माँ: घर का सगुण विग्रह, चूल्हा-चउकठ और सिमटती गगरी की मर्मगाथा
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
माँ: गृहस्थी का संपूर्ण ब्रह्मांड
पीछे मुड़कर जब भी अतीत के गलियारों में देखता हूँ, तो माँ का चेहरा एक साक्षात तीर्थ की भांति सम्मुख आ खड़ा होता है। सच तो यह है कि माँ केवल हाड़-मांस का कोई पुतला नहीं थी, वह तो हमारे पूरे घर का चूल्हा, चउकठ, चाकी और जाता सब कुछ थी। सुबह की पहली किरण के साथ जब उसकी चूड़ियाँ खनकती थीं, तो घर की निर्जीव जड़ वस्तुएं भी सचेतन हो उठती थीं।
वह केवल दिन का उजाला नहीं, बल्कि गोधूलि वेला में तुलसी के चौरे पर जलने वाला ‘सांझ का दीया’ थी। वह घर की देहली का ‘सगुन’ थी, वह सेवा, त्याग और तपस्या का साक्षात विग्रह थी। बचपन की रातों में जब नींद आँखों से रूठ जाती थी, तब माँ हमारे लिए लोरी बन जाती थी और उसकी थपकियों में जो प्यारी सी थाप थी, वह दुनिया के सारे दुखों को हर लेती थी। वह हमारे आँगन की अखंड श्रद्धा थी—पूजा की थाली भी वही थी और भोर की बेला में कानों में रस घोलने वाला पावन मंत्रों का जाप भी वही थी।
बरकत का पर्याय और अदृश्य तीर्थ
बचपन के वे दिन याद आते हैं, जब घर में बिजली की चकाचौंध नहीं थी। उस धुंधलके में माँ घर को जगमगाने वाली लालटेन की एक सघन गुच्छ रोशनी की तरह थी, जो हर कोने के अंधेरे को सोख लेती थी। हम भाई-बहनों के लिए तो माँ हमारी बाईं आँख की उस स्वस्थ और निर्मल रोशनी की तरह थी, जिसके बिना जीवन की डगर पर चलना असंभव था।
अक्सर लोग कहते हैं कि पुरुष घर चलाता है, हमारे बाबूजी भी दिन-रात पसीना बहाकर, कमाकर धन ज़रूर लाते थे; लेकिन उस धन में ‘बरकत’ सिर्फ और सिर्फ माँ की ममता और उसकी सुघड़ता ही लाती थी। वह धन को केवल जोड़ती नहीं थी, बल्कि उसे आशीष बना देती थी।
विघटन और अभावों की घरेलू उलझनों के बीच माँ कभी अपने जीवन में तीर्थ यात्रा पर नहीं जा पाई। उसने कभी गंगा-यमुना या काशी-प्रयाग का रुख नहीं किया, लेकिन उसने कभी इस बात का मलाल भी नहीं पाला। उसने तो रात को थककर लौटे बाबूजी के पाँव दबाकर और उनकी सेवा करके ही दुनिया के सारे चारों धामों और सब तीर्थों का अक्षय पुण्य अपने आँगन में ही कमा लिया था। उसका गृहस्थ-श्रम ही उसका सबसे बड़ा अनुष्ठान था।
राई सा वजूद, पहाड़ सा हौसला और विभाजन का दंश
माँ का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था, उसने खुद को परिवार के लिए पूरी तरह मिटा दिया था। जीवनभर वह खुद ‘राई’ की तरह सूक्ष्म और विनीत बनी रही, लेकिन जब दुखों की आंधी आई, तो उसने सामने खड़े पहाड़ जैसे महा-संकटों और कष्टों से भी कभी हार नहीं मानी। उसका हौसला हिमालय से भी ऊँचा था।
लेकिन, समय की गति क्रूर होती है। जिस माँ ने पूरे कुनबे को एक सूत्र में पिरोकर रखा था, एक दिन उसी घर में जब बंटवारे की काली परछाईं पड़ी, तो वह भीतर तक हिल गई। घर में जैसे ही ‘चूल्हा और चउकठ’ बंटे, तैसे ही वह ममता का महासागर टूटकर महज़ ‘एक-तिहाई’ रह गई। यह सिर्फ ज़मीन का बंटवारा नहीं था, यह माँ के कलेजे का बंटवारा था।
दीवारें खिंचते ही सभी सगे रिश्ते अपना-अपना संदर्भ बदलकर, स्वार्थ की पोटली बांधकर अपने-अपने रास्तों पर हो लिए। कोई पीछे मुड़कर देखने वाला नहीं था। उस वीराने में केवल एक माँ ही थी, जो भीतर ही भीतर स्मृतियों के चूल्हे पर दिनोंदिन सिझती रही, पिघलती रही और अकेली रोती रही।
रेत का समंदर और खो गई नदी
परम अचरज और वंदनीय है माँ का वह अलौकिक चरित्र! इस असहनीय अकेलेपन और दंश के बावजूद, वह जीवनभर ‘जुड़छइयां’ (घने पेड़ों की शीतल छाया) में रखी मिट्टी की उस पानी की गगरी की तरह बनी रही, जिसके पास जो कोई भी आया—चाहे वह अपना हो या पराया—माँ ने अपनी शीतलता से उसकी अंतरात्मा की हरारत (तपन) को मिटा दिया और उसके तपे हुए कलेजे को असीम ठंडक पहुँचाई। उसने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की, कभी कोई प्रतिफल नहीं मांगा।
वह तो एक पवित्र पहाड़ी नदी की तरह थी, जो बिना किसी स्वार्थ के अपना अमृत जैसा जल हर राहगीर पर लुटाती रही। और अफ़सोस! अपना सब कुछ लुटाते-लुटाते, विसर्जित करते-करते वह नदी कब, कहाँ और किस महासागर में खो गई, हमें पता ही नहीं चला। आज जब माँ इस संसार में नहीं है और मैं उस सूने आँगन को देखता हूँ, तो वहाँ माँ की वह कल-कल करती ममतामयी नदी कहीं दिखाई नहीं देती। अब तो चारों तरफ यादों की सिर्फ सूखी रेत ही रेत बिखरी मिलती है, जिसमें बीता हुआ वह स्वर्णिम कालखंड तड़पता हुआ प्रतीत होता है…।