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असली वसीयत: वो ‘आवारा’ दोस्त

 

महफ़िल सजी थी, दावत हुई, फिर सब विदा हुए,

रिश्तेदार खा-पीकर अपने-अपने घरों को चले गए।

मगर वो खड़े रहे दरवाज़े पर, खूँटा गाड़कर अब भी,

जिन्हें पापा ‘आवारा’ कहते थे, न जाने क्यों, कभी।

 

वो दोस्त जिन्हें मिलने से रोका गया था,

वो यार जिन्हें अपनों से टोका गया था।

आज जब सबने पल्ला झाड़ा और काम से मुँह मोड़ा,

इन्हीं ‘बेकाम’ के लोगों ने, मेरा साथ कभी न छोड़ा।

 

कई दिनों से जो काम पड़े थे, उन्हें पल में निपटाया,

पसीने से लथपथ होकर भी, माथे पर बल न आया।

मुड़कर जाते-जाते बस इतना ही कहा उन्होंने,

“भाई, कुछ और बचा हो तो बताना, हम हैं न कोने।”

 

फंक्शन में क्या खाया उन्होंने, या क्या पिया पता नहीं,

किसी ने पूछा भी या नहीं, उन्हें परवाह रत्ती भर नहीं।

पूरे जीवन जो झिड़कियाँ खाई थीं, जो आँसू पिए थे,

आज चुपचाप बिना मांगे, उन सब के दाम चुका दिए थे।

 

दुनिया जिसे ‘आवारा’ कहे, वही सहारा निकला है,

रिश्तों की इस भीड़ में, दोस्ती का तारा निकला है।

जो आए थे मेहमान बनकर, वो रुखसत हो गए,

जो ‘अपने’ थे वो खो गए, जो ‘यार’ थे वो रह गए।

 

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