चोर निगाहें
प्रेम आँखों की इनायत है,
वही दिल की बरकत है।
उपजता है जो चोर निगाहों से,
उससे घायल ये दिल-ए-हसरत है।
चोरी की सजा अब तो,
अकेलेपन की मोहताज है।
किंतु संशय है कि प्रेम है यह,
या आकर्षण बेआवाज़ है?
जैसे शीशे में कैद हो सूरज,
या आईने में तेरी सूरत।
मैं देखता हूँ चोर निगाहों से,
मन में बसा लूँ तेरी मूरत।
बस एक एहसास ऐसा है,
जैसे विस्मय में सुकून है।
ब्रह्मांड कदमों में पड़ा हो,
और चाँद पाने का जुनून है।
चोरी के उस प्रेम में,
या कि प्रेम की उस चोरी में।
अजीब समानता आज दिखी है,
बंधे हों जैसे एक ही डोरी में।