अंबुलाल बालकृष्ण पुरानी: श्री अरबिंदो के अनन्य साधक और आध्यात्मिक जीवनीकार
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भारतीय राष्ट्रवाद और योग-दर्शन के इतिहास में अंबुलाल बालकृष्ण पुरानी (ए.बी. पुरानी) का नाम एक ऐसे सेतु के समान है, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम की ऊर्जा को आध्यात्मिक चेतना में परिवर्तित होते देखा। २६ मई, १८९४ को सूरत की धरा पर जन्मे पुरानी जी ने अपना संपूर्ण जीवन श्री अरबिंदो के चरणों में अर्पित कर दिया।
क्रांति से योग की ओर: एक ऐतिहासिक मोड़
पुरानी जी आरंभ में एक प्रखर राष्ट्रवादी विचारधारा के क्रांतिकारी युवक थे। वर्ष १९२३ में उनके जीवन में वह युगांतकारी क्षण आया जब उनकी भेंट श्री अरबिंदो से हुई। श्री अरबिंदो ने उन्हें आश्वस्त किया कि भारत की स्वतंत्रता सुनिश्चित है और इसका समय भी नियत है, अतः उन्हें अब इसकी चिंता छोड़कर उच्चतर आध्यात्मिक लक्ष्यों पर ध्यान देना चाहिए। इस विश्वास के साथ वे श्री अरबिंदो आश्रम में सम्मिलित हो गए और १९३८ से १९५० तक महर्षि के निजी सहायक के रूप में सेवा की।
श्री अरबिंदो के विचारों का संरक्षण
पुरानी जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान श्री अरबिंदो के साथ होने वाली ‘शाम की वार्ताओं’ (Evening Talks) को संकलित करना था। ये वार्ताएं केवल संवाद नहीं थीं, बल्कि श्री अरबिंदो के बहुमुखी ज्ञान, उनकी हास्य-विनोद की शैली और वैश्विक विषयों पर उनके दृष्टिकोण का खजाना थीं। पुरानी जी ने इन तथ्यों के आधार पर श्री अरबिंदो की प्रामाणिक जीवनी लिखी, जो आज भी शोधार्थियों के लिए आधार स्तंभ है।
वैश्विक प्रसार और साहित्यिक योगदान
महर्षि के महाप्रयाण के पश्चात, पुरानी जी ने उनके योग और शिक्षण को जन-जन तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। १९६२ में उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा की और ‘सावित्री’ व ‘लाइफ डिवाइन’ जैसे क्लिष्ट विषयों पर अत्यंत सरल और सुबोध व्याख्यान दिए।
प्रमुख कृतियाँ:
श्री अरबिंदो का जीवन (१९५८): महर्षि की सबसे प्रामाणिक जीवनियों में से एक।
श्री अरबिंदो के साथ शाम की बातचीत (१९५९): महर्षि के व्यक्तित्व के मानवीय और दार्शनिक पक्षों का जीवंत चित्रण।
सावित्री पर व्याख्यान (१९६७): पौराणिक महाकाव्य ‘सावित्री’ की आध्यात्मिक व्याख्या।
मणिलाल नभुभाई द्विवेदी जीवनचरित्र (१९५१): प्रसिद्ध गुजराती विद्वान मणिलाल द्विवेदी की जीवनी।
अश्विनी राय ‘अरुण’ का विचार
मेरी दृष्टि में अंबुलाल बालकृष्ण पुरानी जी वह ‘आधुनिक हनुमान’ थे, जिन्होंने अपने गुरु के ज्ञान के सूर्य को पूरी दुनिया में प्रकाशित किया। यदि पुरानी जी ने उन ‘शाम की वार्ताओं’ को संजोया न होता, तो हम श्री अरबिंदो के उस मानवीय और सहज रूप से वंचित रह जाते जो केवल उनके निकटतम शिष्यों को ही ज्ञात था। उनकी लेखनी में वह शुचिता और स्पष्टता है जो केवल एक समर्पित साधक में ही हो सकती है।
साधना के उस शिखर पुरुष को शत-शत नमन!