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‘बंगाल डायरी’ श्रृंखला की छठी कड़ी प्रस्तुत है। यह आलेख आधुनिक बंगाल के उस दौर पर केंद्रित है जिसे कई इतिहासकारों ने ‘लोकतंत्र के आवरण में तानाशाही’ और ‘असीमित तुष्टिकरण’ का काल माना है।

 

बंगाल डायरी – भाग ६: ममता बनर्जी का शासन — तुष्टिकरण की पराकाष्ठा और हिंदू समाज पर प्रहार

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण

 

‘परिवर्तन’ का छलावा

२०११ में जब ३४ वर्षों के वामपंथी शासन का अंत हुआ, तब बंगाल की जनता ने ‘माँ, माटी, मानुष’ के नारे पर विश्वास कर एक नए युग की आशा की थी। लेकिन जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि यह परिवर्तन केवल सत्ता के चेहरे का था, नीतियों का नहीं। ममता बनर्जी ने वामपंथियों के दमनकारी तंत्र को अपनाया और उसमें ‘मजहबी तुष्टिकरण’ का एक ऐसा घातक तत्व मिला दिया जिसने बंगाल के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया।

 

तुष्टिकरण की नई परिभाषा: ‘वोट बैंक’ बनाम ‘अधिकार’

ममता शासन के दौरान तुष्टिकरण केवल नीति नहीं, बल्कि एक मिशन बन गया। इमामों को वजीफा देना हो या दुर्गा पूजा विसर्जन पर पाबंदी लगाकर मुहर्रम को प्राथमिकता देना—इन फैसलों ने हिंदू समाज को अपनी ही भूमि पर ‘दोयम दर्जे’ का होने का एहसास कराया। तुष्टिकरण की इस राजनीति ने सीमा पार से होने वाली अवैध घुसपैठ को न केवल नजरअंदाज किया, बल्कि उन्हें पहचान पत्र दिलाकर अपना स्थाई वोट बैंक बनाया। मालदा, धूलगढ़ और बशीरहाट जैसे इलाकों में हुए दंगों के दौरान प्रशासन की चुप्पी ने हिंदुओं के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।

 

उत्सवों पर प्रहार और सांस्कृतिक दमन

बंगाल की पहचान ‘दुर्गा पूजा’ है, लेकिन ममता राज में पंडालों को राजनीतिक अखाड़ा बनाया गया। कई स्थानों पर ‘जय श्री राम’ के नारों को अपराध घोषित कर दिया गया। सत्ता के शीर्ष से हिंदुओं की आस्था का उपहास उड़ाया जाना आम बात हो गई। जय श्री राम कहने पर जेल भेजना या सार्वजनिक रूप से क्रोधित होना, बंगाल की उस सहिष्णु छवि के विपरीत था जिसे सदियों से सहेज कर रखा गया था।

 

आरजी कर कांड: सुरक्षा और न्याय का पतन

ममता शासन की विफलता का सबसे वीभत्स उदाहरण आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना बनी। जब एक डॉक्टर बेटी के साथ हुई दरिंदगी ने पूरी दुनिया को हिला दिया, तब भी शासन का रवैया संवेदनहीन रहा। सबूतों के साथ छेड़छाड़ और दोषियों को बचाने के प्रयासों ने यह सिद्ध कर दिया कि अब बंगाल में न तो ‘माँ’ सुरक्षित है, न ‘मानुष’ का कोई मूल्य बचा है। इसी घटना ने उस जन-आक्रोश की नींव रखी जिसने आगे चलकर सत्ता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।

 

‘सिंडिकेट राज’ और हिंसा की राजनीति

ममता बनर्जी के शासन में चुनाव का अर्थ ‘रक्तपात’ हो गया। पंचायत चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, हिंदू मतदाताओं को डराना-धमकाना और मतदान से रोकना एक नई सामान्य बात बन गई। संदेशखाली जैसे क्षेत्रों में महिलाओं के साथ जो हुआ, उसने यह दिखा दिया कि ‘माँ, माटी, मानुष’ का नारा केवल एक चुनावी जुमला था। हिंदुओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा को अक्सर ‘राजनैतिक हिंसा’ का नाम देकर दबा दिया जाता था।

 

निष्कर्ष

ममता बनर्जी का शासन बंगाल के इतिहास का वह दौर रहा जहाँ तुष्टिकरण के लिए लोकतंत्र की मर्यादाओं को तार-तार किया गया। लेकिन अन्याय की भी एक सीमा होती है। जब अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुँचा, तब बंगाल की सोई हुई हिंदू चेतना जागृत हुई। इस जागृति के पीछे उन महानायकों का भी हाथ था जिन्होंने जमीन पर उतरकर हिंदुओं को एकजुट किया। श्रृंखला के अगले भाग में हम चर्चा करेंगे तपन घोष और हिंदू संहति के उस संघर्ष की, जिसने मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदुओं को लड़ना सिखाया।

 

 

 

तपन घोष और हिंदू संहति: वह सेनानी जिसने मुस्लिम बहुल बंगाल में हिंदुओं को लड़ना सिखाया।

 

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