इतिहास के झरोखे से: बम की पूजा और अहिंसा का दर्शन
भूमिका: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
२३ दिसंबर, १९२९ को भारतीय क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार के सर्वोच्च स्तंभ—वायसराय की रेलगाड़ी को बम से उड़ाने का एक साहसिक किंतु असफल प्रयास किया था। इस घटना की तत्कालीन राष्ट्रीय परिदृश्य में तीखी आलोचना करते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ में ‘बम की पूजा’ शीर्षक से एक ऐतिहासिक लेख लिखा। इस लेख में गांधीजी ने वायसराय को देश का शुभचिंतक और क्रांतिकारियों के हिंसक मार्ग को आजादी के रास्ते का रोड़ा बताया है। आइए, इतिहास के उस वैचारिक मंथन का स्वयं अवलोकन करें:
मूल लेख: बम की पूजा
— महात्मा गांधी
हमारे यानी भारत के राजनीतिक रूप से सचेत हिस्से के आसपास के माहौल में इन दिनों इतनी हिंसा व्याप्त है कि यहाँ-वहाँ एकाध बम फेंका जाना कोई खास बेचैनी पैदा नहीं करता। कुछ लोगों के दिलों में तो शायद ऐसी घटनाओं पर क्षणिक हर्ष भी छा जाता है। यदि मुझे यह पता न होता कि यह हिंसा किसी उफनते हुए तरल की सतह पर आ रहे झाग की तरह है, तो शायद मुझे घोर निराशा होती; क्योंकि अहिंसा निकट भविष्य में हमें वह आजादी हासिल कराती नहीं दिखती, जिसके लिए हम तमाम देशवासी लालायित हैं—चाहे वे हिंसा में यकीन करने वाले हों या पूर्णतः अहिंसक लोग।
परंतु, पिछले बारह महीनों के दौरान मध्य भारत के दौरे में मिले अपने अविरल अनुभवों के आधार पर मुझे यह पक्का यकीन है कि उस विशाल जनमानस को हिंसा की भावना छू तक नहीं सकी है, जो अब इस बात के प्रति जागरूक हो चुका है कि उसे आजादी मिलनी ही चाहिए। इसलिए वायसराय की रेलगाड़ी के नीचे हुए बम-धमाके जैसी इक्का-दुक्का हिंसक घटनाओं के बावजूद मुझे पूर्ण विश्वास है कि हमारी राजनीतिक लड़ाई के लिए अंततः अहिंसा का रास्ता ही अपनाया जाना है। राजनीतिक संघर्ष में अहिंसा के प्रभाव और जनसाधारण द्वारा इस पर अमल की संभावना में मेरी आस्था दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इसीलिए मैं आज उन लोगों से तर्क करना चाहता हूँ, जो हिंसा की भावना से इतने लबरेज़ नहीं हो गए हैं कि तर्क की परिधि के पार जा चुके हों।
आइए, पल भर को सोचिए कि यदि वायसराय उस दिन गंभीर रूप से जख्मी या हलाक (मृत) हो गए होते, तो क्या हुआ होता? यह तय है कि तब पिछले महीने की २३ तारीख को हुई महत्वपूर्ण बैठक नहीं हो पाती। इसलिए यह भी निश्चित नहीं हो पाता कि कांग्रेस आगे कौन सा रास्ता अख्तियार करेगी। बेशक वह एक अवांछित नतीजा होता; यह हमारी खुशकिस्मती है कि वायसराय और उनके समूह को कुछ भी नहीं हुआ। वे बड़े संयत अंदाज में उस दिन की दिनचर्या में लीन रहे, मानो कुछ हुआ ही न हो। मुझे पता है कि इस अटकलबाजी के तर्क का उन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ेगा जिनके दिल में कांग्रेस के लिए कोई कद्र नहीं है; लेकिन मुझे उम्मीद है कि अन्य लोग—जिनकी उम्मीदें केवल हिंसा पर ही टिकी हैं—वे इस दलील की सच्चाई का अहसास करेंगे और इस काल्पनिक तस्वीर से एक महत्वपूर्ण सबक लेंगे।
राजनीतिक हिंसा पर इस देश में अमल के कुल जमा नतीजे पर ही गौर कीजिए। जब भी यहाँ हिंसा हुई है, हमें भारी नुकसान उठाना पड़ा है; देश का सैन्य खर्च बढ़ा दिया गया। इसके बरअक्स हमें मिला क्या? मॉर्ले-मिंटो सुधार, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार और ऐसे ही अन्य कागजी सुधार। आज ऐसे राजनेताओं का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है, जो अब यह महसूस करने लगे हैं कि ऐसे सुधार हम पर भारी आर्थिक बोझ लादकर थमाए गए ‘झुनझुने’ भर हैं। यह सही है कि कुछ मामूली सी रियायतें दी गईं, कुछ और हिंदुस्तानियों को सरकारी नौकरियाँ मिल गईं; लेकिन उस गरीब अवाम के ऊपर टैक्स का बोझ और बढ़ गया, जिसके नाम पर और जिसके लिए हम सच्ची आजादी चाहते हैं। इस हिंसा से हमें बदले में कुछ भी ठोस नहीं मिला। अगर हम इतना भर महसूस कर लें कि सच्ची आजादी हमें विदेशियों को आतंकित करने से नहीं, बल्कि स्वयं डरना छोड़ने और गाँव के लोगों को निर्भय बनाना सिखाने से मिलेगी, तो हमें तत्काल मालूम पड़ जाएगा कि हिंसा का रास्ता हमारे लिए कितना घातक है।
फिर, खुद पर होने वाली इसकी प्रतिक्रिया पर भी गौर कीजिए। विदेशी शासक के खिलाफ हिंसा का स्वाभाविक और आसान सा अगला कदम यह होता है कि हम इसका इस्तेमाल अपने ही उन लोगों के खिलाफ करने लगते हैं, जो हमें देश की तरक्की की राह में बाधक नजर आते हैं। हिंसा का नतीजा अन्य देशों में क्या रहा, उस पर गौर न भी करें और अहिंसा के दर्शन का हवाला न भी लें, तो यह समझने के लिए हमें कोई बड़ी बौद्धिक कसरत करने की जरूरत नहीं है कि समाज को उन जुल्मों से मुक्त करने के लिए अगर हम हिंसा का सहारा लेते हैं जो हमारी तरक्की को बाधित कर रहे हैं, तो हम और कुछ नहीं बल्कि अपनी मुश्किलों को ही बढ़ाएँगे और आजादी के दिन को और दूर धकेलेंगे।
जिन्हें सुधार की जरूरत नहीं लगती और जो सुधरने को तैयार नहीं हैं, वे अपने खिलाफ हिंसा होती देख गुस्से से पागल हो जाएँगे और जवाबी हमला करने के लिए विदेशियों की मदद लेंगे। क्या हमने यह सब गुजरे कई सालों के दौरान अपनी आँखों के सामने होते नहीं देखा है, जिसकी दर्दनाक यादें हमारे दिलो-दिमाग में अभी भी ताजा हैं?
अब इस दलील के सकारात्मक पहलू पर गौर करें। अहिंसा वर्ष १९२० में कांग्रेस की मुख्य विचारधारा का हिस्सा बनी। इसके बाद कांग्रेस में मानो जादुई बदलाव आया; देश का आवाम जागृत हो उठा। कोई नहीं जानता कि यह चमत्कार कैसे हुआ, लेकिन दूर-दराज के गाँव भी आलोड़ित हो उठे। ऐसा लगा मानो सदियों के जुल्म एक झटके में मिट गए। लोगों को अपनी सामूहिक ताकत का अहसास हो गया, उन्हें सत्ता का खौफ नहीं रहा। अल्मोड़ा में सदियों पुरानी ‘बेगार प्रथा’ खत्म हो गई; देश के कई अन्य हिस्सों में भी ऐसा ही हुआ जहाँ लोग उस अदम्य ताकत का अहसास करने लगे जो उनके भीतर छिपी थी। यह उनकी वह आजादी थी, जो उन्होंने अपने बूते पर हासिल की थी। यह आवाम का सच्चा स्वराज था।
यदि अहिंसा के बढ़ते कदमों को उन हिंसक घटनाओं ने बीच में ही न रोका होता जिनकी परिणति ‘चौरी-चौरा कांड’ में हुई थी, तो मुझे कोई शक नहीं कि आज हम पूर्ण स्वराज का सुख भोग रहे होते। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन कई लोग अविश्वास के साथ कहते रहे हैं कि—”आप आम जनता को अहिंसा नहीं सिखा सकते; यह केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही संभव है और वह भी विरले मामलों में।” मेरे ख्याल से ऐसा सोचना खुद को भुलावे में रखना है। मनुष्य यदि आदतन अहिंसक नहीं होता, तो वह खुद को कई युगों पहले ही नष्ट कर चुका होता। हिंसा और अहिंसा के बीच चलने वाली इस सनातन जद्दोजहद में आखिरकार जीत अहिंसा की ही हुई है। सच्चाई यह है कि हममें अब इतना धीरज ही नहीं रहा कि हम इंतजार करें और राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आवाम के बीच अहिंसा का प्रचार करने में खुद को दिलो-जान से लगा दें।
अब हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। मुकम्मल आजादी अब हमारा कोई दूरगामी लक्ष्य नहीं, बल्कि तात्कालिक लक्ष्य है। क्या यह बात स्पष्ट नहीं है कि अगर हमें करोड़ों-करोड़ लोगों के दिलों में आजादी की सच्ची तड़प जगानी है, तो ऐसा हमें अहिंसा के जरिए ही करना होगा? इतना ही काफी नहीं है कि हम गुप्त हिंसा के जरिए अंग्रेजों को आतंकित कर यहाँ से भगा दें; यह मार्ग हमें आजादी तक नहीं, बल्कि घोर अराजकता और गड़बड़ी की ओर ले जाएगा।
लोगों के दिलो-दिमाग का आह्वान करके और अपने आपसी मतभेदों को सुलझाकर ही हम इस देश में स्थायी आजादी कायम कर सकते हैं। आपस में एक जैविक और आत्मिक एकता विकसित करके ही इसे बचाए रखा जा सकता है। हमारा ‘सविनय जन असहयोग आंदोलन’ उन लोगों को आतंकित कर या उन्हें खत्म कर नहीं चलाना चाहता जो हमारे बढ़ते कदमों को बाधित करते हैं, बल्कि हम उनके साथ धीरज और भद्रता के साथ पेश आकर विरोधियों का मन बदलकर आंदोलन चलाना चाहते हैं। हर कोई समझता है कि यहाँ ‘सविनय’ (Civil) का सीधा मतलब ‘पूर्णतः अहिंसक’ है। और क्या यह बात अक्सर साबित नहीं हुई है कि सविनय अवज्ञा जनसाधारण के स्तर पर बिना गहरी अहिंसा और कड़े अनुशासन के नामुमकिन है?
कुछ और नहीं तो हमारे आज के हालात ही उस सीमित किस्म की अहिंसा की माँग करते हैं, जिसकी ओर मैंने इशारा किया है। इस बात को स्वीकार करने के लिए हमें किसी धार्मिक अवस्था का सहारा लेने की जरूरत नहीं है। इसलिए, जो लोग विवेक से परे नहीं हैं, उन्हें इस ताज़ातरीन बम कांड जैसी नृशंस और हिंसक गतिविधियों को छिपे या खुले तौर पर समर्थन देना तुरंत बंद कर देना चाहिए। इसके उलट, उन्हें इन हिंसक कार्रवाइयों की खुलकर और तहेदिल से निंदा करनी चाहिए, ताकि बहकावे में पड़े हमारे देशभक्तों की हिंसक भावनाओं को और बढ़ावा न मिले। उन्हें हिंसा की निरर्थकता का अहसास हो और वे यह महसूस करें कि ऐसी हिंसक कार्रवाइयों से हर बार देश को कितना भारी नुकसान पहुँचा है।
आलेख का मूल तत्व: बम का दर्शन
यह आलेख गवाह है कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान केवल अंग्रेजों से ही नहीं, बल्कि आजादी हासिल करने के ‘रास्ते और दर्शन’ को लेकर भी देश के भीतर एक बहुत बड़ा वैचारिक द्वंद्व चल रहा था। एक तरफ जहाँ बम और पिस्तौल की शक्ति से क्रांति का उद्घोष था, वहीं दूसरी तरफ जन-आंदोलन और हृदय-परिवर्तन की अहिंसक कसौटी थी।