John-Mathai

​डॉ. जॉन मथाई: स्वतंत्र भारत के नीति-निर्माता, प्रखर अर्थशास्त्री और अद्वितीय न्यायविद्

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: आधुनिक भारत के विस्मृत शिल्पी

​किसी भी नए राष्ट्र के निर्माण में केवल राजनीतिज्ञों का योगदान नहीं होता, बल्कि उन मनीषियों, अर्थशास्त्रियों और विचारकों की मेधा भी शामिल होती है जो पर्दे के पीछे रहकर देश की प्रशासनिक और वित्तीय रीढ़ को मजबूत करते हैं। स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशक में ऐसे ही एक विरल राष्ट्र-शिल्पी बनकर उभरे थे—डॉ. जॉन मथाई।

​वे केवल एक नाम नहीं, बल्कि अपने आप में अर्थशास्त्र, न्यायशास्त्र और शिक्षा का एक चलता-फिरता विश्वविद्यालय थे। देश के पहले रेल मंत्री और बाद में वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने तत्कालीन भारत की जर्जर आर्थिक स्थिति को एक नई दिशा दी। टाटा संस जैसे औद्योगिक घराने के शीर्ष नेतृत्व से लेकर देश के सबसे बड़े सार्वजनिक बैंक (SBI) के अध्यक्ष पद तक की उनकी यात्रा यह सिद्ध करती है कि वे जितने कुशल सरकारी प्रशासक थे, उतने ही दूरदर्शी कॉरपोरेट मार्गदर्शक भी थे। यह शोधपरक आलेख डॉ. मथाई के बहुआयामी जीवन, उनकी अकादमिक साख और राष्ट्र के प्रति उनके अमूल्य योगदान का एक प्रामाणिक दस्तावेज है।

 

जन्म, कुलीन पृष्ठभूमि और वैश्विक शिक्षा (१८८६-१९१० ई.)

​डॉ. जॉन मथाई का जन्म १० जनवरी, १८८६ ई. को केरल के तिरुवनंतपुरम (तत्कालीन त्रावणकोर रियासत) के एक अत्यंत प्रतिष्ठित, संपन्न और सुशिक्षित सीरियन ईसाई परिवार में हुआ था। उनके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा और बौद्धिक वातावरण ने बचपन से ही उनके भीतर ज्ञान के प्रति एक गहरी ललक पैदा कर दी थी।

प्रारंभिक एवं उच्च शिक्षा: उन्होंने अपनी प्रारंभिक और कॉलेज स्तर की शिक्षा तिरुवनंतपुरम और मद्रास (अब चेन्नई) के प्रतिष्ठित संस्थानों से प्राप्त की। मद्रास से कानून की स्नातक उपाधि लेने के बाद उनकी मेधा उन्हें सात समंदर पार ले गई।

​वैश्विक अकादमिक साख: उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान केंद्रों में से एक—ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और लंदन विश्वविद्यालय में अपनी उच्च शिक्षा पूरी की। लंदन विश्वविद्यालय से उन्होंने अर्थशास्त्र में डी.एस-सी. (Doctor of Science – D.Sc.) की सर्वोच्च उपाधि प्राप्त की, जो उस दौर में किसी भी भारतीय के लिए एक दुर्लभ और अत्यंत गौरवमयी उपलब्धि थी। इस वैश्विक शिक्षा ने उनके दृष्टिकोण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक और व्यावहारिक बनाया।

 

​कार्यक्षेत्र का विस्तार: वकालत से अध्यापन तक की यात्रा

​लंदन से लौटने के बाद डॉ. जॉन मथाई ने अपने करियर की शुरुआत न्याय के मंदिर से की, परंतु उनका झुकाव सामाजिक-आर्थिक विषयों की ओर अधिक था।

मद्रास उच्च न्यायालय में वकालत: सन १९१० ई. में उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में एक बैरिस्टर के रूप में अपनी वकालत शुरू की। अगले आठ वर्षों तक (१९१८ ई. तक) उन्होंने कानून की बारीकियों को जमीन पर समझा। इस विधिक अनुभव ने उन्हें भविष्य के कानूनों और बजट निर्माण में एक मँजा हुआ न्यायविद् बनाया।

अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में दूसरी पारी: कानून की दुनिया में नाम कमाने के बाद उनकी शैक्षणिक रुचि ने उन्हें अध्यापन की ओर प्रेरित किया। वे अगले ५ वर्षों तक प्रसिद्ध मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे। यहाँ उन्होंने देश की भावी प्रशासनिक पीढ़ी को अर्थशास्त्र के व्यावहारिक सिद्धांत सिखाए और खुद भी भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याओं पर शोध किया।

 

​प्रशासनिक नेतृत्व और राष्ट्रीय पटल पर उदय

​१९२० के दशक के उत्तरार्ध में डॉ. मथाई का प्रवेश सक्रिय नीति-निर्माण और ब्रिटिश भारत के प्रशासनिक ढांचे में हुआ, जहाँ उनकी विशेषज्ञता का लोहा ब्रिटिश सरकार ने भी माना।

विधायी और नीतिगत अनुभव: सन १९२५ ई. में जॉन मथाई मद्रास लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य चुने गए। इसके बाद उनकी आर्थिक सूझबूझ को देखते हुए उन्हें इंडियन टैरिफ बोर्ड (Indian Tariff Board) का सदस्य नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने भारतीय उद्योगों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण नीतियाँ बनाईं।

महानिदेशक का पद: अपनी प्रशासनिक योग्यताओं के बल पर वे ‘कॉमर्शियल इंटेलिजेंस तथा स्टेटिस्टिक्स’ (Commercial Intelligence and Statistics) के महानिदेशक बनाए गए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारत के व्यापारिक आंकड़ों और आर्थिक सांख्यिकी को एक आधुनिक रूप दिया। सन १९४० ई. में उन्होंने इस गरिमामयी पद से सम्मानपूर्वक अवकाश ग्रहण किया।

 

कॉरपोरेट जगत और देश के मंत्रालयों का नेतृत्व

सरकारी सेवा से निवृत्त होने के बाद डॉ. मथाई का कार्यक्षेत्र और भी अधिक व्यापक, चुनौतीपूर्ण और राष्ट्रीय महत्व का हो गया। अब वे देश के औद्योगिक और राजनैतिक भविष्य को तय करने वाले मंचों पर अग्रसर थे।

क) टाटा संस लिमिटेड के निदेशक

१९४० में सरकारी पद छोड़ने के तुरंत बाद भारत के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने ‘टाटा समूह’ ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। वे ‘टाटा संस लिमिटेड’ के बोर्ड में निदेशक बनाए गए। जे.आर.डी. टाटा के साथ मिलकर उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान और उसके बाद भारतीय उद्योगों की आत्मनिर्भरता के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं तैयार कीं, जिसमें प्रसिद्ध ‘बॉम्बे प्लान’ (१९४४) भी शामिल था।

ख) स्वतंत्र भारत के प्रथम रेल एवं परिवहन मंत्री

१९४६ में जब देश की अंतरिम सरकार का गठन हुआ और बाद में १५ अगस्त १९४७ को जब देश स्वतंत्र हुआ, तब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. जॉन मथाई को अपनी कैबिनेट में परिवहन और रेलवे मंत्री के रूप में शामिल किया। विभाजन की त्रासदी के बीच रेल नेटवर्क को संभालना और लाखों शरणार्थियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना उनकी सबसे बड़ी प्रशासनिक परीक्षा थी, जिसे उन्होंने पूरी कुशलता से पूरा किया।

ग) देश के द्वितीय वित्त मंत्री और सिद्धांतों की राजनीति

आर.के. शनमुखम चेट्टी के इस्तीफे के बाद डॉ. जॉन मथाई को भारत का वित्त मंत्री बनाया गया। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने सन १९५० में गणतंत्र भारत का पहला बजट पेश किया।

इस्तीफे का ऐतिहासिक कारण: डॉ. मथाई बहुत लंबे समय तक वित्त मंत्री के पद पर नहीं रहे। वे एक स्वाभिमानी और सैद्धांतिक व्यक्ति थे। जब योजना आयोग (Planning Commission) के गठन की बात चल रही थी, तब डॉ. मथाई का मानना था कि योजना आयोग एक ऐसी ‘सुपर-कैबिनेट’ बन जाएगा जो वित्त मंत्रालय और लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए मंत्रियों के अधिकारों को सीमित कर देगा। प्रधानमंत्री नेहरू से इन वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने अपने पद से स्वेच्छा से त्यागपत्र दे दिया। यह भारतीय राजनीति में सिद्धांतों के लिए सत्ता को लात मार देने का एक विरल उदाहरण था।

टाटा में वापसी: मंत्रिमंडल से पद त्याग करने के बाद वे पुनः टाटा संस के निदेशक पद पर चले गए और देश के औद्योगिक विकास में जुट गए।

घ) स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के प्रथम अध्यक्ष

सन १९५५ में जब इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण करके स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की स्थापना की गई, तो सरकार को एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जिस पर बैंकिंग जगत और जनता दोनों का अटूट विश्वास हो। नेहरू सरकार ने पुनः डॉ. मथाई को याद किया और वे १९५५-५६ में नवगठित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने देश के इस सबसे बड़े बैंक की बुनियादी संरचना तैयार की।

 

शिक्षा जगत को अवदान: उप-कुलपति के रूप में सेवाएँ

एक अर्थशास्त्री और राजनेता होने के साथ-साथ डॉ. मथाई मूल रूप से एक शिक्षाशास्त्री थे। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वे पुनः शिक्षा की उसी पावन धारा की ओर लौट आए जहाँ से उन्होंने शुरुआत की थी।

उन्हें भारत के दो अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विश्वविद्यालयों का नेतृत्व करने का अवसर मिला:

१. मुम्बई विश्वविद्यालय (University of Mumbai): वे मुम्बई विश्वविद्यालय के उप-कुलपति (Vice-Chancellor) रहे, जहाँ उन्होंने उच्च शिक्षा के स्तर और शोध कार्यों को बढ़ावा दिया।

२. केरल विश्वविद्यालय (University of Kerala): इसके पश्चात उन्हें उनके गृह राज्य के ‘केरल विश्वविद्यालय’ का उप-कुलपति बनाया गया। शिक्षा के लोकतंत्रीकरण और साक्षरता की बुनियादी नींव रखने में उनकी नीतियां आज भी केरल के मॉडल में दिखाई देती हैं।

 

कालजयी पुस्तकें: अकादमिक और आर्थिक धरोहर

डॉ. जॉन मथाई केवल नीतियों के निर्माता नहीं थे, बल्कि वे एक प्रखर लेखक और विचारक भी थे। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था, ग्रामीण प्रशासन और कराधान के व्यावहारिक पक्षों पर तीन अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की, जो आज भी शोधार्थियों के लिए संदर्भ ग्रंथ हैं:

१. विलेज गवर्नमेंट इन ब्रिटिश इंडिया (Village Government in British India): इस पुस्तक में उन्होंने ब्रिटिश काल के दौरान भारत की पारंपरिक ग्रामीण शासन व्यवस्था और पंचायतों की स्थिति का ऐतिहासिक व सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया।

२. ऐग्रिकल्चरल कोऑपरेशन इन इंडिया (Agricultural Cooperation in India): इस ग्रंथ में उन्होंने भारतीय कृषि की समस्याओं और सहकारी आंदोलनों (Cooperative Movements) के माध्यम से किसानों की समृद्धि का एक व्यावहारिक खाका खींचा।

३. एक्साइज़ एंड लिकर कंट्रोल (Excise and Liquor Control): आबकारी नीतियों, राजस्व संग्रहण और शराब नियंत्रण के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर लिखी गई यह उनकी एक अत्यंत विशिष्ट और तकनीकी पुस्तक है।

 

सम्मान, अवसान और राष्ट्र का ऋण

देश के प्रति उनकी निःस्वार्थ सेवाओं, वित्तीय ईमानदारी और अकादमिक महानता को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने सन १९५९ में डॉ. जॉन मथाई को देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से अलंकृत किया। यह सम्मान उनके राष्ट्र-निर्माण के प्रयासों पर कृतज्ञ राष्ट्र की एक पवित्र मुहर थी।

इसी गौरवमयी वर्ष, यानी सन १९५९ ई. में इस महान अर्थशास्त्री, शिक्षाविद और न्यायविद् का निधन हो गया। उनका जाना भारतीय बौद्धिक जगत और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक युग का अंत था।

 

निष्कर्ष: सिद्धांतों के प्रति अडिगता की सीख

यह आलेख इस बात को रेखांकित करता है कि डॉ. जॉन मथाई का जीवन आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक प्रकाश स्तंभ है। आज के दौर में जहाँ पद और सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौते कर लिए जाते हैं, वहीं डॉ. मथाई का इतिहास हमें सिखाता है कि राष्ट्र का हित और व्यक्तिगत ईमानदारी किसी भी राजनैतिक पद से कहीं अधिक ऊँची होती है। मनेर की प्रारंभिक ऐतिहासिक धरती से लेकर आधुनिक भारत के वित्तीय गलियारों तक, जब भी भारत के आर्थिक और विधिक इतिहास का मूल्यांकन होगा, डॉ. जॉन मथाई का नाम पूरी श्रद्धा और प्रामाणिकता के साथ लिया जाएगा।

 

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