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#UBI
साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता #६
विषय – उत्सव
क्रमांक – ०९

 

उत्सव का दूसरा पहलू

 

​हसरत भरी नज़र से देखा,

मुझे मिठाइयाँ खरीदते हुए।

फ़ुरसत न थी तब,

जब वह मिला मुझे।

​दीये की रोशनी में,

अनायास ही फिर,

नज़र आया मुझे।

​छत की ओर ताकते हुए,

खुद से खुद को छुपाते हुए।

किस्मत के अँधेरे को छुपाने खातिर,

रोशनी से खुद को छलाते हुए।

​हमने पूछा—क्या चाहिए तुम्हें?

‘ना’ में सर को हिलाते हुए,

अपने ज़मीर को जगाते हुए,

उत्सव के दूसरे पहलू से मिलाया मुझे।

 

मौन का महानाद: शांत चित्त, स्वयं की खोज और ब्रह्म का परम आनंद

 

 

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