पद्मनारायण राय: ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ के यशस्वी संपादक और कामायनी के अनन्य व्याख्याता
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भूमिका: नागरी सेवा के अनन्य साधक
हिंदी भाषा और साहित्य को शास्त्रीय प्रतिष्ठा दिलाने में ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का अवदान सर्वोपरि रहा है। इस ऐतिहासिक पत्रिका को अपने कुशल संपादन से सींचने वाले और हिंदी गद्य को वैचारिक प्रौढ़ता देने वाले मनीषी का नाम है—पद्मनारायण राय। वे न केवल एक उच्च कोटि के निबंधकार थे, बल्कि सनातन संस्कृति, वैदिक वाङ्मय और आधुनिक छायावादी काव्य के गहरे मर्मज्ञ भी थे। मध्य प्रदेश की माटी में जन्मे और काशी की साहित्यिक चेतना में विलीन होने वाले पद्मनारायण जी का जीवन हिंदी मां की अनवरत सेवा का एक सुंदर उदाहरण है।
प्रारंभिक परिचय एवं संपादन कार्य
जन्म एवं जन्मभूमि: आचार्य पद्मनारायण राय का जन्म १० जनवरी, १९०८ को मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक ज़िले नरसिंहपुर में हुआ था।
संपादकीय अवदान: वे बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने हिंदी जगत की सर्वाधिक प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ के संपादक के रूप में दीर्घकाल तक अपनी सेवाएं दीं। उनके कार्यकाल में पत्रिका ने शोध और समालोचना के नए प्रतिमान स्थापित किए, जिससे देश-विदेश के विद्वानों में नागरी लिपि और हिंदी शोध के प्रति एक नया अनुराग उत्पन्न हुआ।
वैचारिक निबंध और साहित्यिक कृतियाँ
पद्मनारायण राय जी के निबंधों में भाषा की शुद्धता, विचारों की गंभीरता और दर्शन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उनके द्वारा लिखे गए प्रमुख निबंध न केवल तत्कालीन समाज का मार्गदर्शन करते हैं, बल्कि आज भी प्रासंगिक हैं:
शिक्षा का सुधार: इस निबंध में उन्होंने भारतीय मूल्यों के अनुकूल शैक्षिक व्यवस्था में सुधार की पुरज़ोर वकालत की।
वैदिक स्वर: भाषा विज्ञान और वेदों की ऋचाओं के भाषाई सौंदर्य पर लिखा गया उनका यह एक अत्यंत गंभीर और शोधपरक कार्य है।
शब्द शक्ति: साहित्य और व्याकरण के अंतर्संबंधों को रेखांकित करता हुआ एक शास्त्रीय निबंध।
साहित्य की आत्मा: इस कृति में उन्होंने साहित्य के मूल प्रयोजन और उसके रसात्मक स्वरूप की दार्शनिक मीमांसा की है।
भक्ति भाव की अभिनव मीमांसा: सगुण और निर्गुण भक्ति के शास्त्रीय स्वरूप को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करने वाला एक उत्कृष्ट लेख।
कामायनी से अनन्य अनुराग: एक रससिद्ध अध्यापक
पद्मनारायण राय जी केवल एक शुष्क आलोचक या संपादक नहीं थे, बल्कि वे कविता के सहृदय भोक्ता भी थे। छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की कालजयी कृति ‘कामायनी’ से उन्हें अगाध प्रेम था।
जब वे विद्यार्थियों या सुधी जनों को ‘कामायनी’ के सर्ग (जैसे चिंता, श्रद्धा, काम, इड़ा, आनंद) पढ़ाते थे, तो काव्य के रसास्वादन में इस कदर डूब जाते थे कि स्वयं तन्मय (भावविभोर) हो उठते थे। उनका अध्यापन इतना जीवंत होता था कि श्रोताओं को साक्षात मनु और श्रद्धा के दर्शन होने लगते थे। प्रसाद जी के दर्शन और कामायनी के ‘आनंदवाद’ को आत्मसात करना ही उनके जीवन का ध्येय था।
महाप्रयाण
हिंदी गद्य साहित्य को अपनी वैचारिक ऊर्जा से समृद्ध करने वाले और नागरी आंदोलन को गति देने वाले इस महान साहित्यकार का निधन ३१ जनवरी, १९६८ को बाबा विश्वनाथ की पावन नगरी काशी (वर्तमान वाराणसी) में हुआ। अपनी अनमोल कृतियों और संपादन के माध्यम से वे हिंदी प्रेमियों के हृदय में सदैव अमर रहेंगे।