स्रोत सीमित हैं, रोज़गार के साधन सीमित हैं और अवसर बेहद कम हैं।

संसाधनों की कमी: जब एक अनार और सौ बीमार वाली स्थिति उत्पन्न होती है, तो नैतिकता और सामाजिक समरसता सबसे पहले दम तोड़ती है।

धैर्य का अंत: जब लोगों को दिखने लगता है कि बिना छीने या बिना दूसरों को पीछे धकेले उन्हें उनका हक नहीं मिलेगा, तो सहयोग की भावना समाप्त हो जाती है। हर व्यक्ति दूसरे को अपना शत्रु या प्रतिस्पर्धी मानने लगता है।

ऐतिहासिक संदर्भ: जब प्रतिस्पर्धा ने गृहयुद्ध का रूप लिया

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश या सभ्यता में संसाधनों की भारी कमी हुई और आबादी का दबाव बढ़ा, तो वहाँ आंतरिक संघर्ष और गृहयुद्ध निश्चित हो गए:

रवांडा का गृहयुद्ध (1994): ऊपरी तौर पर यह तुत्सी और हुतु जनजातियों के बीच का जातीय संघर्ष था। लेकिन इसके पीछे का आर्थिक और भौगोलिक सच यह था कि रवांडा अफ्रीका के सबसे घनी आबादी वाले देशों में से एक था, जहाँ कृषि योग्य भूमि और रोज़गार के लिए भयंकर आंतरिक प्रतिस्पर्धा चल रही थी। इसी सूक्ष्म प्रतिस्पर्धा ने अंततः एक भीषण नरसंहार और गृहयुद्ध का रूप ले लिया।

फ्रांसीसी क्रांति (1789): फ्रांस की क्रांति के पीछे केवल राजनीतिक कारण नहीं थे। बढ़ती आबादी और अकाल के कारण अनाज (रोटी) की कमी हो गई थी। रोटी के एक-एक टुकड़े के लिए बाज़ारों में होने वाली रोज़मर्रा की प्रतिस्पर्धा और छीना-झपटी ने अंततः पूरी व्यवस्था के खिलाफ एक हिंसक क्रांति और गृहयुद्ध की नींव रख दी थी।

निष्कर्ष: चेतावनी की कगार पर खड़ा समाज

‘प्रतिस्पर्धा बनाम युद्ध’ के इस दार्शनिक और व्यावहारिक द्वंद्व का सबसे बड़ा सबक यही है कि हमें समय रहते अपनी सीमाओं को पहचानना होगा। यदि राज्य और समाज मिलकर जनसंख्या नियंत्रण, संसाधनों के समान वितरण और नए अवसरों के सृजन पर काम नहीं करते, तो यह छोटी-छोटी गलियों और दुकानों से शुरू हुई ‘वर्चस्व की जंग’ पूरे देश को सामाजिक बिखराव की ओर धकेल देगी।

भविष्य के युद्ध सीमाओं पर मिसाइलों से नहीं, बल्कि अपनों के बीच रोटी, रोज़गार और पानी के लिए लड़े जा सकते हैं। इस भयावह सच को स्वीकार कर बुनियादी सुधार करना ही इस संभावित महासंकट का एकमात्र समाधान है।

हिटलर बनाम ‘हमारे हिटलर’: चेहरों और हथियारों का बहरूपिया खेल — एक तीक्ष्ण व्यंग्य

http

s://shoot2pen.in/author-ashwini-rai-arun/article/world-poetry-day/

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *