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समय का सिकंदर: कैसे एक ‘विद्रोही विचार’ ने बदला वैश्विक घड़ियों का भूगोल (टाइटन कंपनी की सच्ची दास्तां)

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

अध्याय १: एक दुस्साहसी विचार का जन्म

यह कहानी सिर्फ एक घड़ी बनाने वाली कंपनी की नहीं है, बल्कि भारत के औद्योगिक इतिहास के उस सबसे बड़े जुए की है, जिसने पूरी दुनिया के घड़ी बाज़ार का भूगोल बदल दिया। बात सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों की है। उस दौर के भारत में समय बताने का मतलब केवल एक ही नाम होता था—’एचएमटी’ (HMT)। सरकारी नियंत्रण वाली इस कंपनी का बाज़ार पर ऐसा एकाधिकार था कि यदि किसी को एचएमटी की घड़ी चाहिए होती थी, तो उसे महीनों पहले बुकिंग करानी पड़ती थी या किसी ऊँचे रसूख वाले की सिफ़ारिश लगानी पड़ती थी। घड़ी एक ज़रूरत से ज़्यादा ‘दुर्लभ उपहार’ बन चुकी थी।

इसी दौर में टाटा समूह के एक दूरदर्शी रणनीतिकार और ‘टाटा प्रेस’ के कर्ता-धर्ता कलोन देसाई के दिमाग में एक विद्रोही विचार कौंधा। उन्होंने सोचा कि क्यों न टाटा समूह घड़ी निर्माण के क्षेत्र में कदम रखे? जब उन्होंने यह प्रस्ताव जे.आर.डी. टाटा के सामने रखा, तो विचार तो सबको पसंद आया, लेकिन राह इतनी आसान नहीं थी। तत्कालीन ‘लाइसेंस राज’ के कड़े नियमों के तहत किसी भी निजी कंपनी को घड़ी बनाने का लाइसेंस मिलना लगभग असंभव था, क्योंकि यह क्षेत्र सरकारी उपक्रमों के लिए आरक्षित माना जाता था।

 

अध्याय २: जब उद्योग और सरकार ने हाथ मिलाया

कलोन देसाई और टाटा समूह हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने इस बाधा को पार करने के लिए एक अभूतपूर्व रणनीति बनाई। उन्होंने महसूस किया कि यदि वे अकेले इस मैदान में उतरेंगे, तो नौकरशाही उन्हें रोक देगी। इसलिए उन्होंने ‘सयुक्त क्षेत्र’ (Joint Sector) का सहारा लेने का फैसला किया। टाटा ने तमिलनाडु औद्योगिक विकास निगम (TIDCO) के साथ हाथ मिलाया। इस तरह सरकारी भागीदारी और टाटा के प्रबंधन के अनूठे मेल से जन्म हुआ ‘टाइटन’ (Titan) का—जहाँ ‘टी’ का मतलब टाटा और ‘टी’ का मतलब तमिलनाडु भी था।

वर्ष १९८४ में इस कंपनी की आधिकारिक नींव रखी गई और तमिलनाडु के एक शांत, पिछड़े इलाके ‘होसुर’ में इसकी अत्याधुनिक फैक्ट्री लगाने की शुरुआत हुई। लेकिन चुनौती सिर्फ फैक्ट्री खड़ी करने की नहीं थी, चुनौती उस तकनीक को हासिल करने की थी जो दुनिया में सबसे आधुनिक हो।

 

अध्याय ३: वैश्विक टकराहट और तकनीक का जुआ

उस दौर में दुनिया का घड़ी बाज़ार एक बड़े तकनीकी संक्रमण से गुज़र रहा था। सदियों से चली आ रही चाबी वाली या मैकेनिकल घड़ियों की जगह ‘क्वार्ट्ज’ (Quartz) तकनीक यानी बैटरी से चलने वाली घड़ियों का दौर आ रहा था। भारत में एचएमटी जैसी कंपनियाँ अभी भी मैकेनिकल घड़ियों पर ही टिकी हुई थीं और उनका मानना था कि भारत जैसे विकासशील देश में महंगी बैटरी वाली घड़ियाँ कभी सफल नहीं होंगी।

यही वह मोड़ था जहाँ टाइटन ने अपने जीवन का सबसे बड़ा और वैश्विक जुआ खेला। टाइटन के पहले प्रबंध निदेशक ज़ेरक्स देसाई ने फैसला किया कि टाइटन एक भी मैकेनिकल घड़ी नहीं बनाएगी; वे शत-प्रतिशत केवल ‘क्वार्ट्ज’ घड़ियाँ ही बनाएंगे। तकनीक के लिए उन्होंने स्विट्जरलैंड और जापान के दिग्गजों से संपर्क किया। फ्रांस की एक प्रतिष्ठित कंपनी ‘फ्रांस एबाचेस’ के साथ तकनीकी सहयोग करके होसुर में दुनिया की सबसे बेहतरीन माइक्रो-मैकेनिकल इंजीनियरिंग यूनिट स्थापित की गई। यह सीधे तौर पर वैश्विक दिग्गजों और स्थापित घरेलू व्यवस्था को एक खुली चुनौती थी।

 

अध्याय ४: विवाद, आंतरिक विरोध और थपेड़े

जब १९८७ में टाइटन की घड़ियाँ बाज़ार में आईं, तो उन्होंने तहलका मचा दिया। वे सिर्फ समय नहीं बता रही थीं, बल्कि वे कलाई का आभूषण बन चुकी थीं। लेकिन सफलता के ठीक पीछे विवादों और संकटों का एक पूरा बवंडर खड़ा था।

स्वदेशी बनाम विदेशी का विवाद: स्थापित सरकारी लॉबी और प्रतिद्वंद्वियों ने टाइटन पर आरोप लगाया कि वह विदेशी तकनीक और पुर्जों का आयात करके भारतीय मुद्रा को बाहर भेज रही है। लाइसेंस की शर्तों को लेकर कई बार संसद तक में सवाल उठाए गए।

वित्तीय संकट का दौर: शुरुआती वर्षों में भारी निवेश और कड़े सरकारी टैक्स के कारण कंपनी गहरे वित्तीय संकट में घिर गई थी। एक समय ऐसा भी आया जब आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया कि टाटा का यह प्रयोग पूरी तरह डूब जाएगा।

वैश्विक प्रतिबंधों का डर: भारत के आर्थिक उदारीकरण (१९९१) से पहले, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से कच्चे माल और मशीनों को मँगाने के लिए टाइटन को हर कदम पर नौकरशाही से लड़ना पड़ता था।

 

अध्याय ५: अंतरराष्ट्रीय उड़ान और यूरोप से सीधी जंग

नवब्बे के दशक में जब टाइटन ने भारत पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, तो ज़ेरक्स देसाई ने एक और दुस्साहसिक सपना देखा—घड़ियों के मक्का कहे जाने वाले ‘यूरोप’ के बाज़ार में प्रवेश करना। टाइटन ने लंदन और पेरिस जैसे शहरों में अपने शोरूम खोले और स्विस तथा जापानी घड़ियों को उनके ही घर में चुनौती दी।

यह एक बहुत बड़ी वैश्विक टकराहट थी। यूरोपीय ब्रांड्स ने टाइटन को एक ‘थर्ड-वर्ल्ड’ (तीसरी दुनिया) की कंपनी मानकर उसकी साख गिराने की कोशिश की। डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को प्रभावित किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय विस्तार के कारण टाइटन को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा और अंततः कंपनी को वैश्विक रणनीति में थोड़ा पीछे हटना पड़ा। लेकिन इस उतार-चढ़ाव ने टाइटन को यह सिखा दिया कि उसकी असली ताकत उसकी अपनी धरती और यहाँ के उपभोक्ताओं की नब्ज पहचानने में है।

 

अध्याय ६: संकट से साम्राज्य तक: तनिष्क का जुआ

टाइटन की कहानी तब तक अधूरी है जब तक इसमें ‘तनिष्क’ (Tanishq) के बनने की दास्तां शामिल न हो। घड़ियों के व्यवसाय को सहारा देने और वैश्विक बाज़ार में सोने के आभूषणों के निर्यात के विचार से टाटा ने तनिष्क की शुरुआत की थी। लेकिन शुरुआत में तनिष्क एक भयानक आपदा साबित हुआ। पश्चिमी देशों के लिए बनाए गए डिज़ाइन भारतीयों को पसंद नहीं आए और कंपनी करोड़ों रुपये के घाटे में चली गई।

तनिष्क के इस विवाद और विफलता ने टाइटन के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया था। तब कंपनी ने अपनी रणनीति बदली और भारतीय महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों की शुद्धता को मापने के लिए ‘कैरामीटर’ नामक मशीन बाज़ार में उतारी। उस दौर में सोने की शुद्धता में होने वाली धोखाधड़ी को उजागर करके तनिष्क ने जो भरोसा जीता, उसने टाइटन कंपनी को घड़ियों के साथ-साथ आभूषण बाज़ार का भी बेताज बादशाह बना दिया।

 

उपसंहार: समय के सीने पर अंकित एक अमिट नाम

एक ऐसा विचार जिसे शुरू करने के लिए सरकार लाइसेंस देने को तैयार नहीं थी, जिसने स्थापित सरकारी एकाधिकार से टक्कर ली, जो वैश्विक स्तर पर स्विस और जापानी दिग्गजों से टकराई और जिसने कई बार दिवालिया होने के कगार पर पहुँचकर भी वापसी की—आज वह टाइटन केवल एक कंपनी नहीं बल्कि भारतीय औद्योगिक स्वाभिमान का प्रतीक है। कलोन देसाई के उस एक विद्रोही विचार ने आज करोड़ों कलाईयों पर भारत का नाम सुनहरे अक्षरों में लिख दिया है।

धन्यवाद!

 

 

जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा

 

 

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