संवैधानिक प्रगति बनाम कानूनी प्रतिगमन: SC/ST संशोधन ऐक्ट २०१८ और रॉलेट ऐक्ट १९१९ का तुलनात्मक विमर्श
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: स्वतंत्रता का मूल्य और आधुनिक काले कानून
किसी भी स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की पहली पहचान यह होती है कि वहाँ नागरिक अधिकार सुरक्षित हों और न्यायपालिका का विवेक कार्यपालिका के राजनीतिक स्वार्थों से सर्वोपरि हो। भारत को स्वतंत्रता ब्रिटिश राज की दमनकारी नीतियों और काले कानूनों के खिलाफ एक लंबे संघर्ष के बाद मिली थी। परंतु आज जब हम स्वतंत्र भारत की विधिक व्यवस्था को देखते हैं, तो यह गंभीर और कड़वा सवाल उठना लाज़मी हो जाता है कि क्या हम वास्तव में आगे बढ़ रहे हैं या इतिहास के उसी अंधकार युग की ओर लौट रहे हैं जहाँ नागरिक स्वतंत्रता की बलि राजनीतिक तुष्टिकरण की वेदी पर चढ़ा दी जाती है?
सन २०१८ में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में किया गया संशोधन और उसकी तुलना सन १९१९ के दमनकारी ‘रॉलेट ऐक्ट’ से करना, आज के दौर का सबसे साहसिक और विचारणीय विमर्श है। यह आलोचना इस बात की पड़ताल करती है कि क्या ऐसे कानून देश को सामाजिक समरसता की ओर ले जा रहे हैं या फिर आपसी वैमनस्यता की खाई को और गहरा कर रहे हैं।
१. न्यायपालिका की चेतना बनाम कार्यपालिका का राजनीतिक प्रतिशोध
२० मार्च २०१८ को भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने समाज में इस कानून के बढ़ते दुरुपयोग और निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कुछ अत्यंत मानवीय और तर्कसंगत दिशा-निर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि—”किसी भी नागरिक के सिर पर चौबीसों घंटे बिना जांच के गिरफ्तारी की तलवार लटके रहना एक सभ्य समाज का लक्षण नहीं है।”
आइए देखें कि न्यायपालिका का वह मानवीय विवेक क्या था और राजनीति ने उसे किस तरह कुचला:
न्यायालय के तीन मुख्य सुरक्षा कवच (२० मार्च २०१८):
१. प्रारंभिक जाँच अनिवार्य: कोई ऑटोमैटिक या त्वरित गिरफ्तारी नहीं होगी। आरोपों की सत्यता जांचने के लिए FIR दर्ज करने से पहले डीएसपी (DSP) स्तर का पुलिस अधिकारी एक प्रारंभिक छानबीन करेगा।
२. अग्रिम ज़मानत का अधिकार: यदि पहली नज़र में (Prima Facie) न्यायिक छानबीन में शिकायत झूठी या दुर्भावना से प्रेरित पाई जाए, तो आरोपी को अग्रिम ज़मानत (Anticipated Bail) मिलने पर कोई संपूर्ण रोक नहीं होगी।
३. गिरफ्तारी से पूर्व अनुमति: यदि आरोपी सरकारी कर्मचारी है, तो नियुक्ति प्राधिकारी की लिखित अनुमति और यदि वह आम नागरिक है, तो ज़िले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) की लिखित अनुमति के बिना गिरफ्तारी नहीं होगी। मजिस्ट्रेट को भी अपने विवेक से काम लेना होगा कि गिरफ्तारी के कारण वाजिब हैं या नहीं।
राजनीतिक संशोधन (कैबिनेट का पलटवार – २०१८):
वोटबैंक की राजनीति और सामाजिक दबाव के आगे घुटने टेकते हुए सरकार ने ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधित बिल, २०१८’ लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूरी तरह पलट दिया और प्रावधान किए कि:
१. शिकायत मिलते ही पुलिस बिना किसी प्रारंभिक जांच के तुरंत FIR दर्ज करेगी।
२. किसी की गिरफ्तारी से पहले किसी भी उच्च अधिकारी की अनुमति आवश्यक नहीं होगी।
३. केस दर्ज होने के बाद अग्रिम ज़मानत का प्रावधान पूरी तरह समाप्त होगा, भले ही इस संबंध में न्यायालय का कोई भी पूर्व आदेश क्यों न हो।
२०१८ का संशोधन बनाम १९१९ का रॉलेट ऐक्ट: एक डरावनी समानता
जब हम २०१८ के इन संशोधनों की तुलना मार्च १९१९ में ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए ‘रॉलेट ऐक्ट’ (जिसे सिडनी रौलेट की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिश पर बनाया गया था) से करते हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की रूह कांप उठती है। रॉलेट ऐक्ट ने ब्रिटिश राज को यह असीमित अधिकार दिया था कि वह किसी भी भारतीय पर बिना मुकदमा चलाए और बिना सबूत दिए उसे दो साल तक जेल में बंद रख सकती थी।
दोनों कानूनों के दमनकारी चरित्र में जो डरावनी समानताएँ हैं, वे इस प्रकार हैं:
१. गिरफ्तारी का आधार–
रॉलेट ऐक्ट (१९१९): बिना वारंट और बिना किसी ठोस प्रारंभिक जांच के महज़ संदेह के आधार पर तत्काल गिरफ्तारी।
SC/ST संशोधन ऐक्ट (२०१८): शिकायत मिलते ही बिना किसी प्रारंभिक जांच (नो ऑटोमैटिक वेरिफिकेशन) के सीधे FIR और तत्काल गिरफ्तारी।
२. न्यायिक राहत (ज़मानत)–
रॉलेट ऐक्ट (१९१९): बिना परीक्षण (Trial) के अनिश्चितकालीन निरोध। कोर्ट या जूरी के सामने अपील का अधिकार सीमित।
SC/ST संशोधन ऐक्ट (२०१८): केस दर्ज होते ही अग्रिम ज़मानत (Section 438 CrPC) का प्रावधान पूरी तरह समाप्त। न्यायालय के हाथ बंधे।
३. शक्तियों का दुरुपयोग–
रॉलेट ऐक्ट (१९१९): क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के नाम पर पुलिस और अधिकारियों को असीमित शक्तियां (जंगलराज)।
SC/ST संशोधन ऐक्ट (२०१८): दुर्भावनापूर्ण या झूठी शिकायतों के मामलों में भी पुलिस को बिना जांच और बिना अनुमति के सीधे जेल भेजने की असीमित शक्ति।
४. आरोपी के अधिकार–
रॉलेट ऐक्ट (१९१९): आरोपियों को उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम और इस्तेमाल होने वाले सबूतों को जानने का अधिकार नहीं था।
SC/ST संशोधन ऐक्ट (२०१८): पहली नज़र में शिकायत के झूठे होने पर भी आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका जेल जाने से पहले नहीं मिलता।
आलोचनात्मक विमर्श: क्या यह ऐक्ट देश को पीछे ले जा रहा है?
इस कानून के वर्तमान स्वरूप पर जब हम वैचारिक और सामाजिक आधार पर विचार करते हैं, तो इसके परिणाम अत्यंत चिंताजनक दिखाई देते हैं। यह संशोधन देश को प्रगति की ओर नहीं, बल्कि एक विखंडित सामाजिक वैमनस्यता की ओर धकेल रहा है:
संवैधानिक संतुलन का हनन: भारतीय संविधान का अनुच्छेद २१ हर नागरिक को ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’ देता है। जब आप किसी कानून से अग्रिम ज़मानत का अधिकार छीन लेते हैं और बिना जांच के गिरफ्तारी की शक्ति पुलिस को दे देते हैं, तो आप न्याय के मूल सिद्धांत—”जब तक दोष सिद्ध न हो, हर व्यक्ति निर्दोष है”—का गला घोंट देते हैं।
सामाजिक वैमनस्यता का बीजारोपण: समाज को जातियों में बांटकर एक वर्ग को असीमित कानूनी शक्ति देना और दूसरे वर्ग को डिफ़ॉल्ट रूप से रक्षाहीन कर देना, आपस में भाईचारा नहीं बढ़ा सकता। इसके कारण गाँवों और कस्बों में सवर्ण, पिछड़े और दलित समाज के बीच का सदियों पुराना सामाजिक ताना-बाना और आपसी भरोसा टूट रहा है। लोग एक-दूसरे को आदर की दृष्टि से देखने के बजाय ‘कानूनी भय’ और संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं।
दुरुपयोग की भयावह बाढ़: यह एक कड़वी सच्चाई है कि इस कड़े कानून का इस्तेमाल कई जगहों पर आपसी रंजिश निकालने, ज़मीन के विवाद सुलझाने, ब्लैकमेल करने या राजनीतिक बदला लेने के लिए एक हथियार (Weapon) के रूप में किया जाने लगा है। जब कोई निर्दोष व्यक्ति बिना किसी अपराध के हफ्तों जेल में सड़ता है, उसका करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है, तब वह व्यवस्था के प्रति कुंठित हो जाता है।
निष्कर्ष: १९१९ का इतिहास और २०१८ का भविष्य
१९१९ में जब रॉलेट ऐक्ट जैसा काला कानून आया, तो उसका परिणाम १३ अप्रैल १९१९ को अमृतसर के कुख्यात जलियाँवाला बाग हत्याकांड के रूप में निकला, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया और अंततः ब्रिटिश साम्राज्य के अंत की शुरुआत की।
२०१८ के इस कानून का भविष्य क्या होगा, यह कहना कठिन नहीं है। यदि विधिक व्यवस्था का उपयोग न्याय देने के बजाय एक वर्ग के दमन और दूसरे वर्ग के राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए किया जाने लगेगा, तो यह देश की आंतरिक शांति और प्रगति को दशकों पीछे ले जाएगा। हमें यह सोचना होगा कि दमनकारी नीतियों और काले कानूनों से लड़कर हमारे पुरखों ने जो स्वतंत्रता हासिल की थी, उसका वास्तविक महत्व क्या है? क्या स्वतंत्रता का अर्थ केवल शासकों का बदल जाना है, या नागरिकों के अधिकारों का सुरक्षित होना है? वर्तमान स्थिति को देखकर अंतरात्मा से यही प्रश्न गूँजता है—हम इस व्यवस्था पर ‘जय हिंद’ कहें या इसके पाखंड पर ‘हाय-हाय’ करें!
धन्यवाद!