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प्यार का पंचतत्व: बचपन की निश्छलता से जीवनसंगिनी की पूर्णता तक का एक आत्मीय जीवन-वृत्त

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

प्रस्तावना: हृदय की भाषा और प्रेम का व्याकरण

प्रेम कोई गणितीय समीकरण नहीं है जिसे दिमाग से हल किया जाए; यह तो आत्मा का वह मौन संगीत है जो सीधे दिल की गहराइयों में गूँजता है। इसमें अनेक मानवीय भावनाओं, अनगिनत स्मृतियों और अलग-अलग वैचारिक अंतर्द्वंद्वों का एक अद्भुत समावेश होता है। प्रेम मनुष्य को स्नेह की कोमल उँगली थामकर धीरे-धीरे परम आनंद और असीम खुशी की ओर अग्रसर करता है। यह एक ऐसा चुंबकीय आकर्षण और अटूट निजी जुड़ाव की भावना है, जो इंसान को सांसारिक बंधनों और दुनियावी होश-ओ-हवास को भुलाकर किसी के साथ हो जाने, उसके रंग में रंग जाने को प्रेरित करती है।

हर मनुष्य के जीवन में प्रेम कई रूपों में, कई पड़ावों पर दस्तक देता है। प्रस्तुत आलेख मेरे जीवन के उन्हीं पाँच अलग-अलग पड़ावों, अनुभूतियों और यादों का एक प्रामाणिक, संवेदनशील और साहित्यिक वृत्त चित्र है, जहाँ स्मृतियाँ आज भी गीतों की लय बनकर धड़कती हैं।

 

प्रथम अध्याय: बचपन का वो निश्छल और अबोध अनुराग

हमारा बचपन एक-दूसरे की छांव में पला था। हम दोनों साथ ही साथ स्कूल जाते, एक ही बेंच पर बैठते, साथ ही दोपहर का लंच साझा करते और छुट्टी होने पर फिर साथ ही घर आ जाते। दोनों के घर इतने पास थे कि दीवारें भी मानो आपस में बातें करती थीं। हमारे परिवारों के बीच एक गहरा और पुराना पारिवारिक संबंध था। हमारी उम्र, हमारी कक्षा और स्कूल में हमारा दाखिला भी एक ही दिन, एक ही साथ हुआ था; अतः हमारा चौबीसों घंटे एक साथ रहना प्रकृति का एक स्वाभाविक नियम बन चुका था। दिन भर या तो मैं उसके घर की दहलीज पर होता या वो मेरे आंगन में चहकती रहती थी।

मगर समय कब एक सा रहता है? हम कुछ बड़े हुए और प्रकृति ने हमारे बीच उम्र का दायरा खींच दिया। वो लड़कियों वाली कक्षा में और मैं लड़कों वाली कक्षा में अपने दिन गुजारने लगे। हालांकि, स्कूल आना और फिर साथ घर जाना अब भी बदस्तूर जारी था। लेकिन शायद हमारी बढ़ती उम्र को देखकर घरवालों की सोच बदलने लगी थी, या यूं कहें कि हमारा इस तरह मिलना अब बड़ों को पच नहीं रहा था। नतीजतन, उन्होंने हमें अलग करने की पटकथा लिख दी। वो उसी स्कूल में रह गई और मुझे उसके भाई के साथ एक दूसरे बॉयज़ स्कूल में भेज दिया गया।

अब हम पूरे दिन एक-दूसरे से दूर रहने लगे। घरों का आना-जाना भी सिमट गया। इस बंदिश से बचने के लिए हमने एक ‘न्यूट्रल’ और बेहद सुरक्षित जगह तलाश की। हमारे परिवारों की एक काफी नजदीकी बुजुर्ग पड़ोसी दादी थीं। हम दोनों ठीक समय पर उनके घर जाने लगे। उनके पास बैठना, उनके साथ खेलना, बातें करना और कभी-कभी उनकी अलमारी में रखी पुस्तकों के पन्नों को पलटना हमारी दिनचर्या बन गया। उन बुजुर्ग दादी से अध्यात्म, दर्शन, शास्त्र और ज्ञान की बातें सुनना बड़ा अद्भुत लगता था।

मगर हम ऐसा क्यों करते थे? उस उम्र में इस ‘क्यों’ का कोई जवाब हमारे पास नहीं था। बस इतना पता था कि वहाँ जाना अच्छा लगता था। कभी-कभार यदि वो आने में देरी करती या किसी वजह से नहीं आती, तो मन भीतर तक बेचैन हो उठता था। और जैसे ही वो कदम रखती, मन के सूखे उपवन में फूल खिल उठते थे; ऐसा लगता था मानो भोर में ओस की एक बूंद फूल की पंखुड़ी से फिसलकर अंतःस्थल में समा गई हो।

परंतु समय बड़ा ही निर्मम और कठोर होता है, उसके सीने में हृदय नहीं होता। उसने हमें एक बार फिर दूर ढकेल दिया, और वो दूरी आजीवन की बन गई। मुझे पढ़ाई के लिए मेरे उस बचपन के शहर से सात सौ किलोमीटर दूर एक बिल्कुल अनजाने शहर में भेज दिया गया। उस समय मैं सातवीं कक्षा में पढ़ रहा था और आठवीं में मेरा दाखिला एक नए शहर के नए माहौल में करा दिया गया। समय तो अपनी गति से चलता ही रहता है, बस कभी-कभी हम ठहरकर अतीत की खिड़की से पीछे झांक लेते हैं और रेडियो पर बजता एक पुराना गीत दिल को छू जाता है:

जानू मेरी जानेमन, बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे…

जैसा मेरा प्यार है, जान तुझे किया है, बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे…”

 

द्वितीय अध्याय: दाखिले की दहलीज पर उपजा मौन आकर्षण

जीवन का दूसरा प्यार ‘दाखिला वाला प्यार’ था, जिसकी शुरुआत की कहानी भी किसी हिंदी फिल्म के दृश्य जैसी ही दिलचस्प है। हुआ यूँ कि मैं एक नए स्कूल में एंट्रेंस एग्जाम (प्रवेश परीक्षा) देने गया हुआ था। परीक्षा हॉल में जहाँ मेरी सीट थी, ठीक बगल वाली सीट पर वो बैठी थी। मैंने उसे देखा, उसने मुझे देखा और… पहली ही नज़र में प्यार हो गया! धत्त! ऐसा केवल उपन्यासों में होता है, हमारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हम दोनों कौन हैं, कहाँ से आए हैं, किस क्लास में एडमिशन लेना है—हममें से किसी ने एक-दूसरे से कुछ नहीं पूछा। दोनों ने अपनी-अपनी परीक्षा दी, कॉपियाँ जमा कीं और परिणाम के इंतजार में, भविष्य के परिमाण का ध्यान किए बिना अपने-अपने घोंसलों (घरों) में वापस आ गए।

लेकिन समय सबसे बड़ा खिलाड़ी है। वह हमारे जीवन के मोहरों से तब तक खेलता है, जब तक हम पूरी तरह हार न जाएं। उसने अपनी चाल चल दी थी और हम बेखबर थे।

एक दिन कड़ाके की ठंड में धूप सेंकने के लिए मैं अपने भाइयों के साथ छत पर था। हम आपस में ही हँसी-मज़ाक में मशगूल थे कि एकाएक मेरी नज़र ठीक सामने वाली छत पर पड़ी। वहाँ वही लड़की खड़ी थी, जो सीधे हमारी तरफ ही देख रही थी और शायद पहचानने की कोशिश कर रही थी। मैंने जैसे ही उसे देखा, झट से पहचान गया। दिल धड़का, मैं चौंका और बिना कुछ बोले, बिना कुछ सोचे, झटपट छत से नीचे उतर आया।

उस दिन तो डर और संकोच में मैं नीचे भाग आया था, किंतु अब रोज धूप में ‘पढ़ने के बहाने’ किताबें लेकर छत पर जाने का सिलसिला शुरू हो गया। मगर ऐसा लगा कि उस कड़ाके की सर्दी को हमसे कुछ ज़्यादा ही ‘गर्मी’ होने लगी थी; मानो वह सर्दी भी उस लड़की का कोई आशिक हो, जिसे हमारा छत पर आना अखरता था। तभी तो उसने सूरज महाराज को तपिश की रिश्वत देकर हमें दोपहर में नीचे भगा दिया। पर हम भी बक्सर के जिद्दी राही थे; हमने छत पर जाने का समय बदलकर शाम का चुन लिया। तब तक सर्दी अपना रास्ता बदल चुकी थी, अब वह आड़े नहीं आती थी।

यह बिना कुछ बोले, बिना इकरार किए सिर्फ नजरों से चलने वाला ‘बिन बोला प्यार’ पूरे चार साल तक चला। हमने जैसे ही बारहवीं पास की, घर वालों ने आगे की पढ़ाई के लिए बड़े शहर के कॉलेज का टिकट हमारे हाथ में थमा दिया। इस प्रकार, वह ‘दाखिला वाला प्यार’ मेरे जीवन की किताब में कभी दाखिल हुए बिना ही, अपनों के द्वारा बेदखल कर दिया गया:

तेरा मेरा एक होना नसीब नहीं,

साथ है, मगर आज करीब नहीं।

हाँ! माना कि तुमसे बिछड़ना

किस्मत में पहले से ही लिखा था,

यकीन कर मेरा कि मैंने दूर से ही,

तुझसे जी भरकर इश्क़ किया था।

 

तृतीय अध्याय: कॉलेज के गलियारे और ‘नर्वस नाइंटी’ का पागलपन

अब मैं एक बड़े शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज का छात्र बन चुका था। जिंदगी में एक नया उत्साह था। कुछ नए दोस्त भी बन गए थे, जो सारे के सारे लड़के ही थे। हमारे कॉलेज की वो क्लास पूरी रंगीनियत से भरी हुई थी; वहाँ इंसानी फितरत के हर रंग मौजूद थे—कोई बहुत पढ़ाकू था, तो कोई आवारा; कोई एकदम मॉडर्न था, तो कोई बेचारा। सह-शिक्षा होने के कारण क्लास में लड़कियाँ भी पढ़ती थीं, मगर बैठने की व्यवस्था ऐसी थी कि लड़के एक तरफ और लड़कियाँ दूसरी तरफ बैठते थे।

मैंने उसे पहली बार तब देखा, जब वह क्लास में प्रवेश करने के लिए प्रोफेसर सर से आज्ञा मांग रही थी। उस पल वह एक साथ कभी अपनी लहराती जुल्फों को तो कभी हाथों में दबी किताबों को संभालने की कोशिश कर रही थी। उसकी उस सहज सुंदरता को देखकर मेरे साथ-साथ पूरी क्लास की नजरें उसकी ओर खिंची चली गईं। वह आई, खाली जगह देखी और बैठ गई।

बस! उस दिन के बाद से मानो मेरी एक अघोषित ड्यूटी लग गई थी—रोजाना कॉलेज समय से पहले आना और मुख्य द्वार पर खड़े होकर उसका इंतजार करना। वह रोज़ आती, बिना किसी की ओर देखे, अपनी नीची नजरें लिए सीधे अपनी सीट पर जाकर बैठ जाती। उसका इस तरह किसी को न देखना बड़ा अखरता था, पर दिल को तसल्ली इस बात की थी कि उसे रोजाना जी भरकर देखने का सौभाग्य मिल रहा था। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि यश चोपड़ा ने अपनी फिल्म ‘मोहब्बतें’ कहीं मुझसे प्रेरित होकर तो नहीं बनाई थी? क्योंकि एकतरफा और अधूरे प्यार के ताने-बाने पर बुनी वह फिल्म इस घटना के ठीक एक साल बाद ही परदे पर आई थी।

एक दिन क्लास में गणित के प्रोफेसर ब्लैकबोर्ड पर एक जटिल सवाल समझा रहे थे, मगर वो बार-बार एक ही जगह आकर अटक जाते थे। जब कई कोशिशों के बाद भी वो अपनी गलती नहीं पकड़ पाए, तो उन्होंने तंग आकर पूरी क्लास से कहा, “अगर किसी को मेरी गलती दिखाई दे रही हो, तो यहाँ आकर बोर्ड पर सुधार दे, नहीं तो मैं कल देखूँगा। आज के लिए बस इतना ही।” यह कहकर सर क्लास से चले गए।

सर के जाते ही मैंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर उस सवाल के सूत्र को पकड़ा और उसे सही-सही हल कर लिया। हमें डेस्क पर सवाल हल करते हुए शायद वह देख रही थी। इसीलिए उसने बिना कुछ बोले, तुरंत अपनी कॉपी मेरी ओर बढ़ा दी। मेरे भीतर के सिपाही ने भी कोई शब्द नहीं निकाला; मैंने सीधे उसकी कॉपी ली, सवाल हल किया और वापस उसके हाथ में थमा दिया।

अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने उसके साथ इतना रूखा व्यवहार क्यों किया? भाई साहब! वह कोई रूखा व्यवहार नहीं था, बल्कि उसके इस अचानक कदम से मैं ‘नर्वस नाइंटी’ (Nervous nineties) का शिकार हो गया था। मेरे माथे से पसीने छूट रहे थे, दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा बस किसी तरह यहाँ से भाग निकलूँ। कभी-कभी इंसान हद से ज़्यादा खुशी भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। मैं क्लास से ऐसा भागा कि सीधे ग्राउंड में जाकर हरी घास पर बैठ गया। काफी देर तक वहीं अकेला बैठा रहा—कभी खुद-ब-खुद हँसता, कभी चुप हो जाता, तो कभी हवा में बड़बड़ाने लगता। उस पल मैं पूरी तरह एक रूमानी पागलपन की गिरफ्त में था। यह दौरा और लंबा चलता, अगर मेरे दो खास दोस्तों ने आकर मुझे झकझोरा न होता।

उस दिन के बाद से, जो लड़की सिर्फ मेरी नजरों में थी, मैं भी उसकी नजरों के दायरे में आ गया था। अब रोजाना शब्दों के बिना, सिर्फ नजरों से मूक गुफ़्तगू होने लगी।

“आँखें खुली हों या हों बंद, दीदार उनका होता है…

कैसे कहूँ मैं ओ यारा, ये प्यार कैसे होता है…”

इस बार मैंने दिल में यह पक्का संकल्प ले लिया था कि हर बार की तरह इस बार अपने प्यार को अधूरा नहीं छोड़ूँगा, इसे पाकर ही रहूँगा। मेरे दोनों मित्रों ने भी इस प्रेम-यज्ञ में घी डालने का काम किया और मुझे प्रोत्साहित किया। हम तीनों ने मिलकर योजना बनाई कि सबसे पहले उसके घर का पता लगाया जाए। पर कैसे? एक दोस्त ने आइडिया दिया, “उसकी कार का पीछा करते हैं।” हम तैयार हो गए। एक ही साइकिल पर हम तीन लोग सवार हुए और वो अपनी मोटरकार में थी। पीछा शुरू हुआ, मगर चंद सेकंड में खत्म भी हो गया; क्योंकि कार चालू हुई, तेज रफ्तार से आगे बढ़ी और पहले ही मोड़ पर हमारी नजरों से ओझल हो गई।

हम निराश होकर बैठ गए। तब दूसरे मित्र ने ढाढस बंधाया, “निराश मत हो, कल हम पहले से ही उस मोड़ पर खड़े रहेंगे।” दूसरे दिन भी यही लुका-छिपी हुई—गाड़ी उस मोड़ से तो मुड़ी, पर अगले मोड़ पर जाकर फिर गायब हो गई। इस तरह, तीसरे दिन हम दूसरे मोड़ पर खड़े हुए, चौथे दिन तीसरे पर… और पूरे सत्रह दिनों के कड़े परिश्रम, चक्रव्यूह और साइकिल की पैडल मारने के बाद आखिरकार हमें उसके आलीशान घर का पता मिल ही गया!

घर का पता तो मिल गया, पर अब सबसे बड़ा यक्ष-प्रश्न सामने खड़ा था—”अब आगे क्या करना है?” इस बात का जवाब हम तीनों में से किसी के पास नहीं था। हारकर हम चुपचाप अपने डेरे (कमरे) वापस आ गए। मैं आज तक अपने अंतर्मन से यह समझ नहीं पाया कि हमने सत्रह दिनों तक इतनी कड़ी मेहनत क्यों की थी, जब हमें उसके घर के आसपास कभी जाना ही नहीं था!

रोजाना एक-दूसरे को देखना, आँखों से बातें करना, क्लास में जाना, पढ़ना और फिर शाम को अपने-अपने घोंसलों में लौट आना—यही हमारी नियति बन चुकी थी। हाँ, पूरे तीन साल में उसने मुझसे सिर्फ एक बार बात की थी, वह भी तब जब परीक्षा का परिणाम आया और मैं पूरे कॉलेज में ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ आया था। उसने पास आकर धीमे से कहा था—”बधाई हो!” बस, वही दो शब्द मेरी तीन साल की साधना का पुरस्कार बन गए।

तीन साल बीत गए, हम ग्रेजुएट हो गए, मगर हमारा यह कॉलेज वाला प्यार बिना किसी ‘ग्रेच्युटी’ के ही विदा हो गया। एक बार फिर भविष्य की तलाश में यायावर (बंजारे) की तरह मैं दूसरे शहर की ओर निकल पड़ा:

“खिज़ां के फूल पे आती कभी बहार नहीं, मेरे नसीब में ऐ दोस्त, तेरा प्यार नहीं…

ना जाने प्यार में कब मैं, ज़ुबां से फिर जाऊं, मैं बनके आँसू खुद अपनी, नज़र से गिर जाऊं…

तेरी क़सम है मेरा कोई, ऐतबार नहीं, मेरे नसीब में ऐ दोस्त, तेरा प्यार नहीं…”

चतुर्थ अध्याय: स्मृतियों के खंडहर और सिंदूरी सच

वक्त का पहिया घूमा और पूरे सात साल बाद मैं वापस अपने उसी पुराने शहर और उसी पुराने मोहल्ले में लौट आया, जहाँ कभी मेरा बचपन चहका था। इन सात वर्षों के लंबे अंतराल में बहुत कुछ बदल चुका था। वक्त की मार साफ दिखाई दे रही थी:

जो कभी किशोर थे,

पूरी तरह जवान हो चुके थे;

सड़कें तो वैसी ही थीं,

मगर नए मकान हो चुके थे।

 

कभी जहाँ हम पले थे,

वो अब वीरान हो चुके थे;

कुछ बुजुर्गों को छोड़ा था,

आज वो श्मशान हो चुके थे।

 

मासूमियत यहीं रह गई थी,

अब हम बेईमान हो चुके थे;

कभी रिश्ते बहते थे हमसे,

आज बस सामान हो चुके थे।

मुझे अब आगे की ऊँची डिग्रियां लेनी थीं, इसलिए देश के एक बड़े विश्वविद्यालय की ओर मेरे कदम बढ़ रहे थे। परंतु अपने पुराने मोहल्ले में आकर मैं उसके (बचपन के प्यार के) बंद घर की ओर आकर्षित हुए बिना न रह सका। घर के पुराने दरवाजे अब मुझे पहचानते नहीं थे। मकान तो वही था, पर वह बूढ़ा और जर्जर हो चला था; शायद इसीलिए वह भी अपनी सुध-बुध खो चुका था।

मेरा दाखिला विश्वविद्यालय में हो गया। रोज़-रोज़ कॉलेज जाना नहीं होता था, तो मैं अक्सर घर पर ही खाली बैठा रहता। कुछ पढ़ता, तो कुछ उस खालीपन की वजह से भीतर ही भीतर उदासी में सड़ता रहता। आखिर करता भी क्या? पुराने स्कूली दोस्त स्कूल की दहलीज तक ही सीमित थे, उनसे मिलने का कोई जरिया नहीं था। मोहल्ले के कई हमउम्र दोस्त मेरी ही तरह यायावर बनकर दूसरे शहरों में पलायन कर चुके थे, और जो बचे थे वे अपने खानदानी व्यवसायों में इस कदर मरुस्थल की तरह रम चुके थे कि उनकी नई जिंदगी में मेरे जैसे अतीत के पन्ने के लिए कोई स्थान खाली नहीं था।

वापसी के समय मैंने आँखों में जो बड़े-बड़े सपने संजोए थे, वे सब कांच की तरह चकनाचूर हो चुके थे। न वो बचपन का प्यार मिला, न कोई नया साथी। चारों तरफ बस एक भयानक और डरावना खालीपन था। उस खालीपन को भरने और खुद को व्यस्त रखने के लिए मैंने एक जगह छोटी सी नौकरी कर ली। पैसे भले ही कम थे, पर मन में एक अजीब सा चैन था। अब रोज सुबह नौ बजे ऑफिस निकलना, शाम को सात बजे वापस आना और फिर अपनी पढ़ाई में डूब जाना—यही मेरा जीवन बन गया था। पुरानी यादें धीरे-धीरे दिमाग की परतों से धुंधली होने लगी थीं और अंतर्मन में एक नया सवेरा आकार ले रहा था।

किंतु, नियति को अभी एक अंतिम दृश्य दिखाना बाकी था। एक दिन सुबह जैसे ही मैं ऑफिस जाने के लिए अपने कदम घर से बाहर निकाला, ठीक उसी समय सामने वाले दरवाजे से वो भी बाहर निकली। उसके दरवाजे पर एक चमचमाती गाड़ी खड़ी थी, शायद वो कहीं दूर यात्रा पर जा रही थी। उसकी गोद में दो-ढाई साल का एक सुंदर सा बच्चा खेल रहा था। जब मेरी नज़र उसके चेहरे पर गई, तो उसकी मांग में चमकता सिंदूर और गले में झूलता मंगलसूत्र देखकर मैं पल भर में जिंदगी का सारा गणित भली-भाँति समझ गया।

मुझे अचानक सामने देखकर उसके चेहरे पर एक आत्मीय खुशी तैर गई। उसने संकोच और अपनेपन से पूछा—”कब आए?”

मैंने अपने भीतर के सैलाब को रोका, चेहरे पर एक औपचारिक मुस्कान लाते हुए कहा—”आना तो था ही, सो आ गया। अच्छा, बाद में बात करते हैं, अभी ऑफिस के लिए थोड़ा जल्दी में हूँ।”

यह कहकर मैं झट से आगे बढ़ गया। उस दिन के बाद से लेकर आज तक, मैंने उसे फिर कभी नहीं देखा। वह अध्याय सदा के लिए बंद हो गया, और पृष्ठभूमि में किशोर कुमार की मर्मभेदी आवाज गूँजने लगी:

“चिंगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाए… सावन जो अगन लगाए, उसे कौन बुझाए?

पतझड़ जो बाग उजाड़े, वो बाग बहार खिलाए… जो बाग बहार में उजड़े, उसे कौन खिलाए?”

 

पंचम अध्याय: पूर्णता का उत्सव और स्वप्न सुंदरी का आगमन

अब मैं जिंदगी के उस मुकाम पर पहुँच चुका था जहाँ भावनाएँ ठंडी पड़ जाती हैं। सुबह से शाम तक बस काम, काम और सिर्फ काम! ‘प्यार’ जैसा शब्द अब केवल एक मजाक या कल्पित कहानी जान पड़ता था। हाँ, कभी-कभार छह महीने या साल भर में किसी पुरानी याद को छूकर दिल में एक हल्की सी हूक उठती, मन कुछ घंटों के लिए बोझिल होता और फिर सांसारिकता की आपाधापी में सब अपने आप गायब हो जाता। इस व्यावसायिक जीवन (Professional Life) के दौरान न जाने कितनी लड़कियाँ आईं और गईं, पर किसी का भी प्रभाव मेरे हृदय की सूखी मरुभूमि पर नहीं पड़ा।

फिर एक शाम, मेरे भाई ने मेरे सामने एक लड़की की तस्वीर लाकर रख दी। वह तस्वीर मेरी पूज्य माँ की पसंद थी। वैसे तो हमारा विवाह पहले ही तय हो चुका था, पर भाई-बहनों ने बस मेरे मजे लेने और मुझे चिढ़ाने के लिए वह फोटो अचानक मेरे सामने रखी थी।

मगर… उस तस्वीर पर नज़र पड़ते ही जादू हो गया! वह लड़की इतनी अलौकिक रूप से खूबसूरत थी कि उसने मेरे हृदय-पटल की सूखी धरती पर एक ही पल में चैत्र के फूल खिला दिए। जो भावनाएं मर चुकी थीं, वे जी उठीं। मैं एक बार फिर नीले और मुक्त आसमान में परिंदे की तरह उड़ने लगा था; क्योंकि जीवन में एक बार फिर, मुझे सचमुच प्यार हो गया था!

“मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू, आई रुत मस्तानी कब आएगी तू…

बीती जाए जिंदगानी कब आएगी तू, चली आ, तू चली आ…”

यह ठीक उन्हीं दिनों की बात है जब पूरे देश के मीडिया में अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय के विवाह की भव्य चर्चाएँ हो रही थीं, और उसी दौर में सिनेमाघरों में शाहिद कपूर और अमृता राव की प्रसिद्ध फिल्म ‘विवाह’ रिलीज हुई थी। उस फिल्म की कहानी सगाई से लेकर विवाह के पवित्र फेरों के बीच के मधुर कालखंड पर आधारित थी, और ठीक वैसी ही प्रेममयी, मर्यादित और सुंदर कहानी उन दिनों हमारी भी चल रही थी।

दो अनजाने अजनबी, चले बांधने बंधन…

हाय रे दिल में है ये उलझन, मिलकर क्या बोलें…

और अंततः… वह पावन और मंगलमयी दिन भी आ ही गया, जब मैं अपने दिल की धड़कनों को समेटे शहनाइयों की गूँज के बीच विजयी हुआ। आखिरकार मैंने अपनी उस स्वप्न सुंदरी को पा ही लिया, उसे हमेशा-हमेशा के लिए अपना बना लिया। आज वो साक्षात परी, वो अर्धांगिनी प्रत्यक्ष रूप से मेरे सामने मेरी गृहलक्ष्मी बनकर मुस्कुरा रही है, और मेरा रोम-रोम आज अपनी उस पूर्णता पर किशोर कुमार के इस अमर गीतों को गुनगुना रहा है:

“मेरे दिल में आज क्या है, तू कहे तो मैं बता दूँ…

तेरी ज़ुल्फ़ फिर सवारूँ, तेरी मांग फिर सजा दूँ…

मुझे देवता बनाकर, तेरी चाहतों ने पूजा…

मेरा प्यार कह रहा है, मैं तुझे खुदा बना दूँ!

कोई ढूंढने भी आये, तो हमें ना ढूंढ पाये…

तू मुझे कहीं छुपा दे, मैं तुझे कहीं छुपा दूँ…

मेरे बाजुओं में आकर तेरा दर्द चैन पाये…

तेरे गेसुओं में छुपकर, मैं जहाँ के ग़म भुला दूँ…”

 

निष्कर्ष: यायावर का ठहराव

मित्रों, यह मेरे निजी जीवन का वह वृत्त चित्र है, जिसे मैंने बिना किसी बनावट या कृत्रिमता के, पूरी ईमानदारी के साथ आपके समक्ष साझा किया है। जीवन की यह यात्रा सिखाती है कि अतीत के अधूरे पन्ने भले ही कितने भी कशिश भरे क्यों न हों, मगर ईश्वर ने आपके भाग्य की किताब में जो अंतिम और मुकम्मल अध्याय (जीवनसाथी) लिखा होता है, वही आपके जीवन को वास्तविक बहार और स्थायित्व प्रदान करता है। आज मेरी यह यायावर जिंदगी अपनी उस स्वप्न सुंदरी के आँचल में आकर परम तृप्ति और पूर्णता का आनंद ले रही है।

 

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