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UBI Contest १००

शतक की अभिलाषा

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​अर्धशतक को पार कर चुके,

वो शतक की आस लगा चुके हैं!

उन्हें अब भी जवानी का दंभ है,

जो पेशानी को विकेट बना चुके हैं।

 

​हर कोई शतक कहाँ लगाता है?

हर कोई लंबी पारी कहाँ खेलता है?

यह जानते हुए भी वो ‘ठगनी’ को,

ठगने का जाल बिछा चुके हैं!

 

​हर कदम पर अब शक्ति घटती है,

फिर भी साहस बढ़ती जाती है;

‘वो जीतेगा या मैं जीतूँगा’, शायद—

इसका अंदाज़ा वो लगा चुके हैं।

 

​बार-बार क्रीज़ से बाहर निकलने की,

उन्हें बुरी आदत लगी हुई है;

हर बॉल पर चौका या छक्का,

मारने की उन्हें लालच लगी हुई है।

 

​जो पहले ऐसी गलती कर गए हैं,

उनकी अधूरी पारी को क्यों नहीं देखते?

बुढ़ापे में बदल चुकी, अपनी—

भरी जवानी को क्यों नहीं देखते?

 

​वो आज भी वैसे ही खेलना चाहते थे,

मैदान पर नवजवानों को दबाना चाहते थे;

मगर… एक आसान सी बॉल पर ही,

जो अपनी कीमती विकेट गंवा चुके हैं!

 

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

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