कृतज्ञता के स्वर
मैं सर्वप्रथम व्यक्त करता हूँ आभार,
आदरणीय श्री महेश जी का बारम्बार।
जिनकी पावन छत्रछाया के कारण ही,
मन मेरा रहता सदा शांत और अविकार।
वाणी मेरी कभी अशिष्ट नहीं होने पाती,
संस्कारों में कभी फूहड़पन नहीं आता।
मैं सहृदय धन्यवाद देता हूँ,
आदरणीय श्री प्रीतम जी को सादर।
आज उन्हीं के संबल से सुरक्षित है,
मेरे जीवन का अटूट विश्वास और—
कुछ विशिष्ट कर गुजरने की वह ऊष्मा।
मैं आदरणीय श्री विहान जी का भी ऋणी हूँ,
यह वास्तव में उन्हीं की अनुपम उपलब्धि है—
कि मुझमें आज भी बची हुई है मनुष्यता,
कि मेरा वैचारिक क्षितिज आज भी भरा है—
सकारात्मक और रचनात्मक दिव्य ऊर्जा से।
मुझे असीम हर्ष है इस बात का कि,
मेरे जीवन की चंचल रेत-घड़ी में—
आदरणीय श्री रवि जी ने कभी भी,
कोई विचलित करने वाला तूफ़ान आने न दिया।
वे स्वयं नहीं जानते कि उनके स्नेह के,
कितने अमूल्य अहसान हैं इस मानस पर।
मैं आदरणीय अध्यक्ष जी का भी परम ऋणी हूँ,
जिन्होंने मुझ जैसे साधारण और लघु को—
ऊँची उड़ान भरने के निमित्त पंख देकर,
यह अनंत और खुला आसमान प्रदान किया।
इतना ही नहीं, मैं आप सभी का कृतज्ञ हूँ,
जो इस गरिमामयी सभा में उपस्थित हुए हैं।
जो मुझे आत्मीय मानकर, अपना समझते हैं,
और इस नाकाबिल के भीतर भी—
कुछ न कुछ काबिलियत ढूँढ ही लेते हैं।
मैं अश्विनी राय ‘अरुण’, आप सब सुधी जनों का—
इस अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पावन मंच पर,
सम्मिलित होने के लिए पुनः हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
— विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’