सामने रोशन मंच सजा, किरदार बुलाते हैं,
झूठी हँसी के गहने, सबको यहाँ सुहाते हैं।
तालियों की गूँज में, सच की चीखें दबती हैं,
मंच की चकाचौंध में, चमक ही फबती हैं।
पीछे एक कोना है, जिसे नेपथ्य कहते हैं,
जहाँ आँसू अपनी, मर्जी से ही बहते हैं।
न कोई मेकअप है, न भारी कोई संवाद वहाँ,
अपनी ही परछाईं से, होता बस विवाद जहाँ।
मंच का शहजादा है, नेपथ्य में हारा है,
किरदारों की भीड़ में, खुद ही बेचारा है।
वहाँ मखमली मसनद, यहाँ धूल का बसेरा है,
मंच पे उजली सुबह, नेपथ्य रात का डेरा है।
परदे के पीछे ही असली, युद्ध लड़े जाते हैं,
टूटे बिखरे अंश, फिर से वहीं जोड़े जाते हैं।
मंच एक झांकी है, जो क्षण भर लुभाती है,
नेपथ्य की तन्हाई, जीवन का सार सिखाती है।
जो दिखता है, वो सत्य नहीं बस अभिनय है,
जो अनदिखा रहा, वो साहस और परिणय है।
सब भाग रहे मंच की ओर, तालियों के खातिर,
जबकि नेपथ्य ही है, असली रूह की मुसाफिर।
एक रोज़ पर्दा गिरेगा, नाटक थम जाएगा,
मंच की झूठी माया, यहीं पे जम जाएगा।
तब काम न आए कोई, सजा ये वेष तुम्हारा,
नेपथ्य का सन्नाटा ही, आखिरी शेष तुम्हारा।