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UBI Contest १०३
सूरजमुखी का सूरज प्रेम

​विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ 

 

​सूरज सरीखा रूप लिए,

वह डाली पर लहराया है;

चेहरे पर उसके वही तेज़ है, जो—

सूरज मेरे उपवन में उतर आया है!

 

​फैलाकर अपनी अनोखी आभा,

बहकाता सबके अंतर्मन को;

रंग-बिरंगे फूलों में भी रहकर,

देखता घूम-घूम कर उपवन को।

 

​नाम है उसका सूरजमुखी,

सूरज से बड़ा पुराना नाता है;

सूरज के आने से हँसता,

जाते ही वो तड़प जाता है।

 

​सूरज से है उसकी प्रीत निराली,

नहीं चेतना कभी बदलने वाली;

पूरे दिन सूरज को चलते देखे वो,

बेचैनी उसकी हैरान करने वाली!

 

​छुई-मुई का फूल नहीं वो,

जो छूते ही कुम्हला जाए;

कड़ी धूप की परीक्षा में वो,

खड़े-खड़े डाली पर मुस्काए।

 

​टूट जाए डाली से फिर भी,

न शोक मनाता जीवन का;

दे अपना सर्वस्व समर्पण,

आनंद मनाता जीवन का!

 

 

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