बिहार में तुर्क आक्रमण का इतिहास: मनेर का प्रारंभिक प्रवेश, बख्तियार खिलजी का विध्वंस और ‘बिहार’ नामकरण का सच
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: ज्ञान की भूमि पर संकट के बादल
प्राचीन काल से ही बिहार (मगध और अंग) वैश्विक ज्ञान, अध्यात्म और शासन का केंद्र रहा है। भगवान बुद्ध की ज्ञान-स्थली और चंद्रगुप्त मौर्य व सम्राट अशोक की कर्म-भूमि रहा यह प्रदेश बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक आते-आते एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक संक्रमण से गुजर रहा था। इस कालखंड में उत्तर भारत की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर इस्लामी आक्रांताओं ने पूर्व की ओर रुख किया।
सामान्यतः जनमानस में यह धारणा है कि बिहार में तुर्कों का आगमन सीधे बख्तियार खिलजी के सैन्य अभियान के साथ हुआ। परंतु, यदि इतिहास के पन्नों को निष्पक्षता और सूक्ष्मता से खंगाला जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि खिलजी के खूनी आक्रमण से बहुत पहले ही बिहार के भूभाग पर तुर्कों की शांतिपूर्ण और व्यापारिक धमक हो चुकी थी। यह आलेख इसी प्रारंभिक प्रभाव क्षेत्र से लेकर बख्तियार खिलजी के बर्बर अभियानों, नालंदा-ओदन्तपुरी के विध्वंस और इस पावन धरा के ‘बिहार’ नामकरण की पूरी ऐतिहासिक और तथ्यात्मक यात्रा का प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
खिलजी से पूर्व बिहार: मनेर का प्रारंभिक तुर्क प्रभाव क्षेत्र
इतिहास का यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विस्मृत तथ्य है कि बख्तियार खिलजी के सैन्य आक्रमण (११९७-९८ ई.) से कई दशक पूर्व ही तुर्क और सूफी संत बिहार की धरती पर कदम रख चुके थे। इस प्रारंभिक प्रभाव का मुख्य केंद्र था—पटना ज़िले का मनेर।
भौगोलिक महत्व: मनेर सोन और गंगा नदी के संगम पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यापारिक और सामरिक नाका था। पाल वंश के शासनकाल में यह क्षेत्र एक प्रमुख व्यापारिक मंडी के रूप में विकसित हो चुका था।
हजरत मोमिन आरिफ का आगमन: ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, बख्तियार खिलजी के आक्रमण से बहुत पहले, ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के मध्य में हजरत मोमिन आरिफ (हदारस मोमिन यारिफ) नामक एक तुर्क सूफी संत अपने अनुयायियों के साथ मनेर में आकर बस गए थे। वे यहाँ किसी सैन्य अभियान के तहत नहीं, बल्कि धार्मिक प्रचार और शांतिपूर्ण निवास के उद्देश्य से आए थे।
मनेर ताम्रपत्र का साक्ष्य: गढ़वाल वंश के राजा गोविंदचंद्र के काल (१११४-११५४ ई.) के प्राप्त ‘मनेर ताम्रपत्र’ से यह प्रमाणित होता है कि उस समय मनेर और उसके आसपास के क्षेत्रों के किसानों और व्यापारियों पर ‘तुरुष्क दंड’ (Turushka Danda) नामक एक विशेष कर लगाया जाता था। यह कर या तो तुर्क आक्रमणों से सुरक्षा के लिए लिया जाता था या फिर वहाँ बसने वाले तुर्क व्यापारियों और निवासियों के प्रबंधन के लिए। इससे यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि खिलजी के आने से पहले ही बिहार में तुर्कों की उपस्थिति एक स्थापित सामाजिक सच्चाई बन चुकी थी।
बख्तियार खिलजी का उदय और मगध पर प्रथम प्रहार (११९७-९८ ई.)
इख्तियारुद्दीन मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी जाति से तुर्क-खलजी था, जो सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना का एक महत्वाकांक्षी और क्रूर सिपहसालार था। उसे अवध के सूबेदार मलिक हुसामुद्दीन द्वारा मिर्ज़ापुर और चुनार के आसपास की कुछ जागीरें (भगवत और भ्यूली) दी गई थीं। अपनी सीमाओं के विस्तार और धन-दौलत की लिप्सा में उसने पूर्व की ओर रुख किया, जहाँ पाल और सेन राजवंशों की शिथिल पड़ती राजनीतिक सत्ता ने उसका मार्ग सुगम बना दिया।
मगध में प्रथम लूटपाट: सन् ११९७-९८ ई. के आसपास बख्तियार खिलजी ने कर्मनाशा नदी को पार कर मगध के सीमावर्ती क्षेत्रों पर अपना पहला बड़ा आक्रमण किया। इस प्रारंभिक आक्रमण का मुख्य उद्देश्य केवल धन लूटना और अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करना था।
सैन्य प्रतिरोध का अभाव: उस समय मगध के स्थानीय शासक और बौद्ध भिक्षु अहिंसा के सिद्धांतों का पालन कर रहे थे। उनके पास कोई सुसंगठित और सक्रिय सैन्य दुर्ग नहीं था, जिसके कारण खिलजी के घुड़सवार दस्ते ने बिना किसी बड़े प्रतिरोध के मगध के ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों को बेरहमी से लूटा और अपनी धाक जमाई।
ओदन्तपुरी (आधुनिक बिहार शरीफ) का पतन और सैन्य केंद्र का उभार
मगध को लूटने के बाद बख्तियार खिलजी का अगला निशाना बना तत्कालीन शिक्षा और संस्कृति का एक और बड़ा केंद्र—ओदन्तपुरी महाविहार (जिसे वर्तमान में बिहार शरीफ के नाम से जाना जाता है)।
किले के भ्रम में महाविहार पर हमला: मिन्हाज-उस-सिराज की प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति ‘तबाकात-ए-नासिरी’ में इस आक्रमण का सजीव और रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण मिलता है। मिन्हाज लिखता है कि बख्तियार खिलजी ने जब दूर से ओदन्तपुरी महाविहार की विशाल चहारदीवारी और उसके ऊंचे शिखरों को देखा, तो उसने उसे कोई सुदृढ़ ‘सैन्य किला’ (दुर्ग) समझ लिया। उसने केवल २०० घुड़सवारों के साथ इस पर अचानक धावा बोल दिया।
भिक्षुओं का नरसंहार: ओदन्तपुरी कोई सैनिक छावनी नहीं थी, बल्कि वह बौद्ध लामाओं और शिष्यों का एक पवित्र अध्ययन केंद्र था। खिलजी की सेना ने वहाँ उपस्थित निहत्थे और शांत बौद्ध भिक्षुओं को गाजर-मूली की तरह काट दिया। जब पूरा परिसर रक्त से लाल हो गया और खिलजी ने भीतर प्रवेश किया, तब उसे पता चला कि यह कोई किला नहीं बल्कि पुस्तकों और आचार्यों का एक ‘मदरसा’ (विश्वविद्यालय) था।
बिहार शरीफ का उदय: ओदन्तपुरी की इस विजय के पश्चात, बख्तियार खिलजी ने इस क्षेत्र को अपना मुख्य प्रशासनिक और सैन्य मुख्यालय बनाया। यही कारण है कि यह स्थान आगे चलकर ‘बिहार शरीफ’ के रूप में तुर्कों और बाद में सूफियों का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा।
नालंदा विश्वविद्यालय का विध्वंस: ज्ञान की चिता
ओदन्तपुरी को नष्ट करने के बाद बख्तियार खिलजी की बर्बरता का सबसे काला अध्याय शुरू हुआ—नालंदा विश्वविद्यालय का विनाश। पाँचवीं शताब्दी में गुप्त सम्राटों द्वारा स्थापित नालंदा केवल भारत का ही नहीं, बल्कि वैश्विक ज्ञान का सिरमौर था, जहाँ चीन, जापान, तिब्बत, कोरिया और मध्य एशिया से १०,००० से अधिक छात्र और २,००० शिक्षक ज्ञान की साधना में लीन थे।
पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ की आहुति: नालंदा का पुस्तकालय क्षेत्र ‘धर्मगंज’ के नाम से प्रसिद्ध था, जो तीन विशाल बहुमंजिला भवनों—’रत्नोदधि’, ‘रत्नसागर’ और ‘रत्नरंजक’ में विभक्त था। खिलजी ने इस ज्ञान के महासागर में आग लगवा दी। समकालीन विवरण बताते हैं कि वहाँ इतनी अधिक संख्या में पांडुलिपियाँ और अनमोल पुस्तकें थीं कि वह पुस्तकालय तीन महीनों से भी अधिक समय तक धधक रहा था। भारत के खगोल विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, दर्शन और इतिहास का अमूल्य खजाना राख के ढेर में बदल गया।
क्रूरता का तर्क: तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ और मिन्हाज-उस-सिराज दोनों ने इस बात की पुष्टि की है कि खिलजी ने नालंदा के आचार्यों से पूछा था कि क्या उनके पास उनके मजहब की किताब (कुरान) है? जब उत्तर नकारात्मक मिला, तो उसने ज्ञान के उस पूरे जीवंत प्रतीक को ही मिटाने का आदेश दे दिया। सैकड़ों आचार्यों को जीवित जला दिया गया या मार दिया गया।
बख्तियारपुर शहर की स्थापना: विनाशक के नाम पर बसावट
अपनी इन रक्त रंजित विजयों और विध्वंसों के सिलसिले के दौरान, बख्तियार खिलजी ने पटना के निकट गंगा नदी के दक्षिणी मार्ग पर एक नए शहर की नींव रखी, जिसे आज हम ‘बख्तियारपुर’ के नाम से जानते हैं।
सामरिक चौकी: बख्तियारपुर की स्थापना केवल शौकिया तौर पर नहीं की गई थी, बल्कि यह बंगाल अभियान (लक्ष्मणसेन के विरुद्ध) और मगध के बीच संपर्क बनाए रखने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक सैनिक चौकी के रूप में विकसित किया गया था।
इतिहास की विडंबना: यह भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है कि जिस आक्रांता ने इस देश की सबसे महान ज्ञान-धरोहर (नालंदा) को जलाकर भस्म कर दिया, उसी के नाम का एक शहर (बख्तियारपुर) और रेलवे जंक्शन आज भी उसके कुकृत्यों की याद दिलाता हुआ अस्तित्व में है।
‘बिहार’ नामकरण का भाषाई और ऐतिहासिक विमर्श
१२वीं शताब्दी के अंत और १३वीं शताब्दी के प्रारंभ में तुर्क और मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ ही इस पूरे भूभाग का नाम ‘बिहार’ पड़ा। आपके द्वारा प्रस्तुत यह विचार पूरी तरह अकादमिक और भाषाई रूप से सत्य है कि बौद्ध विहारों की बहुलता के कारण ही यह नामकरण हुआ।
बौद्ध ‘विहार’ से ‘बिहार’: प्राचीन काल से ही ओदन्तपुरी, नालंदा, विक्रमशिला और इसके आसपास के क्षेत्रों में बौद्ध भिक्षुओं के रहने के स्थान, जिन्हें ‘विहार’ (Vihara) कहा जाता था, अत्यंत घने और संख्या में बहुत अधिक थे। जहाँ देखो, वहाँ बौद्ध विहार ही दिखाई देते थे।
मुस्लिम शासकों का उच्चारण: जब मुस्लिम आक्रांता और फारसी लेखक (जैसे मिन्हाज-उस-सिराज) इस क्षेत्र में आए, तो उन्होंने अवधी और स्थानीय प्राकृत भाषा में ‘विहार’ शब्द का अत्यधिक प्रयोग सुना। चूंकि फारसी और अरबी लिपि व उच्चारण में ‘व’ (Va) को प्रायः ‘ब’ (Ba) के रूप में उच्चारित करने की प्रवृत्ति होती है, इसलिए उन्होंने ‘विहारों की भूमि’ को ‘अर्ध-ए-बिहार’ (Land of Viharas) कहना शुरू कर दिया।
साहित्यिक मुहर: तबाकात-ए-नासिरी में पहली बार इस पूरे सूबे या खित्ते को आधिकारिक रूप से ‘बिहार’ कहकर संबोधित किया गया। इस प्रकार, बौद्धों की शांतिपूर्ण आध्यात्मिक साधना के प्रतीक ‘विहार’ शब्द को तुर्क शासकों ने इस प्रदेश के नाम ‘बिहार’ के रूप में सदा के लिए इतिहास में दर्ज कर दिया।
निष्कर्ष: इतिहास से सीख और वर्तमान का बोध
यह आलेख इस कड़वे सच को उजागर करता है कि सैन्य विजयें अस्थायी होती हैं, परंतु सांस्कृतिक और शैक्षिक विध्वंस सदियों तक किसी कौम या राष्ट्र को पीछे धकेल देते हैं। बख्तियार खिलजी का बिहार पर आक्रमण केवल एक भूभाग को जीतना नहीं था, बल्कि वह भारतीय मेधा की रीढ़ को तोड़ने का कुत्सित प्रयास था।
मनेर में तुर्कों का प्रारंभिक शांतिपूर्ण आगमन इस बात का प्रमाण है कि भारत की संस्कृति समन्वयवादी थी, परंतु बाद में आए खिलजी जैसे आक्रांताओं की मजहबी कट्टरता और बर्बरता ने इस शांत प्रदेश को रक्त और राख से भर दिया। आज जब हम ‘बिहार’ नाम का उच्चारण करते हैं, तो हमें उस नाम के पीछे छिपे हजारों बौद्ध विहारों की पवित्रता और नालंदा की धधकती हुई चिता—दोनों का स्मरण होना चाहिए, ताकि इतिहास की उन गलतियों से सीख लेकर हम अपनी ज्ञान-परंपरा को पुनः सुरक्षित और समृद्ध कर सकें।