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अनंत गोपाल शेवड़े: प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के स्वप्नद्रष्टा और साहित्य साधक

 

​भारतीय साहित्य और विश्व पटल पर हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित करने वाले महापुरुषों में अनंत गोपाल शेवड़े का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे केवल एक लेखक नहीं थे, बल्कि अपने आप में एक संपूर्ण संस्था थे। ‘नागपुर टाइम्स’ के संस्थापक और महान कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी के प्रिय शिष्य शेवड़े जी ने हिंदी, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं के सेतु के रूप में कार्य किया।

 

​जन्म और प्रारंभिक जीवन

​अनंत गोपाल शेवड़े का जन्म वर्ष १९११ में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के सौसर नामक स्थान पर हुआ था। उनकी उच्च शिक्षा अंग्रेजी साहित्य में (एम.ए.) हुई, जिसके कारण उनका अंग्रेजी पर भी उतना ही अधिकार था जितना हिंदी और अपनी मातृभाषा मराठी पर। उनकी जीवनसंगिनी यमूताई भी मराठी की सुप्रसिद्ध कहानी-लेखिका थीं, जिससे उनके घर का वातावरण सदैव साहित्यिक चेतना से ओत-प्रोत रहा।

 

​प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के सूत्रधार

​वर्ष १९७५ में नागपुर में आयोजित ‘प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन’ की परिकल्पना और उसे भव्य रूप देने का श्रेय शेवड़े जी को ही जाता है। उन्हें इस सम्मेलन की ‘आत्मा’ कहा जाता था। उनके कुशल नेतृत्व में न केवल प्रथम, बल्कि द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन भी पूरी गरिमा के साथ संपन्न हुए, जिसने हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने की नींव रखी।

 

​साहित्यिक अवदान और ‘ज्वालामुखी’ की गूँज

​शेवड़े जी एक आदर्शवादी उपन्यासकार और लघुकथाकार थे। उनके साहित्य में राष्ट्रसेवा और मानवीय मूल्यों का गहरा स्वर मिलता है।

​ज्वालामुखी (१९५६): यह उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेशनल बुक ट्रस्ट ने इसका अनुवाद भारत की १४ प्रमुख भाषाओं में कराया। इतना ही नहीं, इसका अंग्रेजी अनुवाद अमेरिका में भी प्रकाशित हुआ, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय कथा साहित्य की धाक जमाई।

​मृगजाल (१९७९): इस उपन्यास के लिए उन्हें ‘मध्य प्रदेश हिंदी परिषद’ के प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया।

​मंगला: यह उपन्यास दृष्टिहीनों के लिए विशेष रूप से ‘ब्रेल लिपि’ में भी प्रकाशित किया गया, जो शेवड़े जी की सामाजिक संवेदनशीलता का प्रमाण है।

 

​प्रमुख कृतियाँ

​उनके साहित्य सृजन की सूची बहुत लंबी और प्रभावशाली है:

​उपन्यास:

​ईसाई बाला (१९३२): उनकी प्रारंभिक महत्वपूर्ण रचना।

​निशा गीत (१९४७): स्वाधीनता के कालखंड की कृति।

​पूर्णिमा (१९५२)

ज्वालामुखी (१९५६)

​अमृत कुंभ (१९७७)

​मृगजाल (१९७९)

​निबंध संग्रह:

​तीसरी भूख (१९५३): उनके वैचारिक और दार्शनिक चिंतन का संग्रह।

 

महाप्रयाण

​राष्ट्र और हिंदी की सेवा करते हुए, इस महान मनीषी का निधन कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में हृदय गति रुकने से हुआ। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन विश्व हिंदी सम्मेलनों की निरंतरता और उनके कालजयी उपन्यास सदैव उनकी स्मृति को जीवंत रखेंगे।

 

 

 

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