महानता का मार्ग
आइए कुछ बात करते हैं,
साहस पे विचार करते हैं।
साहस, निर्भीकता और पराक्रम,
को जानने का प्रयत्न करते हैं॥
साहसी की पहली पहचान,
डर का अनुभव होना है।
विजय तिलक लगाने हेतु,
डर से लड़कर आगे बढ़ना है॥
साहसी की दूसरी पहचान है,
अपने दिल की बातें सुनना।
जब दिल और दिमाग में द्वंद्व हो,
जो दिल कहे बस वही करना॥
साहस की तीसरी पहचान है,
मुश्किलों में सदा डटे रहना।
विजय पताका फहराने को,
बाधाओं से कभी न घबराना॥
सत्य के साथ अडिग खड़े होना,
साहसी की चौथी पहचान है।
सच और सच्चाई के साथ जो रहे,
वही असल में वीर इंसान है॥
युवा होना ही जरूरी तो नहीं,
युवा जोश पाँचवीं पहचान है।
अस्सी की उम्र में भी जो रण में जागे,
वीर कुंवर सिंह उसके प्रमाण हैं॥
कष्ट झेलकर ही अंततः,
व्यक्ति पाता सम्मान है।
गरिमा और आस्था को जो कभी न छोड़े,
वही साहसी बनता एक दिन महान है॥
— अश्विनी राय ‘अरूण’