कल्पना की उड़ान
रचयिता: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
नील गगन में बहती अपनी,
कल्पनाओं को विस्तार दो,
हवा के सुंदर परों को छूकर,
मन में नई बहार दो।
कभी तुम भी उन्मुक्त गगन में,
पंख पसार कर उड़ लिया करो,
भावों की पावन सरिता से,
कविता को नया आकार दो।
कुछ और समीप चले आओ तुम,
इस आत्मीय अनुराग में,
अपने कोमल हृदय-कमल को,
डूबा लो पावन राग में।
यह सृष्टि बड़ी ही विस्तृत है,
जो पा सको तो पा लो तुम,
वर्ना इस जग के प्रपंच को,
बिसरा दो इस विराग में।
कुछ पाना है तो कर्म करो,
जीवन का कुछ आधार लो,
कुछ खोना चाहो तो खो दो,
पर मन में न मलाल लो।
जीवन के हर एक अनुभव को,
खुलकर तुम सहर्ष जी लो,
वर्ना अपने इस अंतस को,
नया रूप, नया आकार दो।
अधरों की अतृप्त प्यास बड़ी,
सरिताओं से लघु प्यास बुझा लो,
अपनी पावन सीमाओं को,
इतना न कभी तुम छोटा कर लो।
सामर्थ्य जगाओ भीतर ऐसा,
जो पल में जग को जीत सके,
उस असीम नील आकाशगंगा को,
अपना अमिय पेय बना लो।
जो भी अभिलाषा छिपी हृदय में,
खुलकर आज बयान करो,
एहसासों के गवाक्ष खोलकर,
सुंदर जीवन का ध्यान करो।
जैसी चाहे वैसी छवि तुम,
अंकित कर लो मन के पट पर,
अपनी ही पावन अंतर्दृष्टि से,
इस जग का कल्याण करो।
मन के पावन दर्पण पर तुम,
कभी धूल न जमने देना,
उस पर सुंदर अरमानों के,
स्वर्णिम पंख लगा देना।
भावों के गहरे सागर से,
नव-उत्साह की लहरें चुनकर,
अपने इस नूतन जीवन को,
नया एक विस्तार दे देना।
श्वेत-श्याम से भरे हुए इस,
नीरस-धुंधले जीवन में,
सतरंगी खुशियों के अनुपम,
रंग आज तुम भर लो मन में।
हवा के चंचल परों पर होकर,
आज सवार अनंत गगन में,
क्षितिज पार ले जाकर अपनी,
कल्पनाओं को विस्तार दो।