शब्दों का अंधानुकरण: ‘RIP’ बनाम ‘सद्गति’ और पुनर्जन्म का दर्शन
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भाषा और प्रतीक किसी भी संस्कृति के वैचारिक आधार होते हैं। जब हम बिना सोचे-समझे किसी दूसरी संस्कृति के प्रतीकों को अपनी जीवन-शैली में शामिल करते हैं, तो हम अनजाने में अपनी ही मान्यताओं का क्षरण कर रहे होते हैं। वर्तमान समय में किसी के अवसान पर ‘RIP’ लिखने का बढ़ता चलन इसी वैचारिक अंधानुकरण का जीवंत उदाहरण है।
क्या है ‘RIP’ का वास्तविक और ऐतिहासिक अर्थ?
‘RIP’ का मूल स्वरूप लैटिन भाषा के वाक्यांश ‘Requiescat in pace’ से आया है, जिसका अर्थ है—”मृत आत्मा की शांति में विश्राम के लिए की जाने वाली प्रार्थना।” आधुनिक काल में अंग्रेजी भाषा के प्रभाव के कारण यह ‘Rest in Peace’ (शांति से आराम करें) बन गया।
यह संकल्पना पूर्णतः अब्राहमिक (ईसाई और इस्लामिक) धार्मिक पौराणिक कथाओं और मान्यताओं पर आधारित है। इन संस्कृतियों में ‘एकैकी जीवन’ (Single Life) की मान्यता है। इसके अनुसार, मृत्यु के बाद शरीर को संलेपन (Embalm) करके, ताबूत में ईश्वर की निर्धारित दिशा में मुख करके दफनाया जाता है। वहाँ मान्यता है कि आत्मा अंतिम न्याय के दिन (जिसे इस्लाम में ‘कयामत’ और ईसाइयत में ‘जीसस का पुनरागमन’ कहा गया है) तक कब्र में विश्राम करेगी और शुद्धिकरण का इंतज़ार करेगी। उसके बाद ही आस्थावानों को स्वर्ग या नर्क की प्राप्ति होगी। इसलिए वहाँ ‘विश्राम’ या ‘Rest’ का विचार तार्किक है।
भारतीय दर्शन: शाश्वत यात्रा और पुनर्जन्म का सिद्धांत
इसके विपरीत, भारत की धरती पर जनमे दर्शन—हिंदू (सनातन), बौद्ध और जैन धर्म—एक सर्वथा भिन्न और अत्यंत वैज्ञानिक आध्यात्मिक सिद्धांत पर विश्वास करते हैं, जिसे ‘पुनर्जन्म और कर्मफल का सिद्धांत’ कहा जाता है।
हमारे दर्शन में आत्मा के लिए ‘विश्राम’ या किसी एक स्थान पर ठहरने की कोई संकल्पना ही नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
अर्थात, आत्मा हमेशा एक अनवरत यात्रा पर है। वह कर्म बंधनों के अनुसार एक शरीर छोड़कर तुरंत दूसरा शरीर (नया वस्त्र) धारण कर लेती है। जन्म और पुनर्जन्म का यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक कि जीवात्मा को पूर्ण ज्ञान (मोक्ष या निर्वाण) की प्राप्ति नहीं हो जाती। जो निरंतर गतिशील है, उसे ‘विश्राम’ की कामना देना हमारे अपने ही दर्शन के विपरीत है।
दाह संस्कार और अस्थि विसर्जन का प्रतीक
सनातन संस्कृति में मृत्यु के तुरंत बाद शरीर का दाह संस्कार (अग्निदाह) करना और अस्थियों को पवित्र नदियों में विसर्जित करना इस बात का साक्ष्य है कि यह कंक्रीट का नश्वर शरीर अब अर्थहीन हो चुका है। हम तत्व को तत्व में मिला देते हैं ताकि आत्मा का इस भौतिक संसार और इस शरीर से मोहभंग हो सके और वह बिना किसी बाधा के अपनी अगली यात्रा पर बढ़ सके।
निष्कर्ष: अपनी जड़ों की ओर लौटना
यह किसी संस्कृति की आलोचना नहीं है, बल्कि अपनी मान्यताओं के प्रति सजगता का विषय है। जहाँ एक बार जन्म की मान्यता है, वहाँ शव को सहेजकर ‘RIP’ कहना उनकी आस्था के अनुकूल है। परंतु जहाँ आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म की प्रतिष्ठा है, वहाँ मृत आत्मा के लिए ‘ॐ शांति’, ‘सद्गति’, ‘दिवंगत आत्मा को मोक्ष मिले’ या ‘पुण्यात्मा को प्रभु अपने श्रीचरणों में स्थान दें’ जैसे शब्द ही तार्किक और न्यायसंगत हैं। हमें बहती धारा में बहने के बजाय अपनी भाषा और अपनी जड़ों के गौरव को समझना होगा।
धन्यवाद!