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वैचारिक महासंग्राम: ‘बम की पूजा’ बनाम ‘बम का दर्शन’

 

स्वाधीनता आंदोलन के दो छोर और उनके भविष्यगामी प्रभाव

शोध आलेख: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

प्रस्तावना: पृष्ठभूमि और वैचारिक प्रस्थान बिंदु

२३ दिसंबर, १९२९ को वायसराय लॉर्ड इरविन की विशेष ट्रेन को बम से उड़ाने का क्रांतिकारियों का प्रयास केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर छिपे एक बड़े वैचारिक अंतर्विरोध को सतह पर ला दिया। इस घटना के जवाब में महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में ‘बम की पूजा’ (The Cult of the Bomb) लिखकर हिंसक तरीकों की तीव्र निंदा की। इसके प्रत्युत्तर में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की ओर से भगवतीचरण वोहरा और भगत सिंह ने ‘बम का दर्शन’ (The Philosophy of the Bomb) शीर्षक से एक ऐतिहासिक घोषणापत्र जारी किया। यह बहस केवल ‘साधन’ (Means) की नहीं थी, बल्कि भारत के भविष्य की राजनीतिक नियति, सत्ता के चरित्र और जनमानस की चेतना को निर्मित करने की एक बृहद जद्दोजहद थी।

 

१. तात्कालिक राजनीतिक व्यवस्था और दोनों पक्षों का दृष्टिकोण

१९२९-१९३० का दौर भारतीय राजनीति का एक अत्यंत नाजुक मोड़ था। एक तरफ ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता ‘गाजर और छड़ी’ (Reform and Repression) की नीति के तहत मॉर्ले-मिंटो और मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड जैसे सुधारों का झुनझुना थमा रही थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने हाल ही में ‘पूर्ण स्वराज्य’ का संकल्प लिया था।

गांधीवादी दृष्टिकोण (साध्य और साधन की पवित्रता): गांधीजी का मानना था कि ब्रिटिश सत्ता भारत में हमारे ही सहयोग (Conscious or Unconscious Cooperation) पर टिकी है। यदि हम गुप्त हिंसा का सहारा लेंगे, तो विदेशी शासक को दमन का नैतिक बहाना मिल जाएगा। गांधीजी के लिए तात्कालिक व्यवस्था में सुधार अंग्रेजों को डराकर नहीं, बल्कि जनता के भीतर से भय को समाप्त करके ही संभव था।

क्रांतिकारी दृष्टिकोण (पूर्ण सामाजिक-राजनैतिक तख्तापलट): भगत सिंह और उनके साथियों का तर्क था कि ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए वैधानिक सुधार वास्तव में क्रांतिकारियों को दबाने के लिए ‘उदारवादियों को दी गई घूस’ थे। वे केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं चाहते थे, बल्कि पूँजीवाद, वर्गवाद और विशेषाधिकारों पर टिकी औपनिवेशिक व्यवस्था का समूल नाश करके ‘मजदूर और किसानों का राज्य’ स्थापित करना चाहते थे।

 

२. भविष्य में होने वाले राजनीतिक नुकसान और लाभ का द्वंद्वात्मक विश्लेषण

इस वैचारिक महासंग्राम के दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क थे, जिन्हें भविष्य की राजनीति के लाभ और हानि की कसौटी पर इस प्रकार आंका जा सकता है:

 

अ. गांधीवादी मार्ग (अहिंसा और सत्याग्रह)

राजनीतिक लाभ (Pros) 

जनसाधारण की भागीदारी: अहिंसा के मार्ग ने महिलाओं, किसानों और बूढ़ों को आंदोलन से जोड़ा, क्योंकि इसमें शारीरिक बल की अनिवार्यता नहीं थी।

अंतरराष्ट्रीय नैतिक बढ़त: बिना हथियार उठाए दमन सहने से ब्रिटिश साम्राज्यवाद की वैश्विक स्तर पर नैतिक थू-थू हुई, जिससे उनका शासन करना कठिन हो गया।

राजनीतिक नुकसान (Cons)

विलंब और समझौते की नीति: क्रांतिकारी पक्ष का आरोप था कि यह मार्ग आंदोलनों को अचानक रोक देता है (जैसे चौरी-चौरा के बाद), जिससे पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य टल जाता है और समझौतों का दौर शुरू होता है।

अति-आध्यात्मिक अपेक्षा: आम जनमानस से यह अपेक्षा करना कि वे अपने अत्याचारी शत्रु से भी प्रेम करें, व्यावहारिक राजनीति की कसौटी पर अत्यधिक कठिन और कतिपय अव्यावहारिक था।

 

ब. क्रांतिकारी मार्ग (सशस्त्र प्रतिरोध और बम का दर्शन)

राजनीतिक लाभ (Pros) 

साम्राज्यवाद की रीढ़ में खौफ: क्रांतिकारियों की कार्रवाइयों ने ब्रिटिश नौकरशाही के भीतर यह स्पष्ट संदेश दिया कि वे भारत में अब सुरक्षित नहीं हैं।

अदम्य वैचारिक जागृति: भगत सिंह के अदालती बयानों और ‘बम का दर्शन’ जैसे लेखों ने युवाओं को मानसिक गुलामी और धार्मिक रूढ़िवादिता से मुक्त कर प्रगतिशील समाजवाद की ओर मोड़ा।

राजनीतिक नुकसान (Cons)

दमन का औचित्य: गुप्त हिंसा के कारण सरकार को पूरे समाज पर कड़े कानून (जैसे पब्लिक सेफ्टी बिल) लादने और सैन्य खर्च बढ़ाने का अवसर मिला, जिसका बोझ अंततः जनता पर पड़ा।

 आंदोलन का संकुचन: आतंकवाद या गुप्त संगठन अपनी प्रकृति के कारण व्यापक जन-आंदोलन का रूप नहीं ले सकते थे, क्योंकि इसमें गुप्त कार्यप्रणाली और जान जोखिम में डालने का साहस सीमित वर्ग तक ही संभव था।

 

३. विचारों का दोहन: दोनों दर्शनों की प्रासंगिकता और भविष्य की नियति

यदि हम दोनों लेखों की गहराई में जाएँ, तो हमें भारत के भविष्य का एक साझा सच दिखाई देता है।

गांधीजी ने ‘बम की पूजा’ में एक अत्यंत दूरदर्शी चेतावनी दी थी कि:

“विदेशी शासक के खिलाफ हिंसा का स्वाभाविक और आसान सा अगला कदम यह होता है कि हम इसका इस्तेमाल अपने ही उन लोगों के खिलाफ करने लगते हैं, जो हमें देश की तरक्की की राह में बाधक नजर आते हैं।”

यह बात स्वतंत्रता के बाद भारत और दुनिया के कई देशों में सच साबित हुई, जहाँ राजनीतिक मतभेदों को सुलझाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाने लगा (जैसे विभाजन की विभीषिका या उग्रवाद)।

इसके विपरीत, भगत सिंह ने ‘बम का दर्शन’ में आगाह किया था कि:

“यदि हम केवल अहिंसा के मुक्के खाते रहे, तो देश घोर अराजकता और ऐसी गुलामी की ओर बढ़ जाएगा जहाँ हम केवल पिटना सीख जाएँगे।”

क्रांतिकारियों की यह सोच सही साबित हुई कि जब तक जनता में प्रतिशोध और आत्म-सम्मान की भावना नहीं जगेगी, तब तक कोई भी राष्ट्र स्वतंत्र होने के योग्य नहीं बनता।

 

निष्कर्ष: पूरक शक्तियाँ, न कि विरोधी

इतिहास का निष्पक्ष मूल्यांकन यह सिद्ध करता है कि ‘बम की पूजा’ और ‘बम का दर्शन’ एक-दूसरे के विरोधी होने से अधिक एक-दूसरे के पूरक (Complementary) थे।

गांधीजी ने यदि भारतीय जनमानस की ‘आत्मा और नैतिक बल’ को जगाकर एक विशाल जन-आंदोलन का ढांचा तैयार किया, तो भगत सिंह और उनके साथियों ने अपने लहू और धारदार ‘तर्क’ से उस ढांचे के भीतर ‘स्वाभिमान और क्रांतिकारी चेतना’ की आग फूँकी। यह क्रांतिकारियों के भय का ही प्रभाव था कि ब्रिटिश सरकार गांधीजी के साथ बातचीत की मेज पर बैठने के लिए मजबूर हुई। अंततः, भारत की स्वतंत्रता इन दोनों धाराओं के अनवरत और संचयी प्रभाव का ही परिणाम थी।

 

बम की पूजा: महात्मा गांधी का ऐतिहासिक लेख और अहिंसा का दर्शन | संपादन: अश्विनी राय ‘अरुण’

 

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