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त्र्यंबक शेजवलकर: पानीपत के ‘प्रमाणिक महासंग्राम’ के अमर व्याख्याता

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​भारतीय इतिहास में ‘पानीपत’ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि वह कुरुक्षेत्र है जहाँ तीन बार भारत का भाग्य लिखा गया। जहाँ पहले और दूसरे युद्ध ने मुगल सत्ता को स्थापित किया, वहीं 14 जनवरी, 1761 को हुआ पानीपत का तीसरा युद्ध मराठा शौर्य और नियति के क्रूर प्रहार की गाथा है। इस युद्ध को वैश्विक स्तर पर एक ‘प्रमाणिक शोध’ के रूप में स्थापित करने का श्रेय आधुनिक महाराष्ट्र के महान इतिहासकार त्र्यंबक शेजवलकर को जाता है।

 

​इतिहासकार का व्यक्तित्व और यात्रा

​25 मई, 1895 को रत्नागिरी के कसैली में जन्मे त्र्यंबक शेजवलकर एक निष्ठावान शोधार्थी थे। विल्सन कॉलेज, मुंबई से स्नातक करने के बाद उन्होंने सैन्य लेखा विभाग में कार्य किया, किंतु उनका मन इतिहास की अनसुलझी कड़ियों में रमा था। वे 1918 से ही ‘भारतीय इतिहास संशोधक मंडल’ से जुड़ गए थे, जहाँ उन्हें दत्तो वामन पोद्दार और जी.एस. सरदेसाई जैसे दिग्गजों का सान्निध्य प्राप्त हुआ।

 

​’पानीपत 1761′: शोध का शिखर

​शेजवलकर जी महाराष्ट्र के पहले ऐसे इतिहासकार थे जिन्होंने पानीपत के तीसरे युद्ध को केवल एक हार के रूप में नहीं, बल्कि एक विस्तृत सामरिक और राजनीतिक अध्ययन के रूप में प्रस्तुत किया।

​प्रामाणिकता: उन्होंने पेशवाओं के हजारों ऐतिहासिक पत्रों (मोड़ी लिपि) का गहराई से अध्ययन किया।

​भौगोलिक साक्ष्य: वे स्वयं पानीपत के युद्धक्षेत्र, रसद मार्गों और उन दुर्गम स्थानों पर गए जहाँ मराठा सेना रुकी थी।

​सांस्कृतिक प्रभाव: उनकी इसी विशेषज्ञता का सम्मान करते हुए, आधुनिक समय में बनी फिल्म ‘पानीपत’ (आशुतोष गोवारिकर द्वारा निर्देशित) को भी उनके द्वारा रचित ‘पानीपत’ ग्रंथ पर ही आधारित किया गया।

 

​श्री शिव छत्रपति: मरणोपरांत सम्मान

​शेजवलकर जी का लेखन केवल पानीपत तक सीमित नहीं था। उनके द्वारा रचित ‘श्री शिव छत्रपति’ उनके जीवन का वह महत्वपूर्ण कार्य है जिसके लिए उन्हें वर्ष 1966 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। उनके कार्यों ने मराठा इतिहास को एक नई वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान की।

 

​पानीपत का तीसरा युद्ध: एक संक्षिप्त दृष्टि

​इस युद्ध में एक ओर मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ और इब्राहिम खान गार्दी का तोपखाना था, तो दूसरी ओर अहमद शाह अब्दाली के साथ रोहिला नजीबुद्दौला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला थे। यह युद्ध भारतीय इतिहास का वह रक्तरंजित अध्याय है जिसमें मराठों ने अपनी एक पूरी पीढ़ी खो दी, लेकिन उनके अदम्य साहस ने अब्दाली को भी इतना कमजोर कर दिया कि वह पुनः भारत पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सका।

 

​अश्विनी राय ‘अरुण’ का विचार

​मेरी दृष्टि में त्र्यंबक शेजवलकर जी वह ‘इतिहास-ऋषि’ थे जिन्होंने इतिहास को भावनाओं के चश्मे से हटाकर साक्ष्यों की कसौटी पर परखा। उन्होंने पानीपत के उस धूल भरे मैदान से सत्य को खोज निकाला, जिसे वक्त की परतों ने ढँक दिया था। आज जब हम पानीपत के वीरों को याद करते हैं, तो हमें शेजवलकर जी जैसे लेखकों को भी नमन करना चाहिए जिन्होंने उन वीरों की गाथा को ‘अमर’ और ‘प्रमाणिक’ बनाया।

​सत्य और शोध के उस महान साधक को शत-शत नमन!

 

 

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