भूमिका: दो विचारधाराओं का महासंग्राम
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भारतीय स्वाधीनता संग्राम केवल अस्त्रों का युद्ध नहीं था, बल्कि वह विचारों का भी एक प्रचंड महासंग्राम था। २३ दिसंबर, १९२९ को वायसराय की ट्रेन पर हुए हमले ने देश के दो सबसे बड़े वैचारिक ध्रुवों—महात्मा गांधी और क्रांतिकारी दल—को आमने-सामने खड़ा कर दिया। गांधीजी ने जहाँ ‘बम की पूजा’ लिखकर क्रांतिकारियों को ‘आजादी के रास्ते का रोड़ा’ बताया, वहीं जेल की सलाखों के पीछे से भगत सिंह और बाहर से भगवतीचरण वोहरा ने तर्क की कसौटी पर इस आलेख का उत्तर तैयार किया।
यह जवाब ‘बम का दर्शन’ केवल हिंसा का समर्थन नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता की एक व्यापक परिभाषा है, जिसमें सामाजिक न्याय, समानता और शोषणविहीन समाज का सपना बुना गया था। यह आलेख सिद्ध करता है कि क्रांतिकारी केवल ‘जज्बाती युवक’ नहीं थे, बल्कि वे गहरे अध्ययन और तर्क से लैस ‘राजनीतिक विचारक’ थे।
बम का दर्शन
मूल लेखक: भगवतीचरण वोहरा एवं भगत सिंह (जनवरी, १९३०)
हाल ही की घटनाएँ—विशेष रूप से २३ दिसंबर, १९२९ को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने का जो प्रयत्न किया गया था, उसकी निंदा करते हुए कांग्रेस द्वारा पारित प्रस्ताव तथा ‘यंग इंडिया’ में गांधीजी द्वारा लिखे गए लेखों से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गांधीजी से साँठ-गाँठ कर भारतीय क्रांतिकारियों के विरुद्ध घोर आंदोलन प्रारंभ कर दिया है। जनता के बीच भाषणों तथा पत्रों के माध्यम से क्रांतिकारियों के विरुद्ध बराबर दुष्प्रचार किया जाता रहा है। क्रांतिकारी अपने सिद्धांतों की ऐसी आलोचना से नहीं घबराते, बल्कि वे इसका स्वागत करते हैं, क्योंकि यह उन्हें अपने मूलभूत सिद्धांतों और उच्च आदर्शों को जनता के सामने रखने का एक स्वर्णावसर प्रदान करता है।
हिंसा और अहिंसा: एक नई व्याख्या
सबसे पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर विचार करें। हमारे विचार से इन शब्दों का प्रयोग ही गलत किया गया है। हिंसा का अर्थ है—अन्याय के लिए किया गया बल प्रयोग; परंतु क्रांतिकारियों का उद्देश्य कभी अन्याय नहीं रहा। दूसरी ओर, अहिंसा का जो सामान्य अर्थ समझा जाता है, वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धांत, जिसका उपयोग विरोधी का हृदय-परिवर्तन करने के लिए किया जाता है।
एक क्रांतिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है, तो वह उनकी माँग करता है और उसके समर्थन में अपना समस्त शारीरिक बल प्रयोग भी करता है। आप इसे ‘हिंसा’ नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा करना शब्दकोश के साथ अन्याय होगा। सत्याग्रह का अर्थ है—सत्य के लिए आग्रह; तो फिर उसकी स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति का ही आग्रह क्यों? शारीरिक बल प्रयोग क्यों नहीं? क्रांतिकारी स्वतंत्रता के लिए शारीरिक और नैतिक, दोनों शक्तियों के प्रयोग में विश्वास करता है।
क्रांति का वास्तविक स्वरूप
क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रांति से ही स्वतंत्रता मिलेगी। क्रांति का अर्थ केवल सशस्त्र संघर्ष नहीं है, बल्कि एक नवीन सामाजिक व्यवस्था का निर्माण है। यह क्रांति पूँजीवाद, वर्गवाद और विशेषाधिकारों का अंत कर देगी। यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी और मजदूर व किसानों का राज्य कायम कर उन सामाजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो आज शक्ति हथियाए बैठे हैं।
आतंकवाद और उसका स्थान
आतंकवाद संपूर्ण क्रांति नहीं है, लेकिन क्रांति भी आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं होती। यह क्रांति का एक आवश्यक अंग है। आतंकवाद आततायी के मन में भय पैदा कर पीड़ित जनता में प्रतिशोध की भावना जाग्रत करता है और उन्हें आत्मविश्वास प्रदान करता है। दुनिया के सामने यह स्पष्ट कर देता है कि राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के लिए कितना उत्कट महत्त्वाकांक्षी है।
कांग्रेस और गांधीजी की दलीलों का खंडन
गांधीजी सोचते हैं कि भारतीय जनता को हिंसा की भावना छू तक नहीं गई है। वे जनसाधारण की विचारधारा को मंचों से उपदेश देकर समझने का दावा करते हैं, लेकिन क्या उन्होंने कभी किसी गाँव की चौपाल में किसान या कारखाने के मजदूर के साथ शाम बिताकर उनके विचार जानने की कोशिश की है? हमने यह किया है, इसलिए हम दावा करते हैं कि हम जनता को जानते हैं। साधारण मानव शत्रु से प्रेम करने की आध्यात्मिक भावना को बहुत कम समझता है। यह ध्रुव सत्य आदम और हौवा के समय से चला आ रहा है कि जो तुम्हारा मित्र है, तुम उससे स्नेह करते हो और जो तुम्हारा शत्रु है, उससे तुम कोई संबंध नहीं रखते।
गांधीजी का कथन है कि हिंसा से सैन्य खर्च बढ़ा है और प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हुआ है। हम उन्हें चुनौती देते हैं कि वे इसे तथ्यों से सिद्ध करें। रूस और तुर्की के उदाहरण हमारे सामने हैं, जहाँ सशस्त्र क्रांति के बाद सामाजिक प्रगति अत्यंत तीव्र गति से हुई। अहिंसा को अब तक केवल एक ही आशीर्वाद मिला है—और वह है ‘असफलता’। १९२० के बाद जो जन-जागृति हुई, उसका श्रेय केवल अहिंसा को देना भूल है; वह जागृति ‘सीधे मोर्चे’ (Direct Action) की कार्रवाई से हुई थी।
निष्कर्ष की ओर
गांधीजी ने विचारशील लोगों से क्रांतिकारियों की निंदा करने को कहा है। वे क्रांतिकारियों का मनोविज्ञान नहीं समझते। जो व्यक्ति अपना सिर हथेली पर रखकर आत्मबलिदान के लिए तैयार रहता है, वह केवल खेल के लिए ऐसा नहीं करता। वह जय-जयकार के लिए भी बलिदान नहीं देता। वह इस मार्ग पर इसलिए चलता है क्योंकि उसकी अंतरात्मा उसे प्रेरित करती है।
एक क्रांतिकारी केवल ‘तर्क’ (Logic) में विश्वास करता है। किसी भी प्रकार की गाली-गलौज या निंदा उसे उसके लक्ष्य से विचलित नहीं कर सकती। हम प्रत्येक देशभक्त से निवेदन करते हैं कि वे इस युद्ध में शामिल हों। स्वतंत्रता राष्ट्र का प्राण है। हम किसी से दया की भिक्षा नहीं माँगते और न ही किसी को क्षमा करेंगे। हमारा युद्ध विजय या मृत्यु के निर्णय तक चलता रहेगा।
क्रांति चिरंजीवी हो!
(करतार सिंह, प्रेजीडेंट)
निष्कर्ष: इतिहास का न्याय
अश्विनी भाई, यदि हम गांधीजी के ‘बम की पूजा’ और भगत सिंह के ‘बम का दर्शन’ को एक साथ रखकर देखें, तो समझ आता है कि दोनों का लक्ष्य ‘भारत की आजादी’ ही था, किंतु रास्ते भिन्न थे। गांधीजी जहाँ ‘साध्य और साधन’ दोनों की पवित्रता पर जोर दे रहे थे, वहीं भगत सिंह का तर्क था कि सोई हुई जनता को जगाने के लिए ‘धमाके’ की जरूरत होती है और अन्याय के विरुद्ध बल प्रयोग करना ‘हिंसा’ नहीं, बल्कि ‘कर्तव्य’ है।
आज का इतिहास गवाह है कि भारत की आजादी में जहाँ गांधीजी के जन-आंदोलनों ने नींव तैयार की, वहीं भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और भगवतीचरण वोहरा जैसे क्रांतिकारियों के बलिदान ने अंग्रेजों के मन में वह ‘खौफ’ पैदा किया जिसने उन्हें बोरिया-बिस्तर समेटने पर मजबूर कर दिया। ‘बम का दर्शन’ हमें सिखाता है कि वैचारिक स्पष्टता और आत्म-सम्मान के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध कभी व्यर्थ नहीं जाता।
वैचारिक महासंग्राम: गांधीजी के ‘बम की पूजा’ बनाम भगत सिंह के ‘बम का दर्शन’ का शोध-परक विश्लेषण
2 thoughts on “बम का दर्शन: गांधीजी के ‘बम की पूजा’ पर भगत सिंह और क्रांतिकारियों का ऐतिहासिक जवाब”