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मेरी जीवन धारणा
जीवन जीने की पावन कला,
स्वयं में एक महान कर्म है।
उस पर श्रेष्ठ विचारों की धारणा,
यही तो सच्चा मानुष धर्म है।
स्वयं को सदा साधे रखना,
एक कठिन अनुशासित कला है।
जो जग के हित के काज करे,
निश्चित ही उसमें स्वयं का भला है।
जहाँ मित्रों का निस्वार्थ प्यार मिले,
वहाँ भला कौन सा पुण्य चाहिए?
जहाँ माँ-बाप का आशीष मिले,
वहाँ कहाँ स्वर्ग का सिंहासन चाहिए?
मैं तो सदा से एक अनाड़ी रहा,
मुझे बस अनाड़ी ही रहने दीजिए।
ज्ञान की बातें अब न बुझे यह मन,
इसे प्रेम-सरिता में बहने दीजिए।
मैं भी हूँ एक रमता जोगी,
मुझे राम को हृदय में बसाना है।
‘अश्विनी’ की तो बस यही धारणा—
जीवन भर ‘राम-राम’ ही गाना है।