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भक्ति से गुरुपद तक: श्री गुरू अंगद देव जी और वैचारिक क्रांति की अमर गाथा

 

​”पण्डित वाचहि पोथिआ न बूझहि बीचार। आन को मती दे चलहि माइआ का बामारू। कहनी झूठी जगु भवै रहणी सबहु सबदु सु सारू॥”

(अर्थात: पंडित पोथियां (किताबें) तो पढ़ता है, पर उनके गहरे विचार को नहीं समझता। वह दूसरों को तो मति (उपदेश) देता है, पर स्वयं माया के रोग में ग्रस्त है। कोरी बातें झूठी हैं जिनसे संसार भटकता रहता है; सच्चा आचरण और शबद को भीतर धारण करना ही जीवन का सर्वोपरि सार है।)

​सिख इतिहास में देवत्व और गुरुता का संक्रमण केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि वैचारिक और आत्मिक एकात्मता की पराकाष्ठा है। यह गाथा है सिख पंथ के द्वितीय ज्योति-पुंज श्री गुरू अंगद साहिब जी की, जिन्होंने अपनी निरहंकार सेवा और अटूट निष्ठा से सिद्ध किया कि सच्चा शिष्य कैसे गुरु-रूप हो जाता है।

 

​शबद की गूँज और करतारपुर की ऐतिहासिक यात्रा

​गुरू अंगद देव जी का गुरुपद से पूर्व का नाम ‘भाई लहना जी’ था। वे स्वभाव से बेहद धार्मिक और सत्य के खोजी थे। एक बार भाई लहना जी के कानों में परम पूज्य जगत-गुरू धन श्री गुरू नानक साहिब जी के अलौकिक शबद (बाणी) की गूँज पड़ी। शबद में पिरोए गए ‘गुरमत’ के दिव्य फलसफे और सत्य की आवाज़ ने उनके अंतर्मन को इस कदर झकझोर दिया कि उन्होंने तुरंत एक युगांतरकारी निर्णय लिया। उन्होंने निश्चय किया कि वे उस शबद के रचयिता सतगुर नानक साहिब के साक्षात दर्शन के लिए ‘करतारपुर साहिब’ जाएंगे।

 

पहली भेंट और आत्म-ज्ञान की अभूतपूर्व क्रांति

​करतारपुर की पवित्र धरती पर सतगुर नानक साहिब जी से हुई पहली भेंट ने ही भाई लहना जी के जीवन में एक अभूतपूर्व आत्मिक क्रांति ला दी। प्रथम मिलाप में ही गुरु साहिब के ओजस्वी और शांत स्वरूप को देखकर भाई लहना जी का अहंकार पूरी तरह विलीन हो गया। सतगुर ने उन्हें आदि-शक्ति और अकाल पुरख के ‘हुक्म’ (परम नियम) का गूढ़ भेद समझाया। उन्होंने बताया कि ईश्वर को बाहर कर्मकांडों या जंगलों में खोजने की आवश्यकता नहीं है; परमेश्वर की प्राप्ति केवल अपने अंतःकरण को शुद्ध करके, अपने भीतर उतरने से ही संभव है।

​गुरू नानक देव जी से मिले इस आत्म-ज्ञान ने भाई लहना जी के वजूद को समूल बदल दिया। वे बाहरी आडंबरों को छोड़कर सतगुर नानक साहिब की लोक-कल्याणकारी विचारधारा के अनन्य सिख बन गए और संसार के मोह को त्यागकर करतारपुर में ही रहकर गुरु-दरबार की सेवा में लीन हो गए।

 

अनन्य सेवा और ‘अंगद’ बनने का गौरवमय इतिहास

​करतारपुर निवास के दौरान भाई लहना जी ने सेवा की ऐसी अद्भुत मिसालें पेश कीं जो इतिहास में अमर हैं। गुरु साहिब के महान, पवित्र और परोपकारी कार्यों के प्रति उनकी अनन्य भक्ति, पूर्ण समर्पण, निरहंकारिता और अगाध ज्ञान को देखकर गुरू नानक साहिब अत्यंत प्रसन्न हुए। भाई लहना जी ने गुरु साहिब द्वारा ली गई हर कठिन से कठिन परीक्षा को पूर्ण सहजता और आज्ञाकारिता से उत्तीर्ण किया।

​अंततः, ७ सितम्बर १५३९ को वह ऐतिहासिक और पावन क्षण आया, जब गुरु नानक साहिब जी ने भाई लहना जी को अपने गले से लगा लिया। उन्होंने उन्हें गुरुपद (गुरुगद्दी) प्रदान की और मानवता के कल्याण हेतु गुरमत के प्रचार-प्रसार का महान जिम्मा उनके पावन कंधों पर सौंप दिया। जगत-गुरू ने उन्हें अपनी आत्मा और वजूद का हिस्सा मानते हुए एक नया और दिव्य नाम दिया—’गुरू अंगद साहिब’ (जो गुरू के अपने ही ‘अंग’ से उत्पन्न हुए हों)।

 

​निष्कर्ष: प्रकाश से महाप्रकाश का मिलन

​गुरू अंगद साहिब जी ने गुरुपद पर सुशोभित होने के बाद गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया और बाणी का संकलन कर समाज को अज्ञानता के अंधकार से निकाला। वे शबद और रहणी के साक्षात प्रतीक थे। २४ जेठ (जून) के इस पावन कालखंड में, लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ भक्ति, आज्ञाकारिता और आत्म-ज्ञान के शिखर-पुरुष, द्वितीय पादशाह धन श्री गुरू अंगद देव साहिब जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन, वंदन और सादर श्रद्धासुमन अर्पित करता है।

​धन्यवाद!

 

 

गुरु अमर दास

 

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