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अंगूठों की थिरकन में, दिन गुज़र जाते हैं,

अपनों के पास होकर भी, दूर नज़र आते हैं।

रिश्ते ‘नोटिफिकेशन’ के मोहताज हो गए,

लबों के पीछे, बस इमोजी के राज हो गए।

 

चेहरे की चमक ‘फिल्टर’ से तय होती है,

भीतर की उदासी, हैशटैग में सोती है।

डेटा की आंधी में, जज्बात बह गए कहीं,

इंसान तो यहीं है, पर रूह वहाँ है नहीं।

 

लाइक और कमेंट्स की, अंधी सी दौड़ है,

दिखावे की बस्ती में, मची बड़ी होड़ है।

खाना ठंडा हो गया, पर फोटो बनवाई है,

सोशल मीडिया की भीड़ में, भी तन्हाई है।

 

कागज़ की महक, वो कलम की लिखावट,

सब खो गया, रह गई बस सजावट।

नींद आँखों से दूर, नीली रोशनी का पहरा है,

डिजिटल समंदर का, पानी बहुत गहरा है।

 

यादों को सहेजने में, लम्हा जीना भूल गए,

स्मार्टफोन के झूले में, बचपन झूल गए।

अनलॉक करते-करते, खुद को लॉक कर बैठे,

इस आग में, सादगी को राख कर बैठे।

 

झांक कर देखो, इस स्क्रीन के पार भी,

हकीकत खड़ी, करती तुम्हारा इंतज़ार भी।

डिजिटल जिंदगी तो, बस एक परछाई है,

सुकून आज भी, मिट्टी की सोंधी कढ़ाई है।

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