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गणेश चालीसा पाठ का महत्व और लाभ

 

श्री गणेश चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों को निम्नलिखित शुभ फल और लाभ प्राप्त होते हैं:

विघ्न निवारण: गणेश जी को ‘विघ्न हरण मंगल करण’ कहा जाता है। चालीसा के पाठ से जीवन के हर क्षेत्र (कार्य, शिक्षा, विवाह, व्यापार) से सभी प्रकार की बाधाएं और रुकावटें दूर हो जाती हैं।

बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति: गणेश जी ‘बुद्धि विधाता’ हैं। इस चालीसा के पाठ से स्मरण शक्ति तेज होती है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है और सही-गलत का विवेक प्राप्त होता है।

धन और समृद्धि: पाठकों को ऋद्धि-सिद्धि के दाता का आशीर्वाद मिलता है, जिससे घर में सुख, समृद्धि और धन-धान्य का वास होता है।

ग्रह दोष शांति: विशेष रूप से बुध ग्रह (बुद्धि और वाणी का कारक) से संबंधित दोषों के निवारण के लिए यह पाठ अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

आत्मविश्वास में वृद्धि: भक्तों को डर और संशय से मुक्ति मिलती है। गणेश जी की शक्ति का स्मरण करने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है और वह हर चुनौती का सामना करने में सक्षम होता है।

शुभ कार्यों का सफल आरंभ: किसी भी नए कार्य को शुरू करने से पहले चालीसा का पाठ करने से वह कार्य बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक पूर्ण होता है।

मान-सम्मान की प्राप्ति: चालीसा के अंत में ‘लहे जगत सन्मान’ कहा गया है। इसके पाठ से व्यक्ति को समाज और कार्यक्षेत्र में प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त होता है।

 

 

श्री गणेश चालीसा: दोहा और सम्पूर्ण चौपाई पाठ

 

॥ दोहा ॥

 

जय गणपति सदगुण सदन,

कविवर बदन कृपाल ।

विघ्न हरण मंगल करण,

जय जय गिरिजालाल ॥

अर्थ: सदगुणों के घर, भगवान गणपति! हे कवियों में श्रेष्ठ व्यास जी (जिन्होंने चालीसा लिखी है) के मुख पर कृपालु रहने वाले! आप विघ्नों को हरने वाले और मंगल (शुभ कार्य) करने वाले हैं। हे माता पार्वती के पुत्र (गिरिजालाल), आपकी जय हो, जय हो!

 

॥ चौपाई ॥

 

जय जय जय गणपति गणराजू ।

मंगल भरण करण शुभः काजू ॥१॥

हे गणों के राजा (गणराजू) गणेश! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मंगल को भरने वाले और सभी शुभ कार्यों को सफल करने वाले हैं।

 

जै गजबदन सदन सुखदाता ।

विश्व विनायका बुद्धि विधाता ॥२॥

हे हाथी के मुख वाले (गजबदन), आप सुख देने वाले हैं। आप विश्व के विनायक (विशेष नायक) और सभी को बुद्धि देने वाले हैं।

 

वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना ।

तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥३॥

आपकी टेढ़ी (वक्र) सूँड बहुत पवित्र और सुहावनी लगती है। आपके मस्तक (भाल) पर जो त्रिपुण्ड तिलक लगा है, वह मन को बहुत भाता है।

 

राजत मणि मुक्तन उर माला ।

स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥४॥

आपके हृदय (उर) पर मणियों और मोतियों की माला सुशोभित है। आपके सिर पर स्वर्ण मुकुट है और आपकी आँखें विशाल हैं।

 

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं ।

मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥५॥

आपके हाथों में पुस्तक, कुठार (कुल्हाड़ी) और त्रिशूल सुशोभित हैं। आपको मोदक (लड्डू) का भोग लगता है और आप सुगंधित फूलों से पूजे जाते हैं।

 

सुन्दर पीताम्बर तन साजित ।

चरण पादुका मुनि मन राजित ॥६॥

आपके शरीर पर सुंदर पीले वस्त्र (पीताम्बर) सजे हुए हैं। आपके चरणों की पादुकाएँ मुनियों के मन को भी शांति और आनंद देती हैं।

 

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता ।

गौरी लालन विश्व-विख्याता ॥७॥

हे धन्य (धनि) शिव जी के पुत्र और कार्तिकेय (षडानन) के भाई! आप माता पार्वती के प्रिय पुत्र (गौरी लालन) और विश्व में विख्यात हैं।

 

ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे 

मुषक वाहन सोहत द्वारे ॥८॥

आपकी पत्नियाँ ऋद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (अलौकिक शक्ति) आपकी सेवा में चंवर (पंखे) झुलती हैं, और आपका वाहन मूषक (चूहा) आपके द्वार पर सुशोभित होता है।

 

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी ।

अति शुची पावन मंगलकारी ॥९॥

मैं (कविवर) आपकी पवित्र जन्म कथा कहता हूँ, जो अत्यंत शुद्ध, पावन और मंगलकारी है।

 

एक समय गिरिराज कुमारी ।

पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ॥ १० ॥

एक समय पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए बहुत कठोर तपस्या की थी।

 

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा ।

तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा ॥११॥

जब वह अनुपम यज्ञ पूर्ण हुआ, तब आप ब्राह्मण (द्विज) का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे।

 

अतिथि जानी के गौरी सुखारी ।

बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥१२॥

माता पार्वती (गौरी) ने आपको अतिथि जानकर बहुत प्रसन्न हुईं और अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।

 

अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा ।

मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥१३॥

आप अत्यधिक प्रसन्न हुए और आपने माता को वरदान दिया कि उन्होंने पुत्र के लिए जो तपस्या की है,

 

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला ।

बिना गर्भ धारण यहि काला ॥१४॥

उसी क्षण बिना गर्भ धारण किए, आपको विशाल बुद्धि वाला पुत्र प्राप्त होगा।

 

गणनायक गुण ज्ञान निधाना ।

पूजित प्रथम रूप भगवाना ॥१५॥

वह पुत्र गणों का नायक (गणनायक), गुणों और ज्ञान का भंडार होगा, और पूजा में सबसे पहले पूजा जाने वाला भगवान का रूप होगा।

 

अस कही अन्तर्धान रूप हवै ।

पालना पर बालक स्वरूप हवै ॥१६॥

ऐसा कहकर आप अंतर्ध्यान हो गए और तुरंत ही पालने पर बालक के रूप में प्रकट हो गए।

 

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना ।

लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना ॥१७॥

जब आपने शिशु के रूप में रोना शुरू किया, तो आपका मुख देखकर माता पार्वती के सुख की कोई सीमा न रही।

 

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं ।

नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ॥१८॥

सभी लोग मग्न होकर सुख-मंगल के गीत गाने लगे। आकाश से देवताओं ने भी फूलों की वर्षा की।

 

शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं ।

सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ॥१९॥

शिव और पार्वती (उमा) ने मिलकर बहुत दान लुटाए। देवता और मुनिजन उस नवजात पुत्र को देखने के लिए आए।

 

लखि अति आनन्द मंगल साजा ।

देखन भी आये शनि राजा ॥ २० ॥

उस महान आनंद और मंगलमय समारोह को देखकर शनि देव भी बालक को देखने आए।

 

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं ।

बालक, देखन चाहत नाहीं ॥२१॥

शनि ने अपने अवगुणों को मन में याद करके सोचा कि वे बालक को देखना नहीं चाहते (क्योंकि उनकी दृष्टि में दोष था)।

 

गिरिजा कछु मन भेद बढायो ।

उत्सव मोर, न शनि तुही भायो ॥२२॥

माता पार्वती ने थोड़ा मन में भेद (असंतोष) बढ़ाया और कहा कि मेरा उत्सव हो रहा है, यह क्या शनि, तुम्हें अच्छा नहीं लगा?

 

कहत लगे शनि, मन सकुचाई ।

का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ॥२३॥

शनि देव ने मन में संकोच करते हुए कहा कि आप मुझे बालक क्यों दिखा रही हैं, मुझे क्या करना चाहिए? (अर्थात् मुझे दिखाना ठीक नहीं है)।

 

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ ।

शनि सों बालक देखन कहयऊ ॥२४॥

फिर भी, माता पार्वती को विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने शनि से बालक को देखने के लिए कहा।

 

पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा ।

बालक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥२५॥

जैसे ही शनि के नेत्रों का कोना (दृष्टि) बालक पर पड़ा और प्रकाश फैला, बालक का सिर तुरंत ही उड़कर आकाश में चला गया।

 

गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी ।

सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी ॥२६॥

यह देखकर माता पार्वती व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं। उनकी उस दुःखद दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

 

हाहाकार मच्यौ कैलाशा ।

शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा ॥२७॥

कैलाश पर्वत पर हाहाकार मच गया कि शनि ने बालक को देखकर उसका नाश कर दिया।

 

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो ।

काटी चक्र सो गज सिर लाये ॥२८॥

तुरंत ही भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और अपने चक्र से एक हाथी का सिर काटकर ले आए।

 

बालक के धड़ ऊपर धारयो ।

प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥२९॥

भगवान शंकर ने उस सिर को बालक के धड़ के ऊपर स्थापित किया और प्राण मंत्र पढ़कर उसमें जान डाल दी।

 

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे ।

प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे ॥ ३० ॥

तब शंकर भगवान ने बालक का नाम गणेश रखा और उन्हें प्रथम पूज्य होने का तथा बुद्धि का भंडार होने का वरदान दिया।

 

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा ।

पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥३१॥

जब शिव जी ने बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा।

 

चले षडानन, भरमि भुलाई ।

रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई ॥३२॥

कार्तिकेय (षडानन) तो भ्रमित होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने चले गए, लेकिन आपने बैठकर ही बुद्धि से उपाय रचा।

 

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें ।

तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥३३॥

आपने अपने माता-पिता के चरण पकड़ लिए और उनकी ही सात बार परिक्रमा कर ली।

 

धनि गणेश कही शिव हिये हरषे ।

नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे ॥३४॥

‘धन्य हो गणेश!’ कहकर शिव जी हृदय से बहुत प्रसन्न हुए। आकाश से देवताओं ने बहुत सारे फूल बरसाए।

 

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई ।

शेष सहसमुख सके न गाई ॥३५॥

आपकी महिमा और आपकी बुद्धि की बड़ाई इतनी महान है कि हजार मुख वाले शेषनाग भी उसका पूरी तरह से वर्णन नहीं कर सकते।

 

मैं मतिहीन मलीन दुखारी ।

करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी ॥३६॥

मैं (कवि) बुद्धिहीन, मलीन और दुखी हूँ। मैं किस प्रकार से आपकी प्रार्थना (विनय) करूँ?

 

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा ।

जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा ॥३७॥

आपका दास रामसुंदर आपकी भक्ति करता है, जो प्रयाग, ककरा (किसी स्थान का नाम), और दुर्वासा आदि स्थानों पर निवास करता है।

 

अब प्रभु दया दीना पर कीजै ।

अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै ॥३८॥

हे प्रभु! अब मुझ दीन पर दया कीजिए और अपनी कुछ शक्ति और भक्ति प्रदान कीजिए।

 

श्री गणेश यह चालीसा।

पाठ करै कर ध्यान ॥३९॥

जो व्यक्ति ध्यान लगाकर इस गणेश चालीसा का पाठ करता है।

 

नित नव मंगल गृह बसै ।

लहे जगत सन्मान ॥४०॥

उसके घर में प्रतिदिन नए-नए मंगल (शुभ कार्य) निवास करते हैं और वह संसार में सम्मान प्राप्त करता है।

 

॥ दोहा ॥

 

सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश,

ऋषि पंचमी दिनेश ।

पूरण चालीसा भयो,

मंगल मूर्ती गणेश ॥

भावार्थ: दस हजार (सहस्त्र दश) संबंधों (बातों) के साथ, ऋषि पंचमी के दिन (दिनेश का अर्थ यहाँ दिन/तिथि से है), यह चालीसा पूर्ण हुई है। हे मंगलमूर्ति गणेश, आपकी जय हो!

 

 

निष्कर्ष: श्री गणेश चालीसा का सार और अंतिम फलश्रुति

 

श्री गणेश चालीसा मात्र ४० पंक्तियों का एक संग्रह नहीं है, बल्कि यह प्रथम पूज्य भगवान गणेश के बुद्धि, विवेक और करुणा का पूर्ण परिचय है। इस चालीसा में उनकी महिमा, उनके स्वरूप और उनकी अद्वितीय जन्म कथा का वर्णन है, जहाँ शनि के प्रकोप के बाद उन्हें गज सिर प्राप्त हुआ।

यह पाठ हमें विशेष रूप से बुद्धि की परीक्षा वाली कथा से प्रेरणा देता है, जहाँ उन्होंने पृथ्वी की परिक्रमा के बजाय माता-पिता की सात परिक्रमा करके यह सिद्ध किया कि संसार में सर्वोच्च स्थान माता-पिता का है।

अतः, श्री गणेश चालीसा का नियमित पाठ करने वाला भक्त न केवल ‘विघ्न हरण’ का आशीर्वाद पाता है, बल्कि उसे जीवन में बुद्धि की विशालता और नैतिक मूल्यों की प्राप्ति होती है। यह चालीसा भक्तों को यह आश्वासन देती है कि जो भी ध्यानपूर्वक इसका पाठ करता है, उसके घर में नित नए मंगल का वास होता है और वह जगत में सम्मान प्राप्त करता है।

 

 

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