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न्याय का बाजारीकरण – शूट२पेन
February 29, 2024

TOW: प्रथम स्थान
दैनिक प्रतियोगिता : ०९
विषय : न्याय
दिनाँक : ०९/०१/२०२०

कानून की अवस्था
यहां सबको पता है।
अपराधी खुलेआम
यहां रास्ते पर घूमता है।

निर्दोष कानून के शिकंजे में
फंस यहां चक्की पिसता है।
वहीं न्याय गली चौराहे पर
सौ दो सौ रुपए में बिकता है।

अजी देश में आज ऐसा कानून है,
जैसे किराने पर तेल और नून है।
हैसियत की ना करो बात तुम,
वह सबके लिए मात्र एक शून्य है।

जिसकी जैसी हैसियत यहां पर,
उसकी वैसी पैरवी यहां पर।
शून्य को सब खरीद सकते हैं,
वह सबके साथ बैठता यहां पर।

कानून तो मात्र एक खिलौना है,
सभी इसके साथ खेलते हैं।
जो इसके साथ खेल ना सका,
वही तो न्याय के नाम पर रोते हैं।

ऐसे कानून से न्याय की,
भला कोई उम्मीद क्या करे।
जो हैं इसके रखवाले,
वही इसकी दलाली करता फिरे।

हर रोज यहां अपराध होते हैं।
पुलिस वाले ही उसे दबा देते हैं।
जो है न्याय की पहली सीढ़ी
वही न्याय के गर्दन घोंट देते हैं।

महिला जब जब शोषित होती है,
वह रिपोर्ट लिखाने से डरती है।
क्यूंकि कानून के मन्दिर में वह,
दोबारा फिर से शोषित होती है।

उसकी इज्जत यहां फिर से,
सरेआम नीलाम होती है।
बलात्कार से कहीं ज्यादा वो,
असह्य और पीड़ादायी होती है।

प्रशासन और कानून का पता,
आज यहां सबको पता है।
अपराध उसे खरीद सके इसलिए,
चौक चौराहे पर खुला बिकता है।

अश्विनी राय ‘अरूण’

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